Abhishek Banerjee ने खुद लिखी TMC की बर्बादी! अब चारों तरफ से कसा कानूनी शिकंजा, समझिए पूरा खेल
TMC Split Abhishek Banerjee: तानाशाही के आरोपों और कानूनी चक्रव्यूह के बीच पूरी तरह बिखरी ममता बनर्जी की TMC। जानिए क्यों अपनों के ही निशाने पर आए अभिषेक बनर्जी।
TMC Split Abhishek Banerjee: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जो भयंकर राजनैतिक तबाही मची है, उसकी कल्पना शायद पार्टी के शीर्ष आलाकमान ने सपने में भी नहीं की थी। टीएमसी के इस ऐतिहासिक बिखराव और आंतरिक तख्तापलट के लिए इस बार पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नहीं, बल्कि उनके भतीजे और अघोषित उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। हालात इतने बेकाबू हैं कि अभिषेक बनर्जी ने खुद अपनी डूबती नैया बचाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) को पत्र सौंपकर बगावत करने वाले 20 सांसदों को तुरंत अयोग्य घोषित करने की गुहार लगाई है।
TMC में 'बगावत' का पूरा गणित
विद्रोही गुट / जांच एजेंसी | वर्तमान आंकड़ा और स्थिति | मुख्य प्रभाव / मांग |
बागी लोकसभा सांसद | 20 सांसद (काकोली घोष के नेतृत्व में) | संसद में 'NCPI' गुट के रूप में आधिकारिक मान्यता की मांग |
बागी टीएमसी विधायक | 80 में से 60 विधायक | शोभनदेव चटर्जी को खारिज कर 'ऋतव्रत बनर्जी' को नेता प्रतिपक्ष चुना |
कोलकाता नगर निगम (KMC) | 17 ठिकानों पर नोटिस | अभिषेक और उनके माता-पिता पर अवैध निर्माण का आरोप |
राज्य सीआईडी (CID) | समन जारी | शोभनदेव चटर्जी के फर्जी हस्ताक्षर मामले में जांच की आंच |
CBI और ED | पुराने मामले री-ओपन | कोयला और पशु तस्करी कांड में चारों तरफ से घेराबंदी |
अपनों के ही निशाने पर अभिषेक
बंगाल चुनाव में मिली शर्मनाक पराजय के बाद से ही टीएमसी के भीतर असंतोष का लावा उबल रहा था। कालीघाट स्थित मुख्यमंत्री आवास पर हुई समीक्षा बैठक के दौरान कई विधायकों ने बिना किसी डर के सीधे अभिषेक बनर्जी के मुंह पर उन्हें हार का कसूरवार ठहराया।
पार्टी के जमीनी नेताओं ने अभिषेक की कार्यशैली पर तीन गंभीर आरोप लगाए हैं:
तानाशाही रवैया: वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर एकतरफा और घमंड भरे फैसले लेना।
फर्जीवाड़े का आरोप: शोभनदेव चटर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने के कागजात पर फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल (जिसके बाद ऋतव्रत बनर्जी 58 विधायकों के समर्थन से खुद नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठ गए)।
गलत टिकट वितरण: फलता विधानसभा सीट से जहांगीर खान के ऐन वक्त पर मैदान छोड़ने का ठीकरा भी अभिषेक की रणनीतियों पर फूटा।
चारों तरफ से कसा कानूनी शिकंजा
अभिषेक बनर्जी इस समय सिर्फ राजनैतिक रूप से ही अनाथ नहीं हुए हैं, बल्कि कानूनी चक्रव्यूह में भी बुरी तरह घिर चुके हैं:
भड़काऊ भाषण: उनके खिलाफ राज्य में ताजा एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है।
लोकल बॉडी का एक्शन: कोलकाता नगर निगम ने उनके 17 ठिकानों पर अवैध निर्माण के नोटिस चस्पा कर दिए हैं।
केंद्रीय एजेंसियों का फंदा: सबसे बड़ी मुसीबत बनकर आई हैं CBI और ED की टीमें, जो अब पशु और कोयला तस्करी के पुराने दबे हुए मामलों में उनकी अंतिम घेराबंदी करने में जुट गई हैं।
2014 की वो शुरुआत और I-PAC से पड़ी दरार
अभिषेक बनर्जी के सफर पर नजर डालें तो साल 2014 में वे पहली बार डायