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पाकिस्तान में नए बंटवारे की साज़िश! शहबाज सरकार के अंदर से फूटा बगावत का ज्वालामुखी, नेशनल असेंबली में मचा हड़कंप
Pakistan division conspiracy: । शहबाज शरीफ की कुर्सी इस वक्त जितनी हिल रही है, उतनी शायद पाकिस्तान की सियासत में पहले कभी नहीं हिली होगी। आर्थिक तंगी, महंगाई और आतंकी हमलों से बेहाल पाकिस्तान अब आंतरिक विभाजन के कगार पर पहुंच गया है।
Pakistan division conspiracy: पाकिस्तान एक बार फिर बंटवारे की आग में झुलसने वाला है। लेकिन इस बार दुश्मन बाहर नहीं, भीतर से निकल आया है। जिस संसद में बैठकर पाकिस्तान की सरकार देश को चलाने की बातें करती है, अब वहीं से उसके टूटने की पटकथा लिखी जा रही है। शहबाज शरीफ की कुर्सी इस वक्त जितनी हिल रही है, उतनी शायद पाकिस्तान की सियासत में पहले कभी नहीं हिली होगी। आर्थिक तंगी, महंगाई और आतंकी हमलों से बेहाल पाकिस्तान अब आंतरिक विभाजन के कगार पर पहुंच गया है। और दिलचस्प बात यह है कि इस बंटवारे की मांग पाकिस्तान की दुश्मन ताकतों ने नहीं, बल्कि खुद शहबाज शरीफ सरकार के मंत्रियों और सहयोगियों ने उठाई है। नेशनल असेंबली में बजट सत्र के दौरान जो कुछ हुआ, उसने पाकिस्तान की राजनीति को हिला कर रख दिया है।
नेशनल असेंबली में बगावत, अपने ही मंत्री ने मांगा नया प्रांत
शहबाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन के मंत्री सरदार मुहम्मद यूसुफ ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत को तोड़ने की सीधी मांग कर डाली। धार्मिक मामलों के इस संघीय मंत्री ने संसद में खड़े होकर कहा कि खैबर पख्तूनख्वा में हजारा प्रांत बनाया जाए। यूसुफ ने दलील दी कि इससे विकास कार्यों में तेजी आएगी और वहां के लोगों को बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी।हैरानी की बात यह है कि खैबर पख्तूनख्वा वही इलाका है जिसे इमरान खान का गढ़ माना जाता है। ऐसे में शहबाज सरकार के मंत्री का ये बयान इमरान के प्रभाव वाले क्षेत्र में जानबूझकर सियासी आग लगाने जैसा माना जा रहा है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। मंत्री के बैठते ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के सांसद सैयद मुर्तजा महमूद खड़े हो गए और उन्होंने पंजाब को तोड़ने की मांग कर दी। उनका कहना था कि पंजाब के दक्षिणी हिस्से को अलग करके ‘दक्षिण पंजाब’ नाम से नया प्रांत बनाया जाए।
‘अब पाकिस्तान बचेगा कैसे?’—बजट सत्र से बंटवारे की साजिश तक
सोचिए, जिस संसद में पाकिस्तान अपने सालाना बजट की योजनाएं बना रहा था, उसी संसद में खुद पाकिस्तान के बंटवारे की मांग गूंजने लगी। और ये मांग कोई अलगाववादी संगठन नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ दलों के मंत्री और सांसद कर रहे थे। आज पाकिस्तान के पास पहले ही बलूचिस्तान और खैबर में आज़ादी की मांग से निपटने की ताकत नहीं है। बलूच विद्रोही आए दिन पाकिस्तान आर्मी पर हमले कर रहे हैं, खैबर में आतंकवादियों का कब्जा बढ़ता जा रहा है, वहीं सिंध में अलग सिंधुदेश की आवाजें समय-समय पर उठती रहती हैं। ऐसे में अब पंजाब और खैबर को तोड़ने की मांग पाकिस्तान के लिए ताबूत की आखिरी कील बन सकती है।
राजनीति की चाल या बिखरते पाकिस्तान की सच्चाई?
सवाल ये है कि ये मांग क्यों उठ रही है? इसका जवाब छुपा है पाकिस्तान की गंदी राजनीति में। दक्षिण पंजाब पर लंबे समय से पीपीपी की नजर रही है, लेकिन वहां पीएमएल-एन की पकड़ मजबूत रही है। वहीं हजारा क्षेत्र में पीएमएल-एन मजबूत है लेकिन खैबर पर इमरान खान का वर्चस्व है। अब दोनों पार्टियां आंतरिक विभाजन को भड़का कर अपने-अपने सियासी फायदों का खेल खेल रही हैं। सरदार मुहम्मद यूसुफ का आरोप है कि खैबर की सरकार हजारा इलाके के साथ सौतेला व्यवहार करती है। पीने का पानी तक वहां के लोगों को नहीं मिल रहा। वहीं सैयद महमूद ने कहा कि पंजाब देश के 60% हिस्से में फैला है, इसे अगर नहीं तोड़ा गया तो जल्द ही बगावत खड़ी हो जाएगी। असल में ये सारी बातें राजनीति के नकाब में सियासी चालें हैं। जो लोग देश तोड़ने की बात कर रहे हैं, वही अगले चुनावों में प्रांतीय सत्ता पर कब्जा जमाना चाहते हैं।
अब क्या बचेगा पाकिस्तान?
आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान में पंजाब, सिंध, खैबर-पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और गिलगिट-बाल्टिस्तान जैसे प्रांत हैं। इनके अलावा पीओके और इस्लामाबाद केंद्र शासित क्षेत्र में आते हैं। लेकिन बलूचिस्तान और खैबर पहले से ही बारूद के ढेर पर बैठे हैं। अब पंजाब जैसे मजबूत प्रांत को भी तोड़ने की साजिश पाकिस्तान के वजूद को ही चुनौती देती दिख रही है। नेशनल असेंबली में अपने ही नेताओं की इस बगावत ने साफ कर दिया है कि पाकिस्तान का भविष्य सिर्फ महंगाई और आतंकवाद से नहीं, बल्कि अपने ही नेताओं के लालच और राजनीतिक भूख से तबाह होने वाला है। आज पाकिस्तान की संसद में बजट से ज्यादा चर्चा बंटवारे की हो रही है। आने वाले दिनों में अगर ये आग भड़की तो पाकिस्तान को फिर से नक्शे पर बचाए रखना खुद शहबाज शरीफ के लिए किसी जंग से कम नहीं होगा।क्या ये पाकिस्तान का ‘अंत’ है या नई शुरुआत की साजिश? फिलहाल इस सवाल का जवाब खुद पाकिस्तान के पास भी नहीं है।


