Rishi Panchami Vrat 2023 Kab Hai :ऋषि पंचमी व्रत को लेकर ना रहे असमंजस में, यहां जानें सही तारीख, इस जरूर सुने कथा

Rishi Panchami Vrat Kab Hai 2023: सप्तऋषियों के सम्मान के लिए ऋषि पंचमी व्रत को किया जाता है। खासकर रजस्वला स्त्री के लिए ये व्रत करना जरूरी है।

Update: 2023-09-20 04:15 GMT

ऋषि पंचमी व्रत कब है?  Rishi Panchami Vrat 2023

ऋषि पंचमी व्रत को खासतौर पर महिलाएं रखती हैं। इसमें सप्तऋषियों के पूजन का विधान है, ऐसी मान्यता है कि जो भी महिला सच्चे मन से इस व्रत को रखती हैं वो पाप मुक्त हो जाती हैं। इस साल ऋषि पंचमी का व्रत 20 सितंबर को रखा जाएग। 

अनजाने में हुए भूल की माफी के लिए हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का व्रत करने की महिमा का बखान किया गया है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। इस व्रत से एक दिन पहले तीज और गणेश चतुर्थी का व्रत भी होता है। इस साल ऋषि पंचमी 20 सितंबर शनिवार को मनाई जाएगी।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कोई भी व्यक्ति खासकर महिलाएं इस दिन सप्त ऋषियों का पूजन करते है और सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। माना जाता है कि स्त्रियों को रजस्वला दोष लगता है। इसलिए कहते हैं कि ऋषि पंचमी व्रत करने से मासिक धर्म के दौरान भोजन को दूषित किए गए पाप से मुक्ति मिलती है।

     ऋषि पंचमी 2023 के लिए शुभ मुहूर्त

बुधवार, 20 सितंबर 2023

पंचमी तिथि प्रारंभ : 19 सितंबर 2023 को01. 43 मिनट पर शुरू होगी

पंचमी तिथि समाप्त: 20 सितंबर 2023 को दोपहर 02 . 16 मिनट पर समाप्त हो जाएगी

ऋषि पंचमी पूजा मुहूर्त : सुबह 11 . 2 मिनट से दोपहर 1. 28 मिनट तक सप्त ऋषियों की पूजा का शुभ मुहूर्त बन रहा है।

ब्रह्म मुहूर्त : 04:42 AM – 05:30 AM

रवि योग :02:59 PM से 05:46 AM, Sep 21

सर्वार्थ सिद्धि योग : 02:59 PM से 05:46 AM, Sep 21

अमृत सिध्दि योग: 02:59 PM से 05:46 AM, Sep 21

पारणा समय: 06.35 AM से 8.55 AM

सुबह जल्दी उठकर इस व्रत को विधि विधान से पूजा करने से व्यक्ति का कल्याण होता है। इस दिन सप्त ऋषियों की पांरपरिक पूजा का विधान है।शास्त्रों में सप्तऋषियों के महत्व को बताने के लिए कई श्लोक प्रचलित हैं. 'कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥ दहंतु पापं सर्व गृह्नन्त्वर्ध्यं नमो नमः॥' इस श्लोक का अर्थ है कि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, इन सप्तऋषियों के नाम का जाप करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं. इसलिए उनके सम्मान में यह व्रत और पूजन करते हैं।


ऋषि पंचमी की कथा

बहुत समय पहले की बात है। एक समय विदर्भ देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था। उसके परिवार में एक पुत्र और एक पुत्री थी। ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है परंतु काल के प्रभाव स्वरुप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, और वह विधवा हो जाती है और अपने पिता के घर लौट आती है। एक दिन आधी रात में लड़की के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते है़।अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता-पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं और पुत्री को उत्तक ॠषि के पास ले जाते हैं। अपनी पुत्री की इस हालत के विषय में जानने की प्रयास करते हैं। उत्तक ऋषि अपने ज्ञान से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण विवरण उसके माता-पिता को बताते हैं और कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर-बर्तन इत्यादि छू लिये थे और काम करने लगी। बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं।

शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री का कार्य करना निषेध है। परंतु इसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इसे इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। ऋषि कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करें तो उसे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है।लड़की की मां ने जब अपने पिता से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि तुम्हारी बेटी ने पूर्व जन्म में माहवारी के समय बर्तनों को छू दिया था।

उसी के श्राप के कारण तुम्हारी लड़की की ऐसी दशा हुई है।इसके बाद उन्होंने इससे निबटने के लिए उपाय बताया। उन्होंने ऋषि पंचमी के दिन उपवास करने के लिए कहा और पूजा विधि भी बताई। पूजा करने के बाद इस ब्राह्मण में फिर से खुशिया लौट आई और इस व्रत के असर के बाद बेटी को अगले जन्म में पूर्ण सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इसमें महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करती है। उसके बाद पूजा स्थल पर चौक बनाकर सप्तऋषि बनाती है। कलश स्थापना कर धूप, दीप से पूजा कर भोग लगा कर पूजा की जाती है। इस दिन हल चलाया अनाज नहीं खाते हैं। माहवारी के बाद व्रत का उद्यापन कर देते है। उद्यापन के दिन सात ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। यथा संभव दान देकर विदा किया जाता है।

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