भूल तो नहीं गए कोरोना वह दौर! दूसरी लहर में बढ़ता संक्रमण, लाशों के ढेर; एक-एक सांस के लिए भटकते लोग

Coronavirus: कोरोना का वह दौर, जिसने देखा वह शायद कभी भूल नहीं पाएगा, देखें तस्वीर...

Snigdha Singh
Published on: 26 May 2025 4:28 PM IST
भूल तो नहीं गए कोरोना वह दौर! दूसरी लहर में बढ़ता संक्रमण, लाशों के ढेर; एक-एक सांस के लिए भटकते लोग
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Covid -19: भारत में कोरोना वायरस की तीन प्रमुख लहरों में से दूसरी लहर को सबसे ज्यादा जानलेवा और विनाशकारी माना गया है। मार्च 2021 से जून 2021 के बीच आई इस लहर ने देश को स्वास्थ्य, सामाजिक और मानसिक हर स्तर पर बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। कोविड-19 की दूसरी लहर भारत के इतिहास में एक भयावह अध्याय बन गई, जिसने देश को न सिर्फ स्वास्थ्य के मोर्चे पर बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी झकझोर कर रख दिया। 2021 की शुरुआत में जब लोगों को लगा कि कोरोना का संकट धीरे-धीरे खत्म हो रहा है, तब दूसरी लहर ने अप्रत्याशित रूप से दस्तक दी और पहले से भी ज़्यादा जानलेवा साबित हुई।

तेजी से बढ़ते संक्रमण और टूटी स्वास्थ्य व्यवस्था

मार्च 2021 से शुरू होकर मई तक चरम पर रही इस लहर में कोविड-19 के मामलों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली। देश के बड़े शहरों से लेकर गांवों तक संक्रमण की चपेट में आ गए। अस्पतालों में बेड्स, ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाइयों की भारी कमी हो गई। कई राज्यों में हालात इतने बिगड़ गए कि मरीजों को अस्पतालों के बाहर इलाज का इंतजार करते-करते दम तोड़ते देखा गया।




ऑक्सीजन संकट बना राष्ट्रीय आपदा

दूसरी लहर की सबसे दर्दनाक तस्वीरें ऑक्सीजन संकट की रही। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों के अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति ठप हो गई। सोशल मीडिया पर मदद की गुहार लगाते लोग, ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए लंबी लाइनें और श्मशानों में लगी लाशों की कतारें, यह सब उस समय की भयावह सच्चाई को दर्शाते हैं।



डेल्टा वेरिएंट, तबाही का असली चेहरा

विशेषज्ञों के अनुसार, इस लहर में वायरस का ‘डेल्टा वेरिएंट’ प्रमुख रूप से जिम्मेदार था, जो पहले से कहीं अधिक संक्रामक और घातक था। इसने युवाओं को भी अपनी चपेट में लिया और पहले के मुकाबले अधिक लोगों को गंभीर हालत में पहुंचा दिया।

शवों की कतार और श्मशानों का बोझ

दूसरी लहर के दौरान देश के कई हिस्सों में अंतिम संस्कार की जगह कम पड़ गई। श्मशानों और कब्रिस्तानों में दिन-रात चिताएं जलती रहीं। कई जगहों पर शवों को गंगा नदी में बहा दिया गया, जिससे एक और मानवीय और पर्यावरणीय संकट खड़ा हो गया।



सरकारी तंत्र पर सवाल

इस लहर ने सरकार की तैयारी और प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। स्वास्थ्य प्रणाली की कमज़ोरियाँ, संसाधनों की कमी और समय रहते चेतावनी न देने की वजह से जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ। इसके साथ ही चुनावी रैलियों और धार्मिक आयोजनों जैसे कुंभ मेले को लेकर भी सरकार की आलोचना हुई।

जनता की एकजुटता और उम्मीद की लौ

हालांकि इस संकट के बीच आम जनता, स्वयंसेवी संगठन और डॉक्टरों की टीमों ने इंसानियत की मिसाल पेश की। सोशल मीडिया पर लोगों ने बेड, ऑक्सीजन और दवाओं की जानकारी साझा की। गुरुद्वारों, मंदिरों और मस्जिदों ने मदद के दरवाज़े खोले। इस अंधकार में भी कई ऐसे चेहरे उभरे जो उम्मीद की रोशनी बन गए।

विशेषज्ञों और आंकड़ों के मुताबिक, दूसरी लहर के दौरान मृत्यु दर सबसे अधिक रही। देशभर में ऑक्सीजन की भारी कमी, अस्पतालों में बेड्स की अनुपलब्धता और जीवन रक्षक दवाओं की किल्लत ने हालात को भयावह बना दिया। कोरोना संक्रमण की इस तेज रफ्तार ने स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों में भी जगह कम पड़ने लगी थी।



पहली, दूसरी और तीसरी लहर का तुलनात्मक असर

पहली लहर (2020): लोगों को संक्रमण के खतरे का अहसास हुआ, लेकिन संक्रमण की रफ्तार धीमी थी।

दूसरी लहर (2021): तेज़ संक्रमण, सबसे ज्यादा मौतें, ऑक्सीजन और दवाओं का संकट पूरा तबाही का मंजर।

तीसरी लहर (2022): ओमिक्रॉन वैरिएंट के चलते संक्रमण तेजी से फैला, लेकिन लक्षण हल्के रहे और अस्पताल में भर्ती होने की दर कम रही।

पहली लहर ने चेताया, दूसरी ने तबाही मचाई, और तीसरी लहर ने राहत की उम्मीद दी। कोरोना की दूसरी लहर भारत के लिए एक कड़वी सीख साबित हुई। यह सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि यह हमारी प्रणाली, नेतृत्व और सामाजिक संरचना की परीक्षा भी थी। यह दौर हमें याद दिलाता है कि विज्ञान, तैयारी और मानवता की कितनी अहम भूमिका है किसी भी संकट से लड़ने में। भारत को यह सिखाया कि महामारी के खिलाफ केवल चिकित्सा ही नहीं, बल्कि समय पर तैयारी, संसाधनों की उपलब्धता और सामाजिक एकजुटता भी बेहद ज़रूरी है।

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Snigdha Singh

Director : Content snigdhajimmc098@gmail.com

Hi! I am Snigdha Singh, Leadership role in Newstrack. Leading the editorial desk team with ideation and news selection and also contributes with special articles and features as well. I started my journey in journalism in 2017 and has worked with leading publications such as Jagran, Hindustan and Rajasthan Patrika and served in Kanpur, Lucknow, Noida and Delhi during my journalistic pursuits.

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