साम्यवाद का अधूरा स्वप्न: क्रांति की महानता, सत्ता के अंतर्विरोध और जनतंत्र की अनिवार्यता

Communism History: साम्यवाद का इतिहास, मार्क्स का दर्शन, स्टालिन का शासन, सोवियत संघ का विघटन और जनवादी केंद्रीयता के अंतर्विरोध समझिए। क्या आर्थिक समानता और राजनीतिक स्वतंत्रता साथ चल सकती हैं?

Yogesh Mishra
Published on: 24 Oct 2026 1:37 PM IST
Communism History Karl Marx | Soviet Union Collapse | Socialism and Democracy | Newstrack
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Communism History Karl Marx | Soviet Union Collapse | Socialism and Democracy | Newstrack

Communism History: मानव सभ्यता के इतिहास में बहुत कम विचार ऐसे हुए हैं जिन्होंने केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं। बल्कि मनुष्य और समाज के संबंधों को बुनियादी रूप से बदलने का स्वप्न देखा हो। साम्यवाद उन्हीं विचारों में एक है। उसने उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी जिसमें उत्पादन का वास्तविक आधार करोड़ों मनुष्यों का श्रम होता है। लेकिन उस श्रम से उत्पन्न संपत्ति, सुविधाओं और संसाधनों का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत सीमित वर्गों के नियंत्रण में केंद्रित हो सकता है। उसने यह प्रश्न उठाया कि यदि सभ्यता का निर्माण सामूहिक श्रम से हुआ है, तो उसकी उपलब्धियों का लाभ भी अधिक न्यायपूर्ण ढंग से वितरित क्यों नहीं होना चाहिए? यदि विज्ञान और तकनीक मनुष्य की उत्पादक क्षमता को लगातार बढ़ा रहे हैं, तो इस प्रगति का अंतिम उद्देश्य मुनाफे का विस्तार होना चाहिए या मनुष्य को अभाव, असुरक्षा और शोषण से मुक्त करना? और यदि राजनीतिक लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को समान मताधिकार देता है, तो आर्थिक विषमता के कारण उत्पन्न शक्ति के असमान वितरण को किस प्रकार समझा जाए? साम्यवाद ने इन प्रश्नों को केवल दार्शनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया। बल्कि उन्हें राजनीतिक संगठन, सामाजिक आंदोलन और क्रांतिकारी परिवर्तन की ठोस कार्ययोजना से जोड़ा।

लेकिन साम्यवाद का इतिहास जितना उसकी महान आकांक्षाओं का इतिहास है, उतना ही उसके गंभीर अंतर्विरोधों का भी। जिन क्रांतिकारियों ने गरीबों और श्रमिकों के अधिकारों के लिए अपने जीवन समर्पित किए, उन्हीं की विचारधारा के नाम पर स्थापित कुछ राज्यव्यवस्थाओं में नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित की गईं। जिन संगठनों ने सामूहिक नेतृत्व, आलोचना और आत्मालोचना को अपनी शक्ति माना, उनमें कई बार व्यक्तिपूजा और निरंकुश सत्ता विकसित हुई। जिन व्यवस्थाओं ने वर्गहीन समाज का स्वप्न देखा, उनमें एक विशेषाधिकार प्राप्त राजनीतिक नौकरशाही का उदय हुआ। और जिन देशों ने औद्योगिकीकरण, शिक्षा, विज्ञान तथा सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं, वे राजनीतिक जड़ता, आर्थिक असंतुलन और प्रशासनिक केंद्रीकरण के संकट से भी घिरे। इसलिए साम्यवाद का मूल्यांकन न तो उसकी ऐतिहासिक उपलब्धियों को नकारकर किया जा सकता है और न उसकी त्रुटियों तथा अपराधों पर पर्दा डालकर।

सोवियत संघ के दिसंबर 1991 में हुए विघटन को लेकर विश्व में लंबे समय तक यह बहस चलती रही कि क्या यह साम्यवाद के दर्शन की पराजय थी अथवा उस राज्यसत्ता की विफलता, जिसने समाजवादी आदर्शों को लागू करने के दौरान अपने ही मूल सिद्धांतों से दूरी बना ली थी। इस प्रश्न का आसान उत्तर नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि किसी भी विचारधारा की वास्तविक परीक्षा सत्ता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि सत्ता के संचालन में होती है। उसका मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह व्यक्ति को कितनी स्वतंत्रता देती है, सामान्य नागरिक को निर्णय प्रक्रिया में कितना भागीदार बनाती है और अपनी गलतियों को पहचानने तथा सुधारने की कितनी क्षमता रखती है। इसी कसौटी पर साम्यवाद की निष्ठा, क्रांतिकारी परंपरा, जनवादी केंद्रीयता और भविष्य की संभावनाओं को परखने की आवश्यकता है।

साम्यवाद की पराजय या समाजवादी राज्यसत्ता का संकट?

बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ में हुए राजनीतिक परिवर्तनों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में साम्यवादी व्यवस्था की ऐतिहासिक विफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया। 1989 में बर्लिन की दीवार का गिरना, पोलैंड और हंगरी में राजनीतिक परिवर्तन, चेकोस्लोवाकिया की मखमली क्रांति, रोमानिया में सत्ता का हिंसक परिवर्तन और अंततः सोवियत संघ का विघटन उस विश्व व्यवस्था के समाप्त होने के प्रतीक थे, जिसने लगभग सात दशकों तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया था। लेकिन इन घटनाओं को केवल पूंजीवाद और साम्यवाद के वैचारिक संघर्ष की अंतिम परिणति मान लेना ऐतिहासिक जटिलताओं की उपेक्षा होगी। सोवियत व्यवस्था के पतन में आर्थिक ठहराव, उत्पादन संबंधी समस्याओं, प्रशासनिक जड़ता, राजनीतिक असहमति पर प्रतिबंध, राष्ट्रीयताओं के बीच तनाव, शीतयुद्ध की सैन्य प्रतिस्पर्धा और सुधारों की विफल प्रक्रिया की भूमिका रही।

अगस्त, 1991 में सोवियत संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के एक समूह ने मिखाइल गोर्बाचोव की सुधारवादी नीतियों और प्रस्तावित संघीय पुनर्गठन का विरोध करते हुए सत्ता अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया। 19 अगस्त को शुरू हुआ यह तख्तापलट 21 अगस्त तक विफल हो गया। बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में मास्को स्थित रूसी संसद भवन के बाहर प्रतिरोध हुआ। इस दौरान तीन नागरिकों की मृत्यु हुई। लेकिन व्यापक गृहयुद्ध नहीं हुआ। इस घटना में दो महत्वपूर्ण तथ्य दिखाई देते हैं। पहला, सोवियत सत्ता-प्रतिष्ठान का एक हिस्सा राजनीतिक परिवर्तन को बलपूर्वक रोकने का प्रयास कर रहा था। दूसरा, राजनीतिक संकट के बावजूद सोवियत संघ का विघटन किसी व्यापक सैन्य संघर्ष में नहीं बदला। यह कहना कि सभी साम्यवादी नेताओं ने स्वेच्छा से शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन स्वीकार कर लिया, वास्तविकता का सरलीकरण होगा। किंतु यह भी सच है कि विशाल सैन्य शक्ति वाले सोवियत राज्य का अंतिम विघटन अपेक्षाकृत सीमित प्रत्यक्ष हिंसा के साथ हुआ।

पूर्वी यूरोप में भी सत्ता परिवर्तन की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं। पोलैंड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी और चेकोस्लोवाकिया में राजनीतिक परिवर्तन के अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रास्ते सामने आए, जबकि रोमानिया में रक्तपात हुआ। निकोलाए चाउसेस्कू के शासन के पतन के दौरान प्रारंभिक समाचारों में मृतकों की संख्या अत्यधिक बढ़ाकर बताई गई थी। बाद की ऐतिहासिक पड़तालों में दिसंबर 1989 की रोमानियाई क्रांति के दौरान लगभग 1,104 लोगों की मृत्यु का विवरण मिलता है। इस तथ्य से प्रारंभिक प्रचार के कई दावे गलत सिद्ध होते हैं। लेकिन यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि रोमानिया में राज्यसत्ता का दमन या गंभीर हिंसा हुई ही नहीं थी। चाउसेस्कू और उनकी पत्नी एलेना को जिस संक्षिप्त सैन्य मुकदमे के बाद मृत्युदंड दिया गया, उसकी न्यायिक निष्पक्षता भी विवादित रही। इतिहास की ईमानदार व्याख्या में प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध हिंसा और सत्ता परिवर्तन के बाद अपनाई गई अनुचित न्यायिक प्रक्रिया, दोनों की आलोचना आवश्यक है।

