किडनी की बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ो, संसदीय समिति ने सुझाया नया हेल्थ मॉडल
Chronic Kidney Disease India: संसदीय समिति ने किडनी रोग की शुरुआती पहचान के लिए 20 साल की उम्र से नियमित स्क्रीनिंग, क्रिएटिनिन के साथ eGFR और गरीबों के लिए मुफ्त जांच की सिफारिश की है। निजी अस्पतालों के कमरे के किराये पर भी सीमा का सुझाव दिया गया है।
Chronic Kidney Disease India (Image Credit-Social Media)
नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रही किडनी की गंभीर बीमारियों और निजी अस्पतालों में महंगे इलाज को लेकर संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति ने एक साथ कई बड़े बदलावों की सिफारिश की है। समिति का जोर दो स्तरों पर है—पहला, बीमारी इतनी बढ़ने ही न दी जाए कि मरीज डायलिसिस या प्रत्यारोपण तक पहुंचे; दूसरा, यदि इलाज की जरूरत पड़े तो उसका खर्च इतना न हो कि परिवार आर्थिक रूप से टूट जाए। समिति ने 20 वर्ष और उससे अधिक आयु वालों की नियमित किडनी जांच, उच्च जोखिम वाले लोगों के लिए व्यवस्थित स्क्रीनिंग, हर क्रिएटिनिन जांच के साथ स्वतः eGFR रिपोर्ट देने, डायलिसिस और प्रत्यारोपण सुविधाएं बढ़ाने तथा निजी अस्पतालों के कमरे के किराये पर सीमा लगाने जैसी सिफारिशें की हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 177वीं रिपोर्ट ‘Prevalence of Chronic Kidney Disease in India—Prevention, Diagnosis, Treatment and Management’ 7 अगस्त 2026 को संसद के समक्ष रखी गई। समिति ने किडनी रोग की रोकथाम, शुरुआती पहचान, डायलिसिस, प्रत्यारोपण, बीमा, डिजिटल रिकॉर्ड और उपचार के लिए कुल 66 सिफारिशें की हैं। रिपोर्ट का मूल संदेश यह है कि भारत केवल डायलिसिस मशीनों और प्रत्यारोपण केंद्रों की संख्या बढ़ाकर किडनी रोग के संकट से नहीं निपट सकता; बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ना राष्ट्रीय प्राथमिकता बनानी होगी।
हर साल 2.2 लाख नए मरीज अंतिम चरण की किडनी बीमारी तक पहुंच रहे
समिति ने जिस आंकड़े पर सबसे अधिक चिंता जताई है, वह देश में अंतिम चरण की किडनी बीमारी का बढ़ता बोझ है। आधिकारिक राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 2.2 लाख नए मरीज एंड-स्टेज रीनल डिजीज से जुड़ते हैं। इससे हर साल करीब 3.4 करोड़ अतिरिक्त डायलिसिस सत्रों की आवश्यकता पैदा होती है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत सालाना हेमोडायलिसिस सत्रों की संख्या पिछले पांच वर्षों में करीब 25 लाख से बढ़कर 70 लाख तक पहुंची है। समिति का कहना है कि यह विस्तार महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि बीमारी को पहले पकड़ने की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई तो डायलिसिस की मांग लगातार बढ़ती रहेगी।
किडनी की बीमारी का सबसे बड़ा खतरा—शुरुआत में कोई लक्षण नहीं
क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD की सबसे बड़ी समस्या यही है कि शुरुआती अवस्था में मरीज को अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता। व्यक्ति सामान्य जीवन जीता रहता है, लेकिन किडनी की छानने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है। जब कमजोरी, पैरों में सूजन, पेशाब में बदलाव, भूख कम लगना, उल्टी, सांस फूलना या अत्यधिक थकान जैसे लक्षण स्पष्ट होते हैं, तब कई मरीज बीमारी के काफी आगे के चरण में पहुंच चुके होते हैं।इसी वजह से समिति ने उपचार से अधिक ‘प्रिवेंशन फर्स्ट’ यानी रोकथाम और शुरुआती पहचान की रणनीति अपनाने पर जोर दिया है।
20 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की छमाही जांच का प्रस्ताव
समिति की रिपोर्ट के आधिकारिक सारांश में 20 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी व्यक्तियों के लिए हर छह महीने में किडनी की जांच को संस्थागत रूप देने की सिफारिश की गई है। हालांकि रिपोर्ट की विस्तृत सिफारिशों में उच्च जोखिम वाले लोगों—विशेषकर मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों—के लिए नियमित और कम से कम सालाना CKD स्क्रीनिंग का अलग उल्लेख मिलता है। इसलिए इसे अभी लागू सरकारी नियम की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। यह संसदीय समिति का नीति सुझाव है और इसे लागू करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय तथा सरकार को अलग निर्णय लेना होगा।यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो देश में किडनी रोग की जांच का दायरा मौजूदा ‘लक्षण होने पर जांच’ व्यवस्था से निकलकर व्यापक जन-स्क्रीनिंग की दिशा में जा सकता है।
सिर्फ क्रिएटिनिन की जांच पर्याप्त नहीं
समिति ने किडनी की सामान्य जांच पद्धति पर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। देश में आम तौर पर किडनी फंक्शन जानने के लिए सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट कराया जाता है, लेकिन समिति का कहना है कि केवल क्रिएटिनिन पर निर्भर रहना शुरुआती CKD पकड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार क्रिएटिनिन कई बार तब तक सामान्य सीमा में रह सकता है जब तक किडनी की कार्यक्षमता काफी कम न हो चुकी हो। इसलिए हर क्रिएटिनिन जांच के साथ Estimated Glomerular Filtration Rate यानी eGFR स्वतः रिपोर्ट किए जाने की सिफारिश की गई है। इसके लिए अलग टेस्ट लिखवाने या अतिरिक्त शुल्क की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। eGFR उम्र, लिंग और क्रिएटिनिन के आधार पर अनुमान लगाता है कि किडनी एक निश्चित समय में रक्त को कितनी प्रभावी ढंग से फिल्टर कर रही है।
पेशाब की जांच भी उतनी ही जरूरी
किडनी रोग की शुरुआती पहचान के लिए समिति ने केवल रक्त जांच पर निर्भर रहने के बजाय यूरिन एल्ब्यूमिन या प्रोटीन टेस्ट को भी महत्वपूर्ण माना है।किडनी के फिल्टर क्षतिग्रस्त होने लगें तो एल्ब्यूमिन जैसे प्रोटीन पेशाब में आने लग सकते हैं। कई मामलों में यह संकेत क्रिएटिनिन बढ़ने से पहले सामने आ सकता है।इसीलिए उच्च जोखिम वाले लोगों में eGFR के साथ पेशाब में एल्ब्यूमिन या प्रोटीन की जांच को नियमित स्क्रीनिंग का हिस्सा बनाने की सिफारिश की गई है।
सबसे पहले किन लोगों को करानी चाहिए जांच
समिति ने मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों को सबसे महत्वपूर्ण जोखिम समूहों में रखा है। इनके अलावा 60 वर्ष से अधिक आयु, परिवार में किडनी रोग का इतिहास, मोटापा, तंबाकू सेवन, पहले गंभीर किडनी चोट, बार-बार पेशाब का संक्रमण, बार-बार पथरी और लंबे समय तक किडनी को नुकसान पहुंचाने वाली दवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी प्राथमिकता वाले समूह में रखा गया है।विशेष चिंता बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल को लेकर भी जताई गई है। कुछ NSAID वर्ग की दवाएं लंबे समय तक या अनुचित मात्रा में लेने पर किडनी के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं।
आशा कार्यकर्ता घर-घर कर सकती हैं शुरुआती जांच
समिति ने एक दिलचस्प सुझाव यह भी दिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ताओं को पेशाब में प्रोटीन की प्रारंभिक जांच के लिए प्रशिक्षित करने की संभावना देखी जाए।यदि घर या गांव स्तर पर यूरिन डिपस्टिक में प्रोटीन मिलता है तो व्यक्ति को आयुष्मान आरोग्य मंदिर या उच्च स्वास्थ्य केंद्र पर क्रिएटिनिन, eGFR और अन्य जांच के लिए भेजा जा सकता है। इससे उन लोगों तक पहुंच संभव होगी जो सामान्यतः किसी लक्षण के बिना अस्पताल नहीं जाते।
गरीब परिवारों के लिए जांच को आर्थिक रूप से सुलभ बनाने पर जोर
समिति का व्यापक दृष्टिकोण यह है कि किडनी रोग की शुरुआती जांच आर्थिक स्थिति के कारण न रुके। निम्न आय वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए मुफ्त या अत्यधिक रियायती जांच तथा लंबे समय की बीमारी में दवाओं और निदान पर आर्थिक सहायता की व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश की गई है। समिति ने स्वास्थ्य व्यवस्था में BPL, EWS और PM-JAY लाभार्थियों के लिए सुरक्षा बढ़ाने और निजी अस्पतालों में उनके लिए आरक्षित बेड का हिस्सा बढ़ाने तक की सिफारिश की है। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि क्रॉनिक किडनी डिजीज एक बार गंभीर अवस्था में पहुंच जाए तो डायलिसिस, दवाओं, बार-बार अस्पताल यात्रा और काम छूटने का खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति को तेजी से प्रभावित कर सकता है।
डायलिसिस से पहले बीमारी रोकना कहीं सस्ता
समिति की मूल चिंता यही है कि देश की किडनी नीति अभी बहुत हद तक बीमारी के अंतिम चरण पर केंद्रित है। मरीज जब किडनी फेलियर तक पहुंच जाता है तब डायलिसिस या प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, जबकि मधुमेह और उच्च रक्तचाप का अच्छा नियंत्रण, समय पर CKD पहचान और सही दवाओं से बीमारी की प्रगति कई मामलों में धीमी की जा सकती है। यदि मरीज को शुरुआती अवस्था में पकड़ लिया जाए तो उसके डायलिसिस तक पहुंचने में वर्षों की देरी संभव हो सकती है। यही कारण है कि समिति ने भविष्य की नीति को डायलिसिस-केंद्रित से रोकथाम-केंद्रित करने की सिफारिश की है।
घर पर होने वाली पेरिटोनियल डायलिसिस को भी बढ़ावा
समिति ने हेमोडायलिसिस के साथ पेरिटोनियल डायलिसिस का उपयोग बढ़ाने की सिफारिश की है, विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में। पेरिटोनियल डायलिसिस के कुछ मॉडल मरीज को घर पर उपचार की सुविधा दे सकते हैं, जिससे बार-बार डायलिसिस केंद्र तक आने की जरूरत कम हो सकती है।लेकिन इसके लिए मरीज और परिवार को प्रशिक्षण, संक्रमण रोकने की व्यवस्था और नियमित चिकित्सा निगरानी जरूरी होगी।
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद केवल 15 दिन नहीं, एक साल तक मदद
समिति ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत किडनी प्रत्यारोपण के बाद मिलने वाली देखभाल को मौजूदा 15 दिनों से बढ़ाकर एक वर्ष करने की सिफारिश की है। इसमें फॉलो-अप जांच, आवश्यक टेस्ट, प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाएं और प्रत्यारोपण से जुड़ी जटिलताओं का उपचार शामिल करने का सुझाव है। किडनी ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को जीवनभर दवाओं और नियमित निगरानी की जरूरत रहती है, इसलिए समिति ने मौजूदा अवधि को अपर्याप्त माना है।
निजी अस्पतालों पर दूसरी बड़ी सिफारिश—कमरे का किराया तीन सितारा होटल से ज्यादा न हो
इसी संसदीय समिति की स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और वहनीयता से जुड़ी रिपोर्ट ने निजी अस्पतालों की फीस पर भी महत्वपूर्ण सिफारिश की है। समिति का कहना है कि बड़े महानगरों में निजी अस्पताल के मूल कमरे का किराया आसपास के तीन सितारा होटलों के औसत कमरे के किराये से अधिक नहीं होना चाहिए। समिति ने इसे बड़े महानगरों के निजी अस्पतालों के लिए अनिवार्य बेंचमार्क बनाने की सिफारिश की है।यह सिफारिश अभी लागू कानून नहीं है। सरकार इसे स्वीकार करती है या नहीं और किस रूप में लागू करती है, यह आगे की प्रक्रिया में तय होगा।
डॉक्टर और नर्स का खर्च अलग जुड़ सकेगा
समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि तीन सितारा होटल वाली तुलना केवल बेसिक रूम टैरिफ से होगी। इसके ऊपर रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग, चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, भोजन और कपड़े धोने जैसी सेवाओं का शुल्क अलग जोड़ा जा सकेगा। अर्थात यदि किसी इलाके में तीन सितारा होटल का औसत कमरा ₹5,000 है तो समिति की सिफारिश यह नहीं है कि मरीज का पूरा अस्पताल बिल ₹5,000 प्रतिदिन में सीमित हो जाए। केवल कमरे के मूल किराये के लिए यह बेंचमार्क प्रस्तावित है।
एक ही ऑपरेशन, कमरे के कारण इलाज महंगा क्यों?
समिति ने अस्पतालों की उस प्रथा पर भी सवाल उठाया है जिसमें एक ही चिकित्सा प्रक्रिया की कीमत मरीज के चुने हुए कमरे के आधार पर बदल जाती है। मसलन सर्जन वही है, ऑपरेशन थिएटर वही है और चिकित्सा प्रक्रिया वही है, लेकिन यदि मरीज जनरल वार्ड के बजाय निजी या डीलक्स कमरे में रहता है तो कुछ अस्पतालों में पूरे इलाज पैकेज की कीमत बढ़ जाती है।समिति ने ऐसी room rent-linked pricing को स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने वाले कारणों में गिना है और उपचार मूल्य निर्धारण को अधिक पारदर्शी तथा तर्कसंगत बनाने की जरूरत बताई है।
निजी अस्पताल का औसत खर्च सरकारी अस्पताल से कई गुना
समिति की स्वास्थ्य वहनीयता संबंधी समीक्षा में सरकारी और निजी चिकित्सा खर्च के बड़े अंतर पर भी चिंता जताई गई है। समिति के सामने रखे आंकड़ों के अनुसार औसत अस्पताल भर्ती खर्च सरकारी संस्थानों में करीब ₹6,631 और निजी अस्पतालों में लगभग ₹50,508 तक पाया गया।इस अंतर का सबसे ज्यादा प्रभाव उन परिवारों पर पड़ता है जो बीमा से पूरी तरह कवर नहीं हैं और जिन्हें इलाज का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से देना पड़ता है।
इलाज शुरू होने से पहले पूरा अनुमान देने की सिफारिश
समिति ने गंभीर और लंबे उपचार वाले मरीजों को अचानक बढ़ते बिल से बचाने के लिए एक और बड़ा सुझाव दिया है। उसने कहा है कि तृतीयक अस्पतालों को जटिल या लंबे उपचार से पहले मरीज को व्यापक और कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुमानित लागत बतानी चाहिए।इसके साथ ‘फाइनेंशियल नेविगेटर’ यानी ऐसे प्रशिक्षित सलाहकार रखने की भी सिफारिश की गई है जो मरीज और उसके परिवार को इलाज की लागत, बीमा सीमा और उपलब्ध सहायता समझा सकें।
इलाज केवल ऑपरेशन तक नहीं, पूरी बीमारी की अवधि के लिए पैकेज
समिति ने कैंसर, किडनी रोग और अन्य गंभीर बीमारियों में ‘Continuum of Care’ आधारित पैकेज बनाने की सिफारिश की है। यानी केवल ऑपरेशन या अस्पताल में भर्ती होने का खर्च नहीं, बल्कि स्क्रीनिंग, जांच, उपचार, फॉलो-अप, पुनर्वास और जरूरत पड़ने पर पेलिएटिव केयर तक पूरी बीमारी की यात्रा को एक अधिक पारदर्शी वित्तीय ढांचे में लाया जाए। यह विचार खास तौर पर किडनी रोग जैसे मामलों में महत्वपूर्ण है क्योंकि मरीज का खर्च केवल एक बार की भर्ती से खत्म नहीं होता। डायलिसिस, दवाएं, जांच, परिवहन और काम के नुकसान का खर्च वर्षों तक चलता रह सकता है।
दो रिपोर्ट, लेकिन संदेश एक—बीमारी देर से पकड़ना और महंगा इलाज दोनों बदलने होंगे
किडनी रोग और निजी स्वास्थ्य खर्च पर संसदीय समिति की ये सिफारिशें दो अलग समस्याओं को जोड़ती हैं। एक तरफ देश में बड़ी संख्या में लोग तब तक अपनी किडनी की बीमारी से अनजान रहते हैं जब तक नुकसान गंभीर नहीं हो जाता। दूसरी तरफ बीमारी गंभीर होने के बाद इलाज इतना महंगा हो सकता है कि परिवार आर्थिक संकट में फंस जाए।इसलिए समिति की दिशा साफ है—बीमारी पहले पकड़िए और इलाज का खर्च पहले से नियंत्रित तथा पारदर्शी बनाइए।यदि 20 वर्ष से अधिक उम्र में नियमित किडनी स्क्रीनिंग, क्रिएटिनिन के साथ स्वतः eGFR, पेशाब में एल्ब्यूमिन जांच और उच्च जोखिम वालों की व्यवस्थित निगरानी जैसी सिफारिशें लागू होती हैं तो देश की किडनी नीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। इसी तरह यदि निजी अस्पतालों में कमरे के किराये और इलाज पैकेज के मूल्य निर्धारण पर स्पष्ट मानक बनते हैं तो मरीजों के लिए अस्पताल बिल अधिक पूर्वानुमानित हो सकता है।
लेकिन फिलहाल सबसे जरूरी तथ्य यही है—ये संसदीय समिति की सिफारिशें हैं, लागू कानून नहीं। अब असली परीक्षा सरकार की होगी कि वह इनमें से कितने सुझाव स्वीकार करती है और उन्हें जमीन पर किस तरह लागू करती है।