विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस कब और क्यों मनाया जाता है, जानिए क्या है इसका इतिहास

World Day to Combat Desertification and Drought : विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस हर साल 17 जून को मनाया जाता है आइये जानते हैं इसको मानाने का उद्देश्य, इसका इतिहास और महत्त्व।

Akshita Pidiha
Published on: 16 Jun 2025 9:18 AM IST
World Day to Combat Desertification and Drought 2025
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World Day to Combat Desertification and Drought 2025 (Image Credit-Social Media)

World Day to Combat Desertification and Drought: हर साल 17 जून को दुनिया भर में एक खास दिन मनाया जाता है, जिसे विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस कहते हैं। यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि धरती मां की उस पुकार का प्रतीक है, जो हमें याद दिलाती है कि हमारी इस नीली-हरी ग्रह की मिट्टी, पानी और हरियाली को बचाना कितना जरूरी है। मरुस्थलीकरण और सूखा आज हमारे सामने ऐसी चुनौतियां हैं, जो न सिर्फ पर्यावरण को, बल्कि इंसानी जिंदगी, खेती-बाड़ी और अर्थव्यवस्था को भी गहरे तक प्रभावित कर रही हैं।

मरुस्थलीकरण और सूखा: आखिर ये हैं क्या


सबसे पहले समझते हैं कि मरुस्थलीकरण और सूखा क्या हैं। मरुस्थलीकरण का मतलब है उपजाऊ जमीन का धीरे-धीरे बंजर हो जाना। यह तब होता है जब शुष्क, अर्द्ध-शुष्क या सूखे उप-आर्द्र इलाकों की मिट्टी अपनी उत्पादकता खो देती है। यह मौजूदा रेगिस्तानों का फैलना नहीं, बल्कि उन इलाकों का बंजर हो जाना है, जो कभी हरे-भरे या खेती के लायक थे। इसके पीछे कई कारण हैं, जंगल कटाई, ज्यादा चराई, गलत खेती के तरीके और जलवायु परिवर्तन।

वहीं, सूखा एक ऐसी स्थिति है, जब लंबे समय तक बारिश न हो, जिससे पानी की भारी कमी हो जाती है। यह कमी खेती, पीने के पानी, और पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह प्रभावित करती है। सूखा सिर्फ प्रकृति की मार नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों जैसे पानी का अंधाधुंध इस्तेमाल और पर्यावरण का नुकसान भी इसका बड़ा कारण है। 1900 से 2019 के बीच सूखे ने दुनिया भर में 2.7 अरब लोगों को प्रभावित किया और 1.17 करोड़ लोगों की जान ली।

ये दोनों समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। मरुस्थलीकरण सूखे को और गंभीर बनाता है, और सूखा मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देता है। नतीजा? खेती बर्बाद, भुखमरी, गरीबी और मजबूरी में पलायन।

क्यों मनाया जाता है यह दिन?

17 जून को विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस मनाने की शुरुआत 1994 में हुई, जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव A/RES/49/115 पारित किया। इसका मकसद था मरुस्थलीकरण और सूखे से जूझ रहे देशों, खासकर अफ्रीका में, जागरूकता फैलाना और समाधान तलाशना। 1995 से हर साल यह दिन मनाया जा रहा है।

इस दिन का उद्देश्य सिर्फ सेमिनार या भाषण देना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना है कि हमारी छोटी-छोटी कोशिशें, जैसे पेड़ लगाना, पानी बचाना और सही खेती के तरीके अपनाना धरती को बंजर होने से बचा सकती हैं। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि मरुस्थलीकरण और सूखा सिर्फ किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौती है, जिसका सामना करने के लिए दुनिया को एकजुट होना होगा।

हर साल इस दिन की एक थीम होती है, जो किसी खास मुद्दे पर ध्यान देती है। मिसाल के तौर पर, 2024 की थीम थी “United for Land. Our Legacy. Our Future”, यानी “जमीन के लिए एकजुट। हमारा विरासत। हमारा भविष्य।” यह थीम हमें बताती है कि जमीन को बचाना न सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अमानत है।

इतिहास: कैसे शुरू हुई यह जंग?


