साम्यवाद का अधूरा स्वप्न: क्रांति की महानता, सत्ता के अंतर्विरोध और जनतंत्र की अनिवार्यता

Communism History: साम्यवाद का इतिहास, मार्क्स का दर्शन, स्टालिन का शासन, सोवियत संघ का विघटन और जनवादी केंद्रीयता के अंतर्विरोध समझिए। क्या आर्थिक समानता और राजनीतिक स्वतंत्रता साथ चल सकती हैं?

Yogesh Mishra
Published on: 24 Oct 2026 1:37 PM IST

इसी प्रकार अत्यधिक ऋणग्रस्त किसान, कमजोर सौदेबाजी की स्थिति वाला छोटा उत्पादक अथवा आर्थिक निर्भरता में बंधा नागरिक ऐसी शर्तें स्वीकार कर सकता है, जो उसके हितों को नुकसान पहुँचाती हों। समाजवादी आलोचना इसी प्रकार की आर्थिक असमानता को सामने लाती है।

लेकिन यह मानना भी गलत होगा कि बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में सभी अनुबंध शोषक होते हैं अथवा समाजवादी व्यवस्था में ऐसे संबंध स्वतः समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक कानूनी व्यवस्थाओं में श्रम कानून, न्यूनतम मजदूरी, उपभोक्ता संरक्षण, अनुचित संविदाओं के विरुद्ध प्रावधान और सामाजिक सुरक्षा के साधन इसी समस्या का समाधान करने के लिए विकसित हुए हैं।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेने वाले देशों के सामने भी आर्थिक स्वायत्तता का प्रश्न उपस्थित होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा अन्य ऋणदाताओं की शर्तों के प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत हैं। आलोचकों के अनुसार कठोर आर्थिक शर्तें कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक खर्च और सामाजिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि समर्थक उन्हें वित्तीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानते हैं। इनके वास्तविक प्रभाव का मूल्यांकन देश और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।

इसलिए भविष्य की किसी भी समाजवादी परिकल्पना के लिए स्वतंत्र तथा सुलभ न्यायपालिका विशेष महत्व रखेगी। राज्य और निजी आर्थिक शक्ति, दोनों के विरुद्ध नागरिक को प्रभावी कानूनी संरक्षण उपलब्ध होना चाहिए। व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल शोषण से मुक्ति का वादा नहीं। बल्कि अन्याय के विरुद्ध स्वतंत्र संस्था तक पहुँचने का वास्तविक अधिकार भी है।

साम्यवादी संगठन में आलोचना, आत्मालोचना और नेतृत्व परिवर्तन

साम्यवादी संगठनों में आलोचना और आत्मालोचना की ऐतिहासिक परंपरा रही है। इसका उद्देश्य कार्यकर्ताओं को अपनी गलतियों की पहचान करने, संगठन के निर्णयों का मूल्यांकन करने तथा सामूहिक उद्देश्य के प्रति उत्तरदायी बनाए रखना था। लेकिन इस पद्धति की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आलोचना स्वतंत्र और सुधारात्मक हो, न कि भय पैदा करने तथा राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने का माध्यम।

आलोचना का पहला उद्देश्य संगठन और व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ाना होना चाहिए। दूसरा, नेतृत्व सहित सभी पदाधिकारी सार्वजनिक और संगठनात्मक समीक्षा के अधीन हों। तीसरा, असहमति के कारण किसी सदस्य को मनमाने दंड का सामना न करना पड़े। चौथा, आलोचना का उत्तर शक्ति के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि तर्क, तथ्यों और सिद्धांतों के स्पष्टीकरण से दिया जाए।

स्टालिनकाल में इस सिद्धांत का विकृत रूप सामने आया। राजनीतिक शुद्धीकरण अभियानों में अनेक लोगों से ऐसे अपराध स्वीकार कराए गए जो उन्होंने किए ही नहीं थे। आत्मालोचना का अर्थ स्वतंत्र विवेक के बजाय सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण बनता गया।

यहीं साम्यवाद की संगठनात्मक संरचना का सबसे महत्वपूर्ण अंतर्विरोध सामने आता है। यदि नेतृत्व को हटाने का वास्तविक अधिकार संगठन के पास नहीं है, तो अनुशासन धीरे-धीरे व्यक्ति-निष्ठा में बदल सकता है। एक राजनीतिक संगठन की शक्ति केवल अपने सदस्यों की संख्या या निष्ठा में नहीं, बल्कि गलत नेतृत्व को सुधारने तथा बदलने की संस्थागत क्षमता में भी निहित होती है।

