Yashwant Verma Cash Case: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के नकदी बरामदगी मामले में रिपोर्ट की RTI याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज

Yashwant Verma Cash Recovery Case: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े विवादित नकदी बरामदगी मामले में सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने इस मामले में नियुक्त की गई समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की सूचना के अधिकार (RTI) याचिका को खारिज कर दिया है।

Newstrack Network
Published on: 26 May 2025 7:43 PM IST
Yashwant Vermas Cash Recovery Case
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Yashwant Verma's Cash Recovery Case (Image Credit-Social Media)

Yashwant Verma Cash Recovery Case: सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े विवादित नकदी बरामदगी मामले में नियुक्त की गई समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की सूचना के अधिकार (RTI) याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में उस रिपोर्ट की मांग की गई थी, जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा पर आरोप लगाए गए हैं। इसके साथ ही याचिका में उस पत्राचार की जानकारी भी मांगी गई थी, जो उस समय के भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस विषय में भेजा गया था। सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने याचिका को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि यह जानकारी गोपनीय है, और इसे उजागर करने से संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद 14 मार्च 2025 की रात 11:35 बजे दिल्ली के लुटियंस ज़ोन स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगने की घटना से शुरू हुआ, जब वे दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। एक मीडिया रिपोर्ट में वहां भारी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया था, जिसके बाद इस मामले ने सार्वजनिक और न्यायिक स्तर पर गंभीर ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए गए:

• दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने प्रारंभिक जांच करवाई।

• सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की, जिसमें शामिल थे:

• पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू,

• हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया, और

• कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति अनु शिवरामन।

यह पैनल ने 3 मई 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, जिसमें दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा और दिल्ली अग्निशमन सेवा प्रमुख समेत 50 से अधिक व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए थे। सूत्रों के अनुसार, समिति की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति वर्मा के विरुद्ध आरोपों की पुष्टि की गई। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत यह रिपोर्ट न्यायमूर्ति वर्मा को प्रतिक्रिया देने के लिए भेजी गई। 6 मई 2025 को न्यायमूर्ति वर्मा ने अपना उत्तर भेजा, जिसमें उन्होंने आरोपों से इनकार किया, जैसा कि उन्होंने पहले भी दिल्ली हाई कोर्ट और जांच समिति को दिए पत्रों में किया था।

CJI की कार्रवाई और ‘इन-हाउस प्रक्रिया’

8 मई 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें बताया गया कि तत्कालीन CJI संजय खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समिति की रिपोर्ट और न्यायमूर्ति वर्मा की प्रतिक्रिया भेजी है।

सूत्रों के अनुसार, CJI खन्ना ने न्यायमूर्ति वर्मा को इस्तीफा देने की सलाह दी थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। इन-हाउस प्रक्रिया के अनुसार, यदि कोई न्यायाधीश इस्तीफे की सलाह को नहीं मानता है, तो CJI मामले को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पास भेज देते हैं, जिससे महाभियोग प्रक्रिया की संभावना बनती है।

सुप्रीम कोर्ट के बयान में कहा गया:

“भारत के प्रधान न्यायाधीश ने इन-हाउस प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को दिनांक 3 मई की तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट और 6 मई को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से प्राप्त पत्र/उत्तर भेजा है।”

RTI की अस्वीकृति और आगे की प्रक्रिया

अब जबकि रिपोर्ट कार्यपालिका और संसद के पास है, इस पर अगली कार्रवाई उन्हीं के हाथों में है। इन-हाउस प्रक्रिया में यह प्रावधान है कि यदि आवश्यक समझा जाए तो महाभियोग की कार्यवाही शुरू की जा सकती है, जो भारत के न्यायिक इतिहास में एक दुर्लभ और जटिल प्रक्रिया मानी जाती है। RTI को अस्वीकार करने का आधार यह रहा कि यह जानकारी गोपनीय श्रेणी में आती है और इसका खुलासा संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन कर सकता है। अब कार्यपालिका और संसद इस मुद्दे पर विचार कर रही हैं। यह प्रकरण इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है कि भविष्य में इस तरह के न्यायिक विवादों से कैसे निपटा जाएगा।फिलहाल, देश की निगाहें इस उच्च-स्तरीय न्यायिक विवाद के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं।

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