Assam CM Report Card: असम की सियासत में कौन बना हीरो, कौन विवादों में घिरा? पूरी कहानी

Assam Chief Ministers Report Card : असम की सियासत में कौन बना हीरो, कौन विवादों में घिरा? हिमंत बिस्वा सरमा से तरुण गोगोई तक पूरी कहानी

Update:2026-05-14 16:05 IST

Assam Chief Ministers Report Card 

Assam Chief Ministers Report Card: असम, जिसे पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है, अपनी चाय बागानों की हरियाली, ब्रह्मपुत्र नदी की विराटता, समृद्ध जनजातीय संस्कृति, ऐतिहासिक मंदिरों, विश्वप्रसिद्ध मूंगा सिल्क और रंग-बिरंगे बिहू उत्सवों के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है। प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता से भरा यह राज्य जितना शांत और आकर्षक दिखाई देता है, उसके भीतर उतनी ही जटिल राजनीतिक और सामाजिक हलचलें लंबे समय से चलती रही हैं।

दरअसल, असम केवल पर्यटन और परंपराओं का केंद्र नहीं रहा, बल्कि अवैध प्रवासन, जातीय संघर्ष, अलगाववादी आंदोलनों, पहचान की राजनीति और नागरिकता विवाद जैसे मुद्दों के कारण दशकों से राष्ट्रीय सुर्खियों में बना हुआ है। यही वजह है कि पूर्वोत्तर का यह खूबसूरत राज्य अक्सर अपने अस्थिर राजनीतिक माहौल और संवेदनशील सामाजिक परिस्थितियों को लेकर चर्चा का विषय बन जाता है। यहां की राजनीति हमेशा सामान्य चुनावी समीकरणों से आगे बढ़कर पहचान, भाषा, संस्कृति, प्रवासन, उग्रवाद और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यही वजह है कि असम का मुख्यमंत्री केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होता, बल्कि उसे लगातार ऐसे मुद्दों से जूझना पड़ता है जो पूरे राज्य की सामाजिक संरचना और राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं। स्वतंत्रता के बाद से लेकर 2026 तक असम की राजनीति ने कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं। कभी कांग्रेस का एकछत्र राज रहा, कभी छात्र आंदोलन से निकले नेताओं ने सत्ता संभाली, तो हाल के वर्षों में भाजपा ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इन दशकों में कुछ मुख्यमंत्री ऐसे रहे जिन्होंने जनता का गहरा भरोसा जीता, कुछ विकास मॉडल के लिए पहचाने गए, जबकि कुछ नेताओं का नाम विवादों और आरोपों के कारण हमेशा चर्चा में रहा। राज्य ने लंबे समय तक आंदोलन, हिंसा और असंतोष का दौर देखा है, लेकिन समय के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और शांति समझौतों के जरिए स्थिति में सुधार भी आया है। फिर भी असम की राजनीति आज भी संवेदनशील सामाजिक और ऐतिहासिक मुद्दों से गहराई से जुड़ी हुई है।

असम की राजनीतिक अस्थिरता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

असम ब्रिटिश काल में चाय, तेल और प्राकृतिक संसाधनों के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र था। अंग्रेजों ने यहां बड़े पैमाने पर मजदूरों और बाहरी आबादी को बसाया। आजादी के बाद भी पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लगातार लोगों के आने का मुद्दा असम की राजनीति का केंद्र बना रहा। स्थानीय लोगों को डर था कि बाहरी आबादी बढ़ने से उनकी भाषा, संस्कृति और रोजगार पर असर पड़ेगा। यही चिंता आगे चलकर बड़े जन आंदोलनों और हिंसा का कारण बनी।

असम आंदोलन और छात्र राजनीति


1979 से 1985 तक चला 'असम आंदोलन' राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ माना जाता है। इस आंदोलन का नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल असम गण संघर्ष परिषद ने किया।

आंदोलन की मुख्य मांग थी कि बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें बाहर किया जाए। इस दौरान कई बार हिंसक झड़पें हुईं और राज्य में लंबे समय तक तनाव का माहौल बना रहा।