साम्यवादी मतभेद, वाम-अवसरवाद और भारत का अनुभव

अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन के भीतर अनेक गंभीर वैचारिक विवाद हुए। मार्क्स और प्रूधों का संघर्ष संपत्ति तथा आर्थिक संगठन के प्रश्नों से जुड़ा था। बाकुनिन के साथ उनका मतभेद क्रांति, राज्यसत्ता और स्वतंत्रता के संबंध में था। लेनिन और प्लेखानोव के बीच रूस की क्रांति की प्रकृति को लेकर विवाद हुआ। ट्रॉटस्की और स्टालिन का संघर्ष अंतरराष्ट्रीय क्रांति, राजनीतिक नेतृत्व तथा सोवियत व्यवस्था की दिशा से जुड़ा था। रोजा लक्जमबर्ग ने क्रांतिकारी आंदोलन में स्वतंत्रता और लोकतंत्र की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।

चीन में माओत्से तुंग और लियू शाओछी के बीच संघर्ष ने साम्यवादी राजनीति के अंतर्विरोधों को उजागर किया। 1966 में शुरू हुई सांस्कृतिक क्रांति के दौरान व्यापक राजनीतिक दमन, सामाजिक अव्यवस्था और हिंसा हुई। इसे केवल क्रांतिकारी उत्साह के रूप में समझना उसके वास्तविक परिणामों को अनदेखा करना होगा।

भारतीय साम्यवादी आंदोलन में भी रणनीतिक और वैचारिक मतभेद लंबे समय से रहे हैं। पी.सी. जोशी और बी.टी. रणदिवे के बीच स्वतंत्रता के आसपास की राजनीतिक दिशा को लेकर गंभीर मतभेद हुए। लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का 1964 का विभाजन केवल इन दोनों नेताओं के विवाद का परिणाम नहीं था। उसके पीछे सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ता मतभेद, भारत-चीन युद्ध, भारतीय राज्य की वर्गीय प्रकृति का विश्लेषण तथा संसदीय राजनीति और क्रांतिकारी संघर्ष के संबंध में विवाद थे।

भारत में वामपंथी राजनीति ने संसदीय लोकतंत्र के भीतर भी महत्वपूर्ण प्रयोग किए। 1957 में केरल में ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में वामपंथी दलों ने भूमि सुधार, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा तथा सामाजिक विकास की नीतियों के माध्यम से महत्वपूर्ण राजनीतिक अनुभव प्राप्त किए। इनके साथ प्रशासनिक चुनौतियाँ, राजनीतिक हिंसा और विकास संबंधी विवाद भी जुड़े रहे।

भारतीय समाज में जाति और वर्ग के संबंध को समझना साम्यवाद के लिए एक विशेष चुनौती रही है। आर्थिक शोषण तथा जातिगत उत्पीड़न कई स्थानों पर जुड़े हुए हैं, लेकिन दोनों को पूर्णतः एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता। सामाजिक सम्मान, सांस्कृतिक अधिकार और जातिगत भेदभाव की समस्याओं का विश्लेषण स्वतंत्र रूप से भी आवश्यक है।

विज्ञान, समाजवाद और आर्थिक नियोजन की सीमाएँ

साम्यवादी व्यवस्थाओं ने विज्ञान और औद्योगिक विकास को व्यापक महत्व दिया। सोवियत संघ ने भारी उद्योग, अंतरिक्ष विज्ञान, शिक्षा तथा तकनीकी अनुसंधान में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। 1957 में स्पुतनिक का प्रक्षेपण और 1961 में यूरी गागरिन की अंतरिक्ष यात्रा इस प्रगति के महत्वपूर्ण प्रतीक थे।

लेकिन केंद्रीकृत आर्थिक नियोजन के सामने उत्पादन की गुणवत्ता, उपभोक्ता आवश्यकताओं, स्थानीय निर्णयों और नवाचार की चुनौतियाँ भी सामने आईं। सोवियत व्यवस्था में कई बार उत्पादन लक्ष्यों को पूरा करने पर इतना जोर दिया गया कि वस्तुओं की वास्तविक उपलब्धता तथा गुणवत्ता पीछे छूट गई। नौकरशाही की बढ़ती भूमिका ने आर्थिक निर्णयों में लचीलापन सीमित किया।

पूंजीवादी बाजार व्यवस्था की अपनी समस्याएँ हैं। आर्थिक असमानता, एकाधिकार, वित्तीय संकट, पर्यावरणीय क्षति और श्रमिकों की असुरक्षा बाजार की स्वचालित प्रक्रिया से हमेशा हल नहीं होतीं। दूसरी ओर योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था में जानकारी के केंद्रीकरण, गलत प्रोत्साहनों और नवाचार की कमी जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

समाजवाद के भविष्य के लिए आवश्यक प्रश्न यह है कि सार्वजनिक हित और आर्थिक दक्षता के बीच किस प्रकार संस्थागत संतुलन स्थापित किया जाए। सार्वजनिक उद्यम, सहकारी संस्थाएँ, कर्मचारी स्वामित्व, स्थानीय उत्पादन और विनियमित निजी उद्यम जैसी विभिन्न व्यवस्थाओं के परिणामों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।

मिलोवान जिलास ने अपनी पुस्तक ‘द न्यू क्लास’ में इसी विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया था कि निजी पूंजीपतियों के स्थान पर राज्य की राजनीतिक नौकरशाही भी विशेषाधिकार प्राप्त समूह बन सकती है। यदि संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण कुछ पदाधिकारियों के हाथों में केंद्रित रहे, तो केवल औपचारिक सार्वजनिक स्वामित्व से आर्थिक लोकतंत्र सुनिश्चित नहीं होगा।

राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक विविधता और वर्गहीन समाज की कल्पना

साम्यवाद ने अंतरराष्ट्रीय श्रमिक एकता को महत्वपूर्ण माना।लेकिन व्यवहार में राष्ट्रीयता, भाषा, धर्म और जातीय पहचान की शक्ति कई बार वर्गीय एकता से अधिक प्रभावी सिद्ध हुई। सोवियत संघ और यूगोस्लाविया के इतिहास में यह विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है।

मनुष्य केवल आर्थिक वर्ग का सदस्य नहीं है। उसकी सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक पहचान, व्यक्तिगत रुचियाँ और समुदाय से संबंध भी उसके राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए वर्गहीन समाज की किसी भी परिकल्पना का अर्थ सभी सामाजिक भिन्नताओं का समाप्त हो जाना नहीं हो सकता।

एक आधुनिक समतामूलक व्यवस्था के भीतर विविध संगठनों, सांस्कृतिक समुदायों, आर्थिक संस्थाओं और जीवनशैलियों के अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक होगा। वास्तविक प्रश्न इन भिन्नताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे किसी नागरिक के शोषण, अपमान या अधिकारों के हनन का आधार न बनें।

समाजवाद के भविष्य में स्वायत्त संस्थाओं की भूमिका विशेष महत्व रख सकती है। स्थानीय स्वशासन, स्वतंत्र नागरिक संगठन, श्रमिक संघ, सहकारी संस्थाएँ और सामाजिक उद्यम ऐसे माध्यम हो सकते हैं जिनसे आर्थिक एवं राजनीतिक शक्ति का विकेंद्रीकरण संभव हो। लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब इन संस्थाओं की स्वतंत्रता वास्तविक हो, केवल राज्य द्वारा प्रदान किया गया औपचारिक अधिकार न हो।

गांधी और लेनिन के बीच संभावित संवाद तथा भारतीय बेरोजगारी

भारत में रोजगार और आर्थिक विकास की समस्या के समाधान के लिए गांधीवादी तथा लेनिनवादी आर्थिक दृष्टियों के बीच संवाद एक उपयोगी बौद्धिक प्रयास हो सकता है। दोनों विचारधाराओं की मूल मान्यताएँ और राजनीतिक पद्धतियाँ भिन्न हैं। गांधी ने ग्रामस्वराज, स्थानीय उत्पादन, नैतिक आत्मसंयम, विकेंद्रीकरण और अहिंसा को महत्व दिया। लेनिनवादी दृष्टि में योजनाबद्ध आर्थिक विकास, संगठित उत्पादन और राज्य की परिवर्तनकारी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

भारत जैसी विशाल और विविध अर्थव्यवस्था में रोजगार की चुनौती केवल बड़े उद्योगों से हल नहीं होगी और न केवल छोटे स्थानीय उद्यमों से। आधुनिक तकनीक, आधारभूत संरचना, विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, सहकारी उत्पादन, ग्रामीण उद्योग और सेवा क्षेत्र की अलग-अलग भूमिकाएँ हैं। इनके बीच संतुलन का प्रश्न अर्थव्यवस्था की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़ा है।

गांधीवादी विकेंद्रीकरण और समाजवादी सामाजिक सुरक्षा के बीच संवाद स्थानीय रोजगार, सहकारी संस्थाओं और सामुदायिक स्वायत्तता के क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है। लेकिन इस समन्वय को केवल वैचारिक घोषणा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए उत्पादकता, बाजार तक पहुँच, तकनीकी क्षमता, वित्तीय संसाधन और रोजगार की गुणवत्ता का व्यावहारिक अध्ययन आवश्यक होगा।

पाश्चात्य अर्थशास्त्र में विकसित गुणक-त्वरक जैसे मॉडल भारतीय संदर्भ में स्वतः अप्रासंगिक नहीं हो जाते। आवश्यकता यह है कि उन्हें भारतीय श्रम बाजार, असंगठित क्षेत्र, कृषि अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की परिस्थितियों के अनुरूप परखा जाए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में साम्यवाद के सामने नए प्रश्न

इक्कीसवीं सदी में साम्यवाद के मूल प्रश्न एक नई तकनीकी पृष्ठभूमि में सामने आ रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, डिजिटल मंच और डेटा आधारित अर्थव्यवस्था उत्पादन तथा रोजगार के स्वरूप को बदल रहे हैं। आज उत्पादन के साधनों की अवधारणा केवल भूमि, कारखाने और मशीन तक सीमित नहीं रह गई है। एल्गोरिदम, डेटा, कंप्यूटिंग क्षमता और डिजिटल अवसंरचना भी आर्थिक शक्ति के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं।

इस परिवर्तन से नए प्रश्न उत्पन्न होते हैं। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव श्रम की उत्पादकता बढ़ाती है, तो उसका आर्थिक लाभ किस प्रकार वितरित होगा? क्या तकनीकी विकास काम के घंटे कम करके जीवन की गुणवत्ता बेहतर करेगा, या कुछ क्षेत्रों में रोजगार असुरक्षा बढ़ाएगा? डिजिटल मंचों और तकनीकी कंपनियों की बढ़ती आर्थिक शक्ति पर लोकतांत्रिक नियंत्रण कैसे स्थापित होगा? और क्या सामाजिक सुरक्षा की पुरानी व्यवस्थाएँ भविष्य के बदलते श्रम बाजार के लिए पर्याप्त होंगी?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक आर्थिक विचारधारा के पास पूर्वनिर्धारित रूप में उपलब्ध नहीं है। इनके समाधान के लिए सार्वजनिक नीति, बाजार विनियमन, श्रमिक प्रशिक्षण, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और नवाचार संबंधी संस्थाओं की आवश्यकता होगी। लेकिन साम्यवाद का श्रम, उत्पादन तथा आर्थिक शक्ति के वितरण पर केंद्रित विश्लेषण इन बहसों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

इतिहास का अंतिम प्रश्न : क्या समानता और स्वतंत्रता साथ चल सकती हैं?

साम्यवाद के इतिहास का सबसे गंभीर विरोधाभास यह रहा है कि उसने आर्थिक समानता के उद्देश्य से राजनीतिक सत्ता को अत्यधिक महत्व दिया। लेकिन कई व्यवस्थाओं में उसी सत्ता पर नागरिक नियंत्रण कमजोर होता गया। जिस विचारधारा ने शोषण समाप्त करने का दावा किया, उसके नाम पर स्थापित कुछ राज्यों में राजनीतिक दमन और नए विशेषाधिकार विकसित हुए।

यह अनुभव केवल साम्यवाद की आलोचना का विषय नहीं। बल्कि आधुनिक राजनीतिक दर्शन का व्यापक प्रश्न है। आर्थिक समानता के बिना नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता सीमित हो सकती है। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक समानता का दावा भी राज्य के नियंत्रण और संरक्षण पर निर्भर हो सकता है। दोनों स्थितियाँ अपने-अपने अंतर्विरोध उत्पन्न करती हैं।

इसलिए भविष्य की किसी भी समतामूलक व्यवस्था के सामने चुनौती यह होगी कि वह सामाजिक सुरक्षा, श्रम की गरिमा, उत्पादन की दक्षता और आर्थिक अवसरों के साथ स्वतंत्र न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नागरिकों की स्वायत्तता को किस प्रकार सुरक्षित रखे।