मरुस्थलीकरण और सूखे की समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन 20वीं सदी में यह तेजी से गंभीर हुई। 1970 के दशक में अफ्रीका के सहारा क्षेत्र में भयानक सूखे ने लाखों लोगों की जिंदगी तबाह कर दी। इसने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा कि बंजर होती जमीन और पानी की कमी कितनी खतरनाक हो सकती है। इसके जवाब में 1992 में रियो डे जनेरियो में हुए पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit) में मरुस्थलीकरण को एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती माना गया।

1994 में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) की स्थापना हुई, जो पर्यावरण और विकास को सतत भूमि प्रबंधन से जोड़ने वाला एकमात्र कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है। UNCCD के तहत 197 देश एक साथ काम करते हैं ताकि बंजर जमीन को उपजाऊ बनाया जाए और सूखे के प्रभाव को कम किया जाए।

भारत ने भी 1994 में UNCCD पर हस्ताक्षर किए और 1995 से इस दिन को मनाने में सक्रिय रहा। 2019 में भारत ने UNCCD के 14वें सम्मेलन (COP-14) की मेजबानी की, जिसमें 5000 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

मरुस्थलीकरण और सूखे के कारण

मरुस्थलीकरण और सूखा सिर्फ प्रकृति का खेल नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही का नतीजा भी है। आइए, इनके प्रमुख कारणों पर नजर डालें:

1. जंगल कटाई: पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से मिट्टी की उर्वरता खत्म होती है और बारिश का चक्र बिगड़ता है। बिना पेड़ों के मिट्टी पानी को सोख नहीं पाती, जिससे बंजरपन बढ़ता है।

2. ज्यादा चराई: जानवरों द्वारा एक ही जगह पर बार-बार चरने से घास और पौधे उगना बंद हो जाते हैं, जिससे मिट्टी खुली रहती है और हवा या पानी इसे बहा ले जाता है।

3. गलत खेती के तरीके: रासायनिक उर्वरकों का ज्यादा इस्तेमाल, फसल चक्र न अपनाना और खराब सिंचाई मिट्टी को बंजर बनाती है।

4. जलवायु परिवर्तन: बढ़ता तापमान, अनियमित बारिश और ग्लेशियरों का पिघलना सूखे और मरुस्थलीकरण को बढ़ावा देता है।

5. पानी का दुरुपयोग औद्योगिक और घरेलू जरूरतों के लिए पानी का बेतहाशा इस्तेमाल भूजल स्तर को नीचे ले जाता है, जिससे सूखे की स्थिति बनती है।

आज दुनिया की 23% जमीन उत्पादक नहीं रही और 75% जमीन को उसकी प्राकृतिक अवस्था से बदल दिया गया है। भारत में भी 29.3% जमीन मरुस्थलीकरण से प्रभावित है।

प्रभाव: धरती और इंसान पर क्या असर?


मरुस्थलीकरण और सूखे का असर सिर्फ मिट्टी या पानी तक सीमित नहीं, बल्कि यह इंसानी जिंदगी को कई तरह से प्रभावित करता है:

1. खाद्य असुरक्षा: बंजर जमीन और सूखे से फसलें बर्बाद होती हैं, जिससे भुखमरी बढ़ती है। दुनिया की 95% खाद्य आपूर्ति कृषि भूमि पर निर्भर है, लेकिन एक-तिहाई जमीन खराब हो चुकी है।

2. गरीबी और पलायन: खेती बर्बाद होने से किसान और ग्रामीण समुदाय गरीबी में डूब जाते हैं। मजबूरी में उन्हें शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। 3.2 अरब लोग आज भूमि क्षरण से प्रभावित हैं।

3. पानी की कमी: सूखे से पीने का पानी और सिंचाई के लिए पानी मिलना मुश्किल हो जाता है। 2050 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी सूखे से प्रभावित हो सकती है।

4. जैव विविधता का नुकसान: मरुस्थलीकरण से पौधों और जानवरों की प्रजातियां खत्म हो रही हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है।

5. जलवायु संकट: बंजर जमीन कार्बन को सोखने की क्षमता खो देती है, जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है। हर साल 24 अरब टन उपजाऊ मिट्टी खो रही है।

समाधान: क्या कर सकते हैं हम?

मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटना मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। इसके लिए व्यक्तिगत, सामुदायिक और वैश्विक स्तर पर कदम उठाने होंगे। कुछ उपाय इस प्रकार हैं:

1. पेड़ लगाना: पेड़ मिट्टी को बांधे रखते हैं, बारिश को आकर्षित करते हैं और कार्बन सोखते हैं। भारत का हरित भारत मिशन 2014 में शुरू हुआ, जिसका लक्ष्य वनों को बढ़ाना और बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना है।

2. सतत खेती: फसल चक्र, जैविक खाद और ड्रिप सिंचाई जैसे तरीके मिट्टी की उर्वरता बनाए रखते हैं।

3. पानी का संरक्षण: वर्षा जल संचयन, तालाबों का निर्माण और पानी की बर्बादी रोकना सूखे से निपटने में मदद करता है।

4. जागरूकता फैलाना: स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में मरुस्थलीकरण और सूखे के खतरों के बारे में पढ़ाना जरूरी है। इस दिन रैलियां, सेमिनार और पौधरोपण जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

5. वैश्विक सहयोग: UNCCD और बॉन चुनौती जैसे वैश्विक प्रयास बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने में मदद कर रहे हैं। भारत ने 2030 तक 2.1 करोड़ हेक्टेयर बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का लक्ष्य रखा है।

भारत की भूमिका

भारत मरुस्थलीकरण और सूखे से बुरी तरह प्रभावित देशों में से एक है। राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बंजर जमीन का क्षेत्र बढ़ रहा है। लेकिन भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। बॉन चुनौती के तहत भारत ने 2020 तक 150 मिलियन हेक्टेयर और 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर बंजर जमीन पर वनस्पति उगाने का वादा किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पर्यावरण संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाया है। उन्होंने जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे जल शक्ति अभियान और नमामि गंगे।

2025 का संदेश

2025 में विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस हमें एक बार फिर यह सोचने का मौका देगा कि हम अपनी धरती को कैसे बचा सकते हैं। इस साल की थीम भले ही अभी घोषित न हुई हो, लेकिन इसका संदेश वही होगा एकजुट होकर जमीन, पानी और हरियाली को बचाना।


यह दिन हमें याद दिलाता है कि धरती हमारी मां है और उसकी देखभाल करना हमारा फर्ज है। एक पेड़ लगाकर, पानी की बूंद बचाकर या दूसरों को जागरूक करके हम इस जंग में अपना योगदान दे सकते हैं। आइए, इस 17 जून को संकल्प लें कि हम अपनी धरती को हरा-भरा रखेंगे, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी इसकी गोद में सांस ले सकें।

विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस सिर्फ एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि एक वैश्विक आह्वान है। यह हमें बताता है कि मिट्टी, पानी और हरियाली के बिना हमारा वजूद अधूरा है। मरुस्थलीकरण और सूखा आज की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियां हैं, लेकिन अगर हम एकजुट होकर सही कदम उठाएं, तो धरती को फिर से हरा-भरा बनाना मुमकिन है। यह दिन हमें जिम्मेदारी का अहसास कराता है, न सिर्फ अपने लिए, बल्कि उन अरबों लोगों के लिए जो इस धरती पर हमसे पहले आए और जो हमसे बाद में आएंगे। तो आइए, इस धरती को बचाने की जंग में शामिल हों, क्योंकि यह जंग सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि हमारी अपनी जिंदगी की है।

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Akshita Pidiha is a former Senior Content Writer at Newstrack.com.

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