1983 का नेल्ली नरसंहार असम के इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में गिना जाता है, जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई। यह घटना आज भी राज्य की राजनीति और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव डालती है।

असम समझौता और नई राजनीति

1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच 'असम समझौता' हुआ। इसके बाद आंदोलन से निकले नेताओं ने ऑल असम गण संघर्ष परिषद (AGP) का गठन किया और सत्ता में आए। हालांकि समझौते के बावजूद अवैध प्रवासन का मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। यही कारण रहा कि असम की राजनीति लगातार पहचान और नागरिकता के सवालों के इर्द-गिर्द घूमती रही।

उग्रवाद और ULFA का उदय


1979 में ही असम का संयुक्त मुक्ति मोर्चा (ULFA) का गठन हुआ। संगठन का उद्देश्य असम को भारत से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना था। ULFA ने कई वर्षों तक हिंसक गतिविधियां चलाईं, जिनमें बम धमाके, अपहरण और सुरक्षाबलों पर हमले शामिल थे। इसके जवाब में भारतीय सेना ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए।

1990 और 2000 के दशक में असम लंबे समय तक उग्रवाद और सैन्य कार्रवाई के कारण तनावग्रस्त रहा। हालांकि बाद में ULFA के कई गुटों ने शांति वार्ता का रास्ता अपनाया, लेकिन संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

जातीय और भाषाई संघर्ष

असम केवल प्रवासन के मुद्दे से ही नहीं, बल्कि जातीय पहचान के संघर्षों से भी प्रभावित रहा है। यहां बोडो, कार्बी, मिसिंग और कई अन्य समुदाय अलग पहचान और अधिकारों की मांग करते रहे हैं।

विशेष रूप से बोडो आंदोलन ने राज्य में लंबे समय तक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता पैदा की। इसके बाद सरकार ने बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (BTR) जैसी व्यवस्थाएं बनाईं ताकि क्षेत्रीय असंतोष कम किया जा सके।

NRC और नागरिकता विवाद


हाल के वर्षों में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन कानून विरोध प्रदर्शन (CAA) को लेकर असम फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया। NRC का उद्देश्य राज्य में अवैध प्रवासियों की पहचान करना था। लाखों लोगों के दस्तावेजों की जांच हुई और बड़ी संख्या में लोग सूची से बाहर रह गए। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध हुआ, क्योंकि कई संगठनों का मानना था कि इससे असम समझौते की भावना कमजोर होगी और बाहरी लोगों को नागरिकता मिलने का रास्ता खुलेगा।

वर्तमान राजनीतिक स्थिति

आज असम में राजनीतिक स्थिति पहले की तुलना में अधिक स्थिर मानी जाती है, लेकिन पहचान, भाषा, भूमि और नागरिकता से जुड़े मुद्दे अभी भी संवेदनशील हैं। राज्य में बीजेपी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और क्षेत्रीय दलों की भूमिका पहले की तुलना में सीमित हुई है। इसके बावजूद असम की राजनीति में जातीय समीकरण और क्षेत्रीय असंतोष अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कांग्रेस के वो नेता जिन्होंने असम को बनाया

गोपीनाथ बोरदोलोई


यह नाम असम की राजनीति की पहली ईंट है। 1946 में जब देश आजादी की कगार पर खड़ा था, तब बोरदोलोई ने असम की बागडोर संभाली। 'असम के गांधी' कहे जाने वाले इस नेता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने असम को भारत का हिस्सा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विभाजन के दौर में जब असम को पाकिस्तान में मिलाने की कोशिश हो रही थी, तब उनकी दृढ़ता काम आई।

बिष्णुराम मेधी


बिष्णुराम मेधी ने 1950 से 1957 तक मुख्यमंत्री पद संभाला। उनके शासनकाल में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और सरकारी संस्थाओं के विस्तार पर काम हुआ।

