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Cheetah Pilot Srividya Rajan: कारगिल युद्ध की अनसुनी नायिका...एक साहस और प्रेरणा की कहानी
Kargil Heroin Cheetah Pilot Srividya Rajan: कारगिल युद्ध में कई वीरों ने अपनी वीरता से भारत माँ के शौर्य को बनाये रखा वहीँ कुछ ऐसी कहानियां भी थीं जो अनसुनी हैं उन्ही कहानियों में से एक साहस और प्रेरणा की कहानी है चीता पायलट श्रीविद्या राजन की।
Cheetah Pilot Srividya Rajan (Image Credit-Social Media)
Kargil Heroin Cheetah Pilot Srividya Rajan: भारतीय शौर्य गाथाओं में जब कारगिल युद्ध का स्मरण होता है तो अक्सर भारतीय वायुसेना की जांबाज महिला पायलटों में गुंजन सक्सेना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनकी कहानी को एक फिल्म के माध्यम से पर्दे पर भी उतारा गया है। लेकिन उन्हीं के साथ एक और ऐसी निडर वीरांगना भी थीं जिन्होंने रणभूमि में अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और अनगिनत जीवन बचाए। ये थीं चीता पायलट श्रीविद्या राजन। उनकी कहानी सिर्फ कारगिल के बर्फीले पहाड़ों पर उड़ान भरने तक सीमित नहीं है बल्कि एक साधारण लड़की के असाधारण सपनों और उन सपनों को साकार करने के लिए अथक संघर्ष की कहानी है। यह कहानी हमें बताती है कि कैसे एक साधारण सी दिखने वाली लड़की अपने कठोर दृढ़ संकल्प और अटूट इच्छाशक्ति के बल पर हर बाधा को पार कर सकती है और कैसे एक महिला ने न केवल युद्ध के मैदान में बल्कि भारतीय सेना और वायुसेना में महिलाओं की भूमिका के प्रति सोच को भी बदलने का जज्बा रखती है। आइए जानते हैं इस बहादुर सैन्य अधिकारी श्रीविद्या राजन के बारे में सब कुछ -
श्रीविद्या राजन के बचपन के सपने और प्रारंभिक संघर्ष
श्रीविद्या राजन का जन्म केरल के पलक्कड़ जिले के शांत और हरे-भरे गांव थाथमंगलम में हुआ था। बचपन में वे एक साधारण लड़की थीं। जिन्हें अपने लंबे बालों पर बेहद गर्व था और वे हर दिन उन्हें चमेली के फूलों से सजाना पसंद करती थीं। उनका पारिवारिक पृष्ठभूमि सेना से जुड़ा था। उनके पिता भारतीय सेना में सूबेदार मेजर के पद पर कार्यरत थे और उनकी मां एक शिक्षिका थीं। घर में चार भाई-बहन थे और सब गांव में ही रहते थे। छुट्टियों में श्रीविद्या अपनी मां और भाई-बहनों के साथ अक्सर अपने पिता की पोस्टिंग वाली जगहों पर जाया करती थीं। यहीं से उनके मन में सेना के प्रति सम्मान और कुछ बड़ा करने की भावना अंकुरित हुई।
उस दौर में भारतीय सेना में महिलाओं को मुख्य रूप से मेडिकल फील्ड में ही काम करने की अनुमति थी और इसमें श्रीविद्या की कोई विशेष रुचि नहीं थी। उनके मन में तो पायलट बनने की अदम्य चाहत थी। यह एक ऐसा सपना था जो उस समय के सामाजिक ताने.बाने और वित्तीय बाधाओं को देखते हुए लगभग असंभव सा लगता था। एविएशन स्कूल में दाखिला लेना काफी महंगा था इसलिए उन्होंने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए रसायन विज्ञान से स्नातक करने का फैसला किया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब भारत सरकार ने महिलाओं को पायलट बनने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया तो श्रीविद्या ने बिना देर किए भारतीय वायुसेना के लिए आवेदन कर दिया।
सफलता की राह कभी सीधी नहीं होती।श्रीविद्या के लिए भी यह राह इतनी आसान न थी। उन्होंने लिखित परीक्षा तो पास कर ली लेकिन दूसरे स्तर की स्क्रीनिंग में उन्हें काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। निराशा हाथ लगी और वे घर वापस लौट आईं। लेकिन श्रीविद्या हार मानने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने अपनी कमजोरियों पर गंभीरता से काम करना शुरू किया। उनकी एक बड़ी चुनौती उनका शारीरिक गठन था। वे काफी दुबली- पतली काठी की थीं और उनका वजन मात्र 49 किलो था। उन्होंने अपनी सेहत और फिटनेस पर ध्यान केंद्रित किया। अपनी शारीरिक क्षमता को बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की। साथ ही उन्होंने पलक्कड़ में ब्रिलियंट कंप्यूटर नामक एक कंपनी में अकादमिक काउंसलर के रूप में नौकरी करनी शुरू कर दी। इस नौकरी ने उन्हें अंग्रेजी बोलने में आत्मविश्वा दिलाया। जो उनके भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। आखिरकार उनकी अथक मेहनत और लगन रंग लाई और वह भारतीय वायु सेना की पहली महिला हेलीकॉप्टर पायलट बनीं। उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर टॉप करके अपनी योग्यता का लोहा मनवाया।
कठिन प्रशिक्षण और दृढ़ संकल्प
