Lord Ganesha Idol: सिद्धिविनायक से विघ्नविनाशक तक, सूंड की दिशा से जानें गणेश जी का स्वरूप

गणपति बप्पा के विविध रूप और उनकी प्रतिमाओं में सबसे अधिक चर्चा उनकी सूंड की दिशा को लेकर होती है।

Jyotsana Singh
Published on: 4 Sept 2025 3:58 PM IST
Ganesh Trunk Direction Meaning
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Ganesh Trunk Direction Meaning (Image Credit-Social Media)

Lord Ganesha Idol Trunk Direction: भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को विघ्नहर्ता गणेशजी का जन्म हुआ था। इसी दिन से दस दिवसीय गणेशोत्सव का शुभारंभ होता है। इस बार यह पावन पर्व 27 अगस्त 2025 से 6 सितंबर तक देशभर में मनाया जा रहा है। गणपति बप्पा के विविध रूप और उनकी प्रतिमाओं में सबसे अधिक चर्चा उनकी सूंड की दिशा को लेकर होती है। दरअसल, गणेशजी की सूंड केवल उनके स्वरूप का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसमें छिपा है गहन आध्यात्मिक रहस्य और जीवन को दिशा देने वाला संदेश। गणेश चतुर्थी से लेकर धनतेरस पर गणेश जी की प्रतिमा को लेकर अक्सर हम सब उनकी सूंड को लेकर दुविधा में रहते हैं कि आखिर किस दिशा में सूंड का मुड़ा होना शुभ होता है। आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से -

गणेश जी की दाईं ओर सूंड-तेज, जाग्रति और शक्ति का प्रतीक

गणेशजी की वह प्रतिमा जिसमें सूंड दाईं ओर मुड़ती है, उसे दक्षिणाभिमुखी गणपति कहा जाता है। 'दक्षिण' का सीधा संबंध दक्षिण दिशा से है। जिसे शास्त्रों में यमलोक की दिशा माना गया है।


साथ ही शरीर की दाईं ओर स्थित सूर्य नाड़ी का भी इससे गहरा संबंध माना जाता है। यह नाड़ी ऊर्जा, तेज और सक्रियता का स्रोत है। इसलिए दाईं सूंड वाले गणेशजी को जाग्रत और अत्यंत प्रभावशाली रूप माना जाता है। उनकी पूजा सामान्य तरीके से नहीं की जा सकती। इसमें सटीक विधि-विधान और नियमों का पालन आवश्यक है। यह रूप साधना और विशेष कार्यों की सफलता के लिए अत्यधिक पूजनीय है। दक्षिणाभिमुखी गणेशजी को ही सिद्धिविनायक भी कहा जाता है।

गणेश जी की बाईं ओर सूंड- शांति, संतुलन और आनंद का प्रतीक


गणेशजी की सबसे लोकप्रिय प्रतिमाएं वे हैं जिनमें सूंड बाईं ओर झुकी होती है। इन्हें वाममुखी गणपति कहा जाता है। 'वाम' का अर्थ बाईं दिशा या उत्तर दिशा से है। यह दिशा चंद्र नाड़ी का प्रतिनिधित्व करती है। चंद्र नाड़ी शीतलता, शांति, संतुलन और सुख का स्रोत मानी गई है। इसी कारण बाईं सूंड वाले गणेशजी गृहस्थ जीवन के लिए सबसे शुभ माने गए हैं। इनकी पूजा साधारण पद्धति से भी की जा सकती है और माना जाता है कि घर-परिवार में सुख-शांति, ऐश्वर्य और समृद्धि लाने के लिए यही स्वरूप सबसे उपयुक्त है। यही कारण है कि अधिकतर घरों और मंदिरों में वाममुखी गणेशजी की ही स्थापना की जाती है।

गणेश जी की सीधी सूंड - मोक्ष और आत्मज्ञान की राह


अपने अक्सर गौर किया होगा कि कभी-कभी गणेशजी की प्रतिमाओं में सूंड सीधी दिखाई देती है। यह अत्यंत दुर्लभ और पवित्र स्वरूप है। सीधी सूंड का अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी का प्रभाव, जो आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। ऐसे गणेशजी की उपासना संन्यासियों और गंभीर साधकों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। यह स्वरूप संसारिक बंधनों से मुक्ति और आत्मा के परम लक्ष्य की ओर ले जाने वाला है। इन्हीं सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए मूर्ति की सूंड की दिशा का महत्व तय किया गया है। हालांकि गणेशजी अपने हर रूप में भक्तों का मार्ग प्रशस्त करते हैं और जीवन से विघ्न दूर करते हैं। इसलिए चाहे गणेशजी की सूंड दाईं हो, बाईं हो या सीधी उनका आशीर्वाद सदा मंगलकारी और कल्याणकारी ही होता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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