साम्यवाद की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ उन करोड़ों लोगों के संघर्षों में दिखाई देती हैं जिन्होंने गरीबी, शोषण, फासीवाद और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संगठन बनाए। उसकी विफलताएँ उन व्यवस्थाओं में दिखाई देती हैं जहाँ क्रांति के बाद जनता के नाम पर सत्ता कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं के हाथों में अत्यधिक केंद्रित हो गई।

इतिहास की महानता केवल शासक बदलने में नहीं होती। वह ऐसी संस्थाएँ विकसित करने में होती है जिनसे साधारण मनुष्य अधिक स्वतंत्र, सुरक्षित, सम्मानित और सक्षम बन सके। कोई भी राजनीतिक विचारधारा यदि अपने नेतृत्व को आलोचना से ऊपर रखती है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ही बौद्धिक शक्ति को कमजोर कर सकती है।

साम्यवाद ने मानव सभ्यता के सामने यह प्रश्न रखा था कि दुनिया की संपत्ति और उत्पादन क्षमता का लाभ केवल कुछ लोगों तक सीमित क्यों रहे। यह प्रश्न आज भी महत्वपूर्ण है। लेकिन उसके अनुभवों ने एक दूसरा प्रश्न भी उतनी ही गंभीरता से सामने रखा है—क्या सामाजिक न्याय के नाम पर स्थापित सत्ता को साधारण नागरिक स्वतंत्र रूप से चुनौती दे सकता है?

यही प्रश्न साम्यवाद की भविष्यगत प्रासंगिकता को समझने की केंद्रीय कसौटी है।

किसी विचारधारा की वास्तविक महानता उसके अनुयायियों की निष्ठा, उसकी सेनाओं की शक्ति अथवा उसके नेताओं की प्रतिमाओं से निर्धारित नहीं होती। उसकी कसौटी यह है कि वह सामान्य मनुष्य को कितनी स्वतंत्रता, गरिमा, सुरक्षा और न्याय प्रदान कर सकी। साम्यवाद की ऐतिहासिक विरासत को भी अंततः इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

क्रांति राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। लेकिन मनुष्य की मुक्ति केवल सत्ता परिवर्तन से पूरी नहीं होती। उसके लिए ऐसी सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएँ आवश्यक हैं जो स्वयं सत्ता को भी उत्तरदायी बनाए रखें। साम्यवाद के इतिहास से निकलने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि आर्थिक समानता का उसका स्वप्न व्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के साथ किस प्रकार संबंध स्थापित कर सकता है। इस प्रश्न का समाधान केवल मार्क्सवाद के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण आधुनिक सभ्यता के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रमुख संदर्भ

कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स — कम्युनिस्ट घोषणापत्र, 1848।

कार्ल मार्क्स — दास कैपिटल, प्रथम खंड, 1867; फ्रांस में गृहयुद्ध, 1871; गोथा कार्यक्रम की आलोचना, 1875।

वी.आई. लेनिन — राज्य और क्रांति, 1917; पार्टी कांग्रेस को पत्र तथा संबंधित टिप्पणियाँ, 1922–23।

रोजा लक्जमबर्ग — रूसी क्रांति, 1918।

मिलोवान जिलास — द न्यू क्लास, 1957।

एरिक हॉब्सबॉम — एज ऑफ एक्स्ट्रीम्स, 1994।

आर्ची ब्राउन — द राइज एंड फॉल ऑफ कम्युनिज्म, 2009।

शीला फिट्जपैट्रिक — द रशियन रेवोल्यूशन।

ऑशविट्ज-बिरकेनाउ स्टेट म्यूजियम — नाजी विनाश शिविर में मृतकों के ऐतिहासिक अभिलेख।

रोमानिया की राष्ट्रीय समाचार एजेंसी एजरप्रेस — दिसंबर 1989 की रोमानियाई क्रांति का ऐतिहासिक विवरण, दिसंबर 2025।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) — पार्टी कार्यक्रम और 1964 के विभाजन का ऐतिहासिक विवरण।

विश्व बैंक — इंडिया डेवलपमेंट अपडेट, अप्रैल 2026; भारत में 2011-12 से 2023-24 तक गरीबी के आकलन।

महात्मा गांधी — हिंद स्वराज, 1909; ग्रामस्वराज संबंधी लेखन।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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