श्रीविद्या राजन भारतीय वायुसेना के चौथे पायलट बैच की एक महत्वपूर्ण सदस्य थीं। उनका प्रशिक्षण आंध्र प्रदेश के डुंडीगल में स्थित प्रतिष्ठित एयरफोर्स एकेडमी में हुआ था। शुरुआती उत्साह के बाद प्रशिक्षण के कुछ महीने उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुए। अनुशासन और कठोरता ने उनकी दैनिक दिनचर्या को बदल दिया। उन्हें सुबह जल्दी उठना पड़ता था और कई बार तो नहाने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिलता था। रात 10 बजे के बाद लाइट्स बंद हो जाती थीं। जिससे पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के लिए कम समय मिलता था। पायलट बनने के अपने सपने के लिए श्रीविद्या ने कई व्यक्तिगत त्याग किए। उन्होंने अपने लंबे खूबसूरत बाल कटवा लिए और शैंपू करना भी छोड़ दिया क्योंकि उनके पास उन्हें धोने और सुखाने का समय नहीं होता था। डेढ़ साल की कड़ी मेहनत, त्याग और समर्पण के बाद जब श्रीविद्या राजन को कमीशन मिला तो उन्हें जम्मू.कश्मीर के उधमपुर में तैनात किया गया। यहीं पर उन्होंने उड़ान भरने की अपनी विशेषज्ञता को और निखारा। जिस टीम में वे शामिल हुईं उसमें कुल 22 पायलट थे और उन्हीं में से एक थीं गुंजन सक्सेना। जिनकी कहानी बाद में पूरे देश में प्रसिद्ध हुई।
कारगिल युद्ध रणभूमि की नायिका
साल 1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा तो भारतीय वायुसेना ने अपनी पूरी ताकत युद्ध के मैदान में झोंक दी। श्रीविद्या राजन को कारगिल युद्ध ड्यूटी के लिए श्रीनगर भेज दिया गया। उन्हें शुरुआत में इस बात की जानकारी नहीं थी कि वे किस मिशन पर जा रही हैं। जब उन्हें पता चला कि उन्हें सीधे युद्ध क्षेत्र में भेजा जा रहा है, तो स्वाभाविक रूप से वे काफी भयभीत हो गईं थीं। श्रीनगर में फाइटर जेट उड़ाना अपने आप में एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य था। खासकर युद्धग्रस्त क्षेत्र की विषम परिस्थितियों में। लेकिन श्रीविद्या ने अपने भय को अपने कर्तव्य के आड़े नहीं आने दिया। उन्हें कारगिल युद्ध क्षेत्र से घायल सैनिकों को श्रीनगर आर्मी बेस हॉस्पिटल तक पहुंचाने और अग्रिम चौकियों पर राशन की सप्लाई करने का महत्वपूर्ण और जोखिम भरा काम सौंपा गया था। कारगिल की बर्फीली चोटियों पर जहां दुश्मन की गोलीबारी का खतरा हर पल मंडराता रहता था। श्रीविद्या ने अपने हेलीकॉप्टर को कुशलता से उड़ाया। उन्होंने घायल सैनिकों को समय रहते अस्पताल पहुंचाया। जिससे अनगिनत जानें बचीं। राशन और आवश्यक सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित कर उन्होंने सैनिकों के मनोबल को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध के दौरान उनका साहस और समर्पण अनुकरणीय था। उन्होंने न केवल अपने कर्तव्यों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया बल्कि भारतीय सेना और वायुसेना में महिलाओं को लेकर पारंपरिक सोच को भी चुनौती दी। उनकी और गुंजन सक्सेना जैसी अन्य महिला पायलटों की कामयाबी ने यह साबित कर दिया कि महिलाएं भी पुरुष सैनिकों के समान ही कठिन और जोखिम भरी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा सकती हैं। उनकी सेवाओं ने भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका को लेकर एक नए युग की शुरुआत की।
वर्तमान में अनुभव और ज्ञान से वायुसेना को समृद्ध कर रहीं श्रीविद्या राजन
कारगिल युद्ध में अपनी अमूल्य सेवा देने के बाद श्रीविद्या राजन ने भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं जारी रखीं। उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और अपने अनुभव और ज्ञान से वायुसेना को समृद्ध किया।
वर्तमान में ;जून 2025 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार श्रीविद्या राजन भारतीय वायुसेना में ग्रुप कैप्टन के पद पर कार्यरत हैं। यह भारतीय वायुसेना में एक प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण पद है। वह वर्तमान में दिल्ली में एयरफोर्स हेडक्वार्टर में एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवा दे रही हैं। उनकी जिम्मेदारियों में विभिन्न प्रशासनिक और परिचालन भूमिकाएं शामिल हैं। जहां वह अपने विशाल अनुभव का उपयोग करते हुए युवा अधिकारियों को प्रशिक्षित करने और वायुसेना की रणनीतिक योजना में योगदान देने का काम करती हैं। उनका जीवन और करियर अनगिनत युवा लड़कियों और लड़कों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। जो भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल होने का सपना देखते हैं।श्रीविद्या राजन जैसी वीरांगनाओं के कारण ही आज भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं। और देश की सेवा में कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं।