चीन में जून 1989 की तियानमेन घटनाओं का मूल्यांकन भी इसी सावधानी के साथ होना चाहिए। बीजिंग में राजनीतिक सुधार, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और नागरिक अधिकारों की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध 3 और 4 जून को चीनी सेना ने बल प्रयोग किया। मृतकों की अंतिम संख्या आज भी निश्चित नहीं है। चीनी अधिकारियों के प्रारंभिक विवरण और स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों तथा प्रत्यक्षदर्शियों के अनुमान अलग-अलग हैं। किंतु उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य यह स्थापित करते हैं कि बीजिंग की सड़कों पर बड़ी संख्या में नागरिकों की मृत्यु हुई। इसलिए केवल किसी सीमित आधिकारिक आंकड़े या कथित उपग्रह चित्रों के आधार पर व्यापक दमन से इनकार करना उचित नहीं है। साम्यवाद का कोई भी गंभीर मूल्यांकन ऐसी घटनाओं को छिपाने के बजाय उनसे उत्पन्न राजनीतिक और नैतिक प्रश्नों का सामना करेगा।

स्टालिन का विरोधाभास और साम्यवादी निष्ठा की कसौटी

साम्यवादियों की निष्ठा, साहस और बलिदान की परंपरा पर विचार करते समय स्टालिन का इतिहास सबसे गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है। उनके नेतृत्व में सोवियत संघ ने तीव्र औद्योगिकीकरण किया, भारी उद्योगों का विकास किया और ऐसी सैन्य क्षमता निर्मित की जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में नाजी जर्मनी को पराजित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। लेकिन यही काल जबरन सामूहिकीकरण, व्यापक अकाल, राजनीतिक शुद्धीकरण, श्रम शिविरों और लाखों नागरिकों के दमन का भी इतिहास है। इस विरोधाभास को किसी एक पक्ष की सहायता से समाप्त नहीं किया जा सकता।

स्टालिन के शासन की कठोरता को समझने के लिए तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है। 1917 की रूसी क्रांति के बाद गृहयुद्ध, विदेशी हस्तक्षेप और आर्थिक विनाश ने नए राज्य के सामने गंभीर समस्याएँ उत्पन्न की थीं। बाद में यूरोप में फासीवाद का उदय और नाजी जर्मनी की आक्रामकता सोवियत सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनी। लेकिन इन परिस्थितियों को राज्य द्वारा राजनीतिक विरोधियों और निर्दोष नागरिकों पर किए गए दमन का औचित्य नहीं माना जा सकता। बाहरी संकट और आंतरिक राजनीतिक आतंक अलग-अलग ऐतिहासिक प्रश्न हैं। किसी व्यवस्था की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदमों और सत्ता के मनमाने उपयोग के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।

स्टालिन काल की एक गंभीर समस्या यह थी कि पार्टी के भीतर आलोचना और आत्मालोचना की परंपरा का बड़ा हिस्सा भय और राजनीतिक नियंत्रण के अधीन आ गया। राजनीतिक असहमति को कई बार षड्यंत्र माना गया और नेतृत्व की आलोचना करने वाले व्यक्तियों को कठोर दंड दिए गए। इससे संगठन के भीतर स्वतंत्र वैचारिक विकास बाधित हुआ। मार्क्सवाद की द्वंद्वात्मक पद्धति सामाजिक अंतर्विरोधों के निरंतर अध्ययन पर बल देती है। लेकिन यदि स्वयं साम्यवादी नेतृत्व को आलोचना से ऊपर मान लिया जाए, तो यह पद्धति अपनी ही राजनीतिक संस्थाओं के सामने निष्प्रभावी हो जाती है।

लेनिन ने अपने जीवन के अंतिम दौर में पार्टी के नेतृत्व और स्टालिन के हाथों में बढ़ती शक्ति को लेकर चिंता व्यक्त की थी। 4 जनवरी, 1923 की टिप्पणी में उन्होंने स्टालिन को महासचिव पद से हटाने पर विचार करने की सलाह दी। यह चेतावनी बताती है कि नेतृत्व के केंद्रीकरण का संकट सोवियत व्यवस्था के आरंभिक वर्षों में ही पहचाना जाने लगा था। हालांकि यह भी स्वीकार करना चाहिए कि एकदलीय सत्ता और राजनीतिक दमन की अनेक संस्थागत प्रवृत्तियाँ स्टालिन से पहले विकसित हो चुकी थीं।

साम्यवाद की नैतिक परीक्षा के लिए यह स्वीकार करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति की क्रांतिकारी निष्ठा या किसी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ उसके सभी निर्णयों को उचित नहीं बना देतीं। समाजवादी औद्योगिकीकरण और नाजी जर्मनी के विरुद्ध विजय का महत्व अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक आतंक और नागरिक अधिकारों का हनन भी उसी इतिहास का हिस्सा है।

फासीवाद के विरुद्ध साम्यवादियों का संघर्ष और बलिदान

साम्यवाद की ऐतिहासिक भूमिका का एक उल्लेखनीय पक्ष फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष है। जर्मनी में हिटलर के उदय, इटली में मुसोलिनी की सत्ता और यूरोप में फासीवादी आंदोलनों के विस्तार के दौरान अनेक साम्यवादी तथा समाजवादी संगठनों ने प्रतिरोध किया। जर्मन कम्युनिस्ट नेता अर्न्स्ट थेलमान को 1933 में गिरफ्तार किया गया और 1944 में उनकी हत्या कर दी गई। चेकोस्लोवाकिया के पत्रकार और साम्यवादी प्रतिरोध सेनानी जूलियस फूचीक को 1943 में फाँसी दी गई। उनके जेल-लेखन ने प्रतिरोध साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। फ्रांस, इटली, यूगोस्लाविया, पोलैंड और अन्य देशों में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भूमिगत आंदोलन तथा सशस्त्र प्रतिरोध में भाग लिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध में सोवियत संघ के नागरिकों और सैनिकों का बलिदान असाधारण था। आधुनिक ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार इस युद्ध में लगभग 2 करोड़ 70 लाख सोवियत नागरिकों और सैनिकों की मृत्यु हुई। लेनिनग्राद की घेराबंदी, स्टालिनग्राद का युद्ध, कुर्स्क की लड़ाई और बर्लिन तक लाल सेना की प्रगति ने नाजी जर्मनी की पराजय में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन इस योगदान को केवल कम्युनिस्ट पार्टी की उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा। सोवियत संघ के विभिन्न राष्ट्रीय समुदायों, सामान्य नागरिकों, सैनिकों तथा पश्चिमी मित्र राष्ट्रों के संयुक्त प्रयासों ने नाजी जर्मनी को पराजित किया।

नाजी शासन की अमानवीयता का सबसे भयावह उदाहरण उसका संगठित नरसंहार था। ऑशविट्ज-बिरकेनाउ शिविर परिसर में लगभग 11 लाख लोगों की हत्या हुई, जिनमें करीब 10 लाख यहूदी थे। इसके अतिरिक्त पोलिश नागरिक, रोमा और सिंती समुदाय के लोग, सोवियत युद्धबंदी तथा अन्य राष्ट्रीयताओं के लोग भी मारे गए। नाजी शासन ने राजनीतिक विरोधियों और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को भी उत्पीड़ित किया। नूर्नबर्ग मुकदमों ने यह स्पष्ट किया कि नाजी अपराध केवल सैनिक हिंसा नहीं थे, बल्कि राज्य, प्रशासन और अनेक संस्थाओं के सहयोग से संचालित संगठित अपराध थे।

इस संघर्ष में साम्यवादियों की भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु फासीवाद का प्रतिरोध केवल उन्हीं तक सीमित नहीं था। उदार लोकतंत्रवादी, समाजवादी, धार्मिक समूह और अनेक स्वतंत्र नागरिक भी इस संघर्ष में शामिल थे। इसी प्रकार जर्मन राष्ट्रीयता के सभी व्यक्तियों को नाजी अपराधों का समान रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। इतिहास में राष्ट्रों, विचारधाराओं और व्यक्तियों के उत्तरदायित्व को अलग-अलग समझना आवश्यक है।

साम्यवादियों की संघर्षशील परंपरा का एक अन्य आधार 1871 का पेरिस कम्यून था। फ्रांस की राजधानी में श्रमिकों और क्रांतिकारी समूहों द्वारा स्थापित इस अल्पकालिक शासन को फ्रांसीसी राज्यसत्ता ने बलपूर्वक समाप्त किया। कम्यून की पराजय के बाद हजारों लोग मारे गए। इस घटना ने आगे चलकर श्रमिक सत्ता, राजनीतिक संगठन और क्रांति संबंधी मार्क्सवादी चिंतन को प्रभावित किया।

एशिया में चीनी क्रांति, वियतनाम का राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और कोरियाई युद्ध ने साम्यवादी आंदोलनों की सैन्य तथा राजनीतिक भूमिका को व्यापक बनाया। चीन में जापानी आक्रमण के विरुद्ध कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली आठवीं रूट सेना और नई चौथी सेना ने प्रतिरोध किया, हालांकि चीनी राष्ट्रवादी सेनाओं ने भी इस युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1949 में चीन जनवादी गणराज्य की स्थापना के बाद विश्व राजनीति में नया शक्ति-संतुलन उभरा। 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध में चीनी जन स्वयंसेवक सेना की भागीदारी ने अमेरिका और उसके सहयोगियों के सैन्य अनुमानों को प्रभावित किया।

वियतनाम में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में साम्यवादी आंदोलन ने औपनिवेशिक शासन तथा विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के विरुद्ध लंबे संघर्ष का नेतृत्व किया। क्यूबा की 1959 की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी राजनीति के महत्वपूर्ण प्रतीक बने। अफ्रीका, विशेषकर अंगोला में क्यूबाई सैन्य भागीदारी ने क्षेत्रीय राजनीतिक संघर्षों को प्रभावित किया। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि साम्यवादी आंदोलन ने राष्ट्रीय सीमाओं से परे राजनीतिक एकजुटता की एक प्रभावशाली परंपरा विकसित की।

श्रम की गरिमा और ऐतिहासिक भौतिकवाद का दर्शन

साम्यवाद की वैचारिक शक्ति का मूल आधार ऐतिहासिक भौतिकवाद था। मार्क्स और एंगेल्स ने इतिहास को केवल महान व्यक्तियों, युद्धों और राजकीय निर्णयों के माध्यम से समझने के बजाय उत्पादन संबंधों, संपत्ति, श्रम और वर्गीय संघर्षों के संदर्भ में देखने का प्रयास किया। उन्होंने यह तर्क प्रस्तुत किया कि समाज की आर्थिक संरचना उसकी राजनीतिक और वैचारिक संस्थाओं को गहराई से प्रभावित करती है।

इस दृष्टिकोण ने उन लोगों को सामाजिक महत्व दिया जिन्हें परंपरागत समाज में उपेक्षित माना जाता था। किसान, मजदूर, भूमिहीन श्रमिक और गरीब समुदाय केवल सहायता प्राप्त करने वाले लोग नहीं थे।बल्कि सामाजिक परिवर्तन की संभावित शक्ति भी थे। भारतीय साहित्य में प्रेमचंद के ‘होरी’ जैसा किसान इसी दृष्टि से इतिहास का सक्रिय पात्र बन सकता था।

साम्यवाद ने श्रम और वैज्ञानिक प्रगति के बीच गहरा संबंध स्थापित किया। उसका विश्वास था कि प्रकृति को समझने और उत्पादन की शक्तियों को विकसित करने से मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा कर सकता है। विज्ञान को अंधविश्वास तथा सामाजिक जड़ता के विरुद्ध ज्ञान के साधन के रूप में देखा गया। लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण से विज्ञान केवल किसी एक विचारधारा की उपलब्धि नहीं है। उसका विकास विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और संस्थागत प्रयासों से हुआ है।

मार्क्स ने धर्म को सामाजिक पीड़ा और सांत्वना के संबंध में समझने का प्रयास किया। उनकी आलोचना का आशय यह था कि केवल आध्यात्मिक सांत्वना से भौतिक अन्याय समाप्त नहीं होता। हालांकि धर्म की भूमिका केवल सामाजिक यथास्थिति बनाए रखने तक सीमित नहीं रही है। धार्मिक परंपराओं ने अनेक समाजों में समानता, सेवा, परोपकार तथा अन्याय के प्रतिरोध को भी प्रेरित किया है। इसलिए किसी आधुनिक समतामूलक दर्शन को मनुष्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विविधता को स्वीकार करना होगा।

जनवादी केंद्रीयता की अवधारणा और उसका वास्तविक संकट

साम्यवादी संगठनों की कार्यप्रणाली में जनवादी केंद्रीयता का सिद्धांत महत्वपूर्ण था। इसका आशय यह था कि राजनीतिक दल के भीतर व्यापक विचार-विमर्श, आलोचना और निर्णय की लोकतांत्रिक प्रक्रिया हो। लेकिन सामूहिक निर्णय के बाद संगठन अनुशासित ढंग से उसे लागू करे। इस सिद्धांत में संगठनात्मक एकता और लोकतांत्रिक भागीदारी को साथ रखने का प्रयास दिखाई देता है।

लेकिन व्यवहार में इसकी सबसे बड़ी समस्या तब उत्पन्न हुई जब केंद्रीयता ने जनवादी तत्व को कमजोर कर दिया। नेतृत्व की आलोचना सीमित होने लगी, संगठन के निर्णयों पर स्वतंत्र बहस कठिन होती गई और शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों को हटाने की वास्तविक क्षमता कमजोर पड़ गई। परिणामस्वरूप निर्णय प्रक्रिया में औपचारिक सहमति बनी रहती थी। लेकिन स्वतंत्र विचार-विमर्श का आधार संकुचित होता गया।

किसी स्वैच्छिक राजनीतिक संगठन का अनुशासन और राज्य के सभी नागरिकों पर लागू राजनीतिक व्यवस्था अलग-अलग विषय हैं। राजनीतिक दल के सदस्य अपनी सहमति से संगठनात्मक नियम स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन किसी देश के सभी नागरिकों पर एक ही दल की विचारधारा लागू करना नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न पैदा करता है। इसी कारण जनवादी केंद्रीयता को संपूर्ण समाज के शासन सिद्धांत के रूप में लागू करने के ऐतिहासिक अनुभव विवादास्पद रहे हैं।

जनवादी केंद्रीयता की वास्तविक परीक्षा यह है कि क्या सामान्य सदस्य नेतृत्व के निर्णयों पर स्वतंत्र आपत्ति कर सकता है? क्या नेतृत्व बदलने की प्रभावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया मौजूद है? क्या असहमति रखने वाले व्यक्ति की गरिमा और नागरिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हों, तो केंद्रीयता का लोकतांत्रिक स्वरूप कमजोर पड़ जाता है।

साम्यवादी संगठनों ने राजनीतिक प्रशिक्षण, स्वाध्याय, छोटे समूहों में कार्य, सामूहिक मूल्यांकन तथा आत्मालोचना पर विशेष बल दिया। ये संगठनात्मक पद्धतियाँ सामूहिक कार्यक्षमता विकसित कर सकती हैं। लेकिन कोई निश्चित समूह आकार—जैसे नौ से पंद्रह या बीस से पच्चीस सदस्य—सभी परिस्थितियों में प्रभावी होगा, ऐसा सार्वभौमिक वैज्ञानिक निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है। संगठन की सफलता उसके उद्देश्य, नेतृत्व, संसाधनों और सदस्यों की स्वतंत्र भागीदारी पर निर्भर करती है।

सर्वहारा अधिनायकत्व, राज्यसत्ता और लोकतंत्र

साम्यवादी राजनीतिक दर्शन में सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की अवधारणा लंबे समय से विवाद का विषय रही है। मार्क्सवादी परंपरा में इसे पूंजीवादी शासन से वर्गहीन समाज की ओर संक्रमण की राजनीतिक अवस्था के रूप में समझा गया। इसका केंद्रीय उद्देश्य पुराने शासक वर्ग के प्रभुत्व को समाप्त करके श्रमिक बहुसंख्यक की राजनीतिक शक्ति स्थापित करना था।

लेकिन 1917 की रूसी क्रांति के बाद इस सिद्धांत के व्यवहार में गंभीर समस्याएँ सामने आईं। मजदूरों, किसानों और सैनिकों की सोवियत परिषदों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार माना गया, किंतु गृहयुद्ध, आर्थिक संकट, विदेशी हस्तक्षेप और बोल्शेविक नेतृत्व के निर्णयों ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को सीमित कर दिया। राज्य की सुरक्षा संस्थाओं ने व्यापक अधिकार प्राप्त किए और एकदलीय सत्ता की संरचना मजबूत होती गई।

यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या क्रांतिकारी परिस्थितियों में अपनाए गए आपात उपायों को स्थायी शासन व्यवस्था बना दिया गया? राजनीतिक संकट की असाधारण स्थिति में लागू प्रतिबंध यदि सामान्य जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाएँ, तो राज्य की निरंकुशता बढ़ सकती है। सोवियत अनुभव में यह समस्या वास्तविक थी।

राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल मतदान करने का अधिकार नहीं है। इसमें अभिव्यक्ति, संगठन, शांतिपूर्ण विरोध, न्यायिक संरक्षण और सत्ता परिवर्तन की वास्तविक संभावना भी शामिल है। यदि श्रमिकों के नाम पर स्थापित सरकार के विरुद्ध स्वयं श्रमिक स्वतंत्र रूप से आवाज नहीं उठा सकते, तो उसके जनवादी चरित्र पर गंभीर प्रश्न उत्पन्न होंगे।

इस संदर्भ में समाजवादी जनतंत्र की भविष्यगत चुनौती स्पष्ट है। उसे आर्थिक समानता के अपने उद्देश्य को नागरिक अधिकारों और स्वतंत्र संस्थाओं के साथ जोड़ना होगा। सामाजिक न्याय और लोकतंत्र को एक-दूसरे का विकल्प मानने के बजाय उनकी परस्पर आवश्यकता को स्वीकार करना होगा।

पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमाएँ और आर्थिक असमानता

साम्यवादी चिंतन ने पूंजीवादी लोकतंत्र की आलोचना करते हुए यह प्रश्न उठाया कि केवल राजनीतिक समानता से वास्तविक सामाजिक समानता सुनिश्चित नहीं होती। एक नागरिक का मत दूसरे नागरिक के मत के बराबर हो सकता है।

लेकिन संपत्ति, शिक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक संसाधनों की असमानता राजनीतिक प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।

यह आलोचना गंभीर अध्ययन का विषय है। चुनावी प्रक्रिया में धन, मीडिया, संगठनात्मक क्षमता और प्रभावशाली आर्थिक समूहों की भूमिका लोकतंत्र की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि बहुदलीय लोकतंत्र या स्वतंत्र न्यायपालिका निरर्थक संस्थाएँ हैं। विभिन्न लोकतांत्रिक देशों में सामाजिक सुरक्षा, श्रमिक अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार राजनीतिक आंदोलनों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ है।

भारत का अनुभव भी इसी जटिलता को दर्शाता है। स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक राजनीति ने व्यापक सामाजिक बदलाव के अवसर दिए। लेकिन गरीबी, सामाजिक विषमता और आर्थिक असुरक्षा की समस्याएँ बनी रहीं। विश्व बैंक के अप्रैल 2026 के भारत विकास संबंधी विश्लेषण के अनुसार, 2021 की क्रयशक्ति समता पर आधारित प्रतिदिन तीन डॉलर की अत्यधिक गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी का अनुपात 2011-12 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में लगभग 2.6 प्रतिशत रह गया। वहीं प्रतिदिन 4.20 डॉलर की निम्न-मध्यम आय वाले देशों की गरीबी रेखा पर यह अनुपात 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत हुआ। ये आंकड़े गरीबी में उल्लेखनीय कमी दर्शाते हैं। लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, आय के वितरण, सार्वजनिक सेवाओं तथा क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियों को समाप्त नहीं करते।

लोकतंत्र की वास्तविक सफलता का मूल्यांकन केवल चुनावों से नहीं। बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि साधारण नागरिक को शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, रोजगार और गरिमापूर्ण जीवन के कितने अवसर मिलते हैं। इसी प्रकार किसी समाजवादी व्यवस्था का मूल्यांकन केवल सार्वजनिक स्वामित्व या योजनाबद्ध उत्पादन के आधार पर नहीं। बल्कि नागरिक स्वतंत्रता और आर्थिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

व्यक्ति की स्वतंत्रता, शोषक अनुबंध और न्याय

समाजवादी चिंतन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक विवशता में किया गया अनुबंध वास्तव में स्वतंत्र सहमति का परिणाम होता है? यदि किसी श्रमिक के पास जीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है और वह अत्यंत असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए बाध्य है, तो उसकी कानूनी स्वतंत्रता तथा वास्तविक विकल्पों के बीच अंतर मौजूद हो सकता है...अगले पेज पर पढ़ें पूरी खबर

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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