बिहार का जनादेश: नए भारत के नेतृत्व पर भरोसा, हिंदूविरोधी राजनीति को जनता ने नकारा

एनडीए की भारी जीत ने मोदी-शाह नेतृत्व को मजबूत आधार दिया, महागठबंधन की नकारात्मक राजनीति और वोट चोरी के आरोपों को जनता ने पूरी तरह खारिज किया।

Acharya Mahamandaleshwar Sanjay Tiwari
Published on: 15 Nov 2025 4:32 PM IST
Bihar Janadesh
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Bihar Janadesh (Photo_ Social Media)

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे केवल सत्ता परिवर्तन या सरकार गठन की औपचारिक कहानी नहीं हैं, बल्कि यह नए भारत के विराट नेतृत्व के प्रति गहरी आस्था का ऐसा प्रमाण हैं, जिसने भारत की राष्ट्रीय राजनीति को स्थिरता का नया आधार दिया है। जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अपमानजनक भाषा, सनातन पर हमले और समाज को बांटने वाली राजनीति की अब कोई जगह नहीं बची है। सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति भावनाओं को बिहार ने एक बार फिर सबसे ऊपर रखा है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर भरोसा, अमित शाह की सूक्ष्म रणनीति और एनडीए घटक दलों के बीच अद्भुत तालमेल ने चुनाव को एकतरफा बना दिया। इस चुनाव ने उन सभी अटकलों को खत्म कर दिया जो केंद्र सरकार को लेकर अस्थिरता का भ्रम फैलाती थीं। महिलाओं का उत्साह और समर्थन इस जीत का निर्णायक पक्ष रहा।

चुनाव प्रक्रिया की शुरुआत से ही इंडी गठबंधन वोट चोरी, चुनाव आयोग पर संदेह और अशांति फैलाने वाली भाषा के सहारे माहौल बनाने में लगा था। उन्हें उम्मीद थी कि युवाओं का एक वर्ग इस आक्रामकता से प्रभावित होगा और परिणाम नेपाल जैसी ‘जेन-जेड क्रांति’ की तरह सामने आएंगे। मंचों पर वे नेता लाए गए जो अपने राज्यों में हिंदुत्व विरोधी एजेंडा चला रहे हैं। लेकिन बिहार ने इस प्रयोग को सिरे से खारिज कर दिया।

चुनाव को दिलचस्प मोड़ तब मिला जब प्रशांत किशोर ने पूरे बिहार में अभियान चलाते हुए दावा किया कि जदयू 25 से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाएगी। जनसुराज की पूरी फौज मैदान में उतार दी गई, मुद्दों को उभारा गया, लेकिन जनता ने भरोसा सिर्फ एनडीए पर दिखाया। 20 साल पुराने जंगलराज की कथाएँ फिर से चुनावी विमर्श में लौट आईं और युवाओं व महिलाओं ने सुरक्षा, स्थिरता और विकास के पक्ष में मतदान किया।

मगध समेत पूरे बिहार में अमित शाह की योजनाबद्ध रणनीति काम कर गई। मोदी-नीतीश की जोड़ी और चिराग पासवान, जीतनराम मांझी, भूपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं की एकजुट उपस्थिति ने एनडीए को एक मजबूत ‘बिहारी फ्रंट’ दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम, केंद्र की नीतियों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के संदेश को जनता ने हाथोंहाथ लिया। छठ महापर्व से लेकर महिला कल्याण योजनाओं तक, एनडीए की पूरी चुनावी पिच स्थानीय भावनाओं के बिल्कुल अनुरूप रही।

लालू परिवार की अंदरूनी खाई और प्रशांत किशोर द्वारा जंगलराज को याद दिलाने वाली रणनीति ने राजद को नुकसान पहुंचाया। तेजस्वी यादव का युवा चेहरा सोशल मीडिया पर भले छाया दिखा हो, लेकिन वोटों में तब्दील नहीं हो पाया। तेजप्रताप यादव का सहज और सरल व्यक्तित्व अप्रत्याशित रूप से चर्चा में रहा।

इंडी गठबंधन के सोशल मीडिया अभियान को खूब लाइक मिले, पर वोट नहीं—यही वास्तविकता रही। कई यूट्यूबरों ने माहौल बनाया कि नीतीश सरकार जा रही है, पर जमीन का सच बिल्कुल उलटा निकला। उत्तर प्रदेश में भाजपा के वर्तमान सहयोगी ओमप्रकाश राजभर तक ने दावा किया था कि बिहार में मोदी-शाह के सामने एक लड़का (तेजस्वी) भारी पड़ जाएगा, लेकिन परिणामों ने इन सभी अनुमानों की ‘मुक्ति’ तय कर दी है।

बिहार का यह जनादेश केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि स्थायित्व, सुरक्षा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्ष में उठी एक सशक्त जनलहर है।

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