बिमला प्रसाद चालिहा


बिमला प्रसाद चालिहा ने 1957 से 1970 तक पूरे 13 साल असम का नेतृत्व किया। यह कार्यकाल याद रखा जाता है इसलिए नहीं कि इसमें कोई बड़ा विवाद था, बल्कि इसलिए कि इसमें स्कूल बने, सड़कें बनीं और एक नए राज्य की नींव पड़ी। जनता के बीच उनकी छवि एक शांत, सुलझे हुए प्रशासक की रही।

इनके अलावा महेंद्र मोहन चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता थे।

वे 1970 से 1972 तक असम के मुख्यमंत्री रहे। उन्हें असम के पहले आदिवासी (टी-ट्राइब समुदाय) मुख्यमंत्री के रूप में भी जाना जाता है।

सरत चंद्र सिन्हा भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। उन्होंने 1972 से 1978 तक असम के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। उनका कार्यकाल ग्रामीण विकास, कृषि और साधारण जीवनशैली के लिए याद किया जाता है।

गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री और आंदोलन, हत्याएं, राजनीतिक उठापटक का अशांत दौर


1978 के बाद का असम एक अलग ही दुनिया था। गोलाप बोरबोरा पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने लेकिन उनका कार्यकाल इतना छोटा रहा कि कोई छाप नहीं छोड़ सके।

फिर 1980 में इतिहास बनासैयदा अनवरा तैमूर असम की पहली और आज तक की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन यह वक्त किसी के लिए भी आसान नहीं था। असम आंदोलन अपने चरम पर था, विदेशी नागरिकों के मुद्दे पर सड़कें जल रही थीं, और ऐसे में उनका कार्यकाल अस्थिरता का पर्याय बन गया। जनता से रिश्ता बनाने का मौका ही नहीं मिला। हितेश्वर सैकिया का नाम असम की राजनीति में विवाद के साथ जुड़ा है। दो बार मुख्यमंत्री रहे 1983-85 और 1991-96। कांग्रेस के इस दिग्गज पर आरोप था कि उन्होंने विपक्ष को दबाने के लिए पुलिस और प्रशासन का दुरुपयोग किया। बांग्लादेशी प्रवासन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनका रवैया ढीला बताया जाता था। यहां तक कि बाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी कहा कि उनके दौर में छात्र कार्यकर्ताओं के साथ बुरा व्यवहार हुआ।

प्रफुल्ल कुमार महंता यह नाम असम आंदोलन की उपज है। आंदोलनकारी से नेता बने महंता ने असम गण परिषद (AGP) के बैनर तले दो बार 1985-90 और 1996-2001 सत्ता संभाली। लेकिन उनके दूसरे कार्यकाल में जो आरोप लगे, वो बेहद संगीन थे। ULFA उग्रवादियों के परिवारों को निशाना बनाकर 'गुप्त हत्याओं' का आरोप। हालांकि 2023 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन यह दाग उनके राजनीतिक जीवन पर हमेशा रहा। इसके अलावा लेटर ऑफ क्रेडिट घोटाला और निजी जीवन में विवाद ने उनकी छवि को और कमजोर किया।

तरुण गोगोई और आसाम की जनता का सबसे लंबा साथ


अगर असम के किसी मुख्यमंत्री ने जनता से सबसे गहरा रिश्ता बनाया, तो वो थे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता तरुण गोगोई। 2001 से 2016 यानी पूरे पंद्रह साल, लगातार तीन चुनाव जीते। यह कोई छोटी बात नहीं है। असम जैसे अस्थिर राजनीतिक माहौल में इतने लंबे समय तक सत्ता में बने रहना जनता के भरोसे के बिना संभव नहीं।

गोगोई का दौर आर्थिक विकास का दौर माना जाता है। राज्य में निवेश आया, सड़कें बनीं, बुनियादी ढांचा मजबूत हुआ। उन्होंने असम को उस तस्वीर से बाहर निकालने की कोशिश की जिसमें यह राज्य सिर्फ उग्रवाद और अशांति के लिए जाना जाता था।

असम में भाजपा का उदय


2016 में असम ने पहली बार भाजपा को मौका दिया। सर्बानंद सोनोवाल पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल अपेक्षाकृत शांत और विकासोन्मुखी रहा। उग्रवाद की समस्या काफी हद तक नियंत्रण में आई और केंद्र से बेहतर तालमेल रहा।

फिर 2021 में आए हिमंत बिस्वा सरमा। आज जब असम के सबसे चर्चित मुख्यमंत्री की बात होती है, तो हिमंत का नाम सबसे पहले आता है विकास के लिए भी और विवाद के लिए भी। उनके बारे में तथ्य यह हैं कि वे मूलतः कांग्रेस से थे, फिर भाजपा में आए और 2021 में मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में। कानून-व्यवस्था कड़ी हुई, अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चला और शिक्षा-स्वास्थ्य में कुछ बदलाव भी आए लेकिन इन उपलब्धियों के साथ इनसे जुड़े विवादों की संख्या भी कम नहीं है। 'मिया मुस्लिम' जैसे बयानों को लेकर विपक्ष सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने का आरोप लगाता है। कांग्रेस ने उनके परिवार पर 12,000 बीघा जमीन पर कब्जे का आरोप लगाया है। 2021 में असम और मिजोरम की सीमा पर हुई हिंसक झड़प देश की सबसे गंभीर अंतरराज्यीय घटनाओं में गिनी जाती है। इस संघर्ष में असम पुलिस के कई जवानों की मौत हुई थी और दोनों राज्यों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था।

उस समय असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथांगा के बीच सोशल मीडिया पर तीखी बयानबाजी और सार्वजनिकआरोप-प्रत्यारोप भी देखने को मिले।

भारतीय राजनीति में यह घटना इसलिए बेहद विवादित मानी गई क्योंकि पहली बार दो राज्यों के मुख्यमंत्री खुले तौर पर ट्विटर और सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की सरकार और पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते दिखाई दिए। आलोचकों ने इसे संघीय ढांचे और राजनीतिक मर्यादा के लिहाज से चिंताजनक बताया, जबकि दोनों राज्यों की सरकारों ने अपने-अपने पक्ष को सही ठहराया।

संपत्ति का खेल, कौन है सबसे 'अमीर' मुख्यमंत्री?


असम के राजनीतिक इतिहास में संपत्ति के मामले में हिमंत बिस्वा सरमा सबसे ऊपर हैं। 2026 के चुनावी हलफनामे के अनुसार उनकी और पत्नी की संयुक्त संपत्ति लगभग ₹35.16 करोड़ है। इसमें उनकी पत्नी ऋणीकी भुइयां सरमा की हिस्सेदारी ₹32.79 करोड़ है, जो प्राइड ईस्ट एंटरटेनमेंट की प्रमुख हैं। ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की 2024-25 की रिपोर्ट में उन्हें ₹17 करोड़ से अधिक की घोषित संपत्ति के साथ देश के शीर्ष 10 सबसे अमीर मुख्यमंत्रियों में 9वें स्थान पर रखा गया था।

उनकी पत्नी ऋणीकी भुइयां सरमा मीडिया और व्यवसाय क्षेत्र से जुड़ी हैं। विपक्ष लगातार उनकी संपत्तियों को लेकर सवाल उठाता रहा है, हालांकि इन आरोपों पर कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। तुलना के लिए, तरुण गोगोई या प्रफुल्ल कुमार महंता की संपत्तियां उस समय के मानदंडों के हिसाब से बहुत कम थीं। पूरे पूर्वोत्तर में सबसे अमीर मुख्यमंत्री की बात करें तो अरुणाचल प्रदेश के पेमा खांडू राष्ट्रीय स्तर पर भी शीर्ष पर हैं। असम की राजनीति ने पिछले आठ दशकों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। जनता के मुद्दों, आंदोलनों, पहचान की राजनीति और सत्ता की लड़ाई के बीच यह राज्य हर दौर में बदलता रहा है और हर दशक में इसकी राजनीति की नई तस्वीर सामने आई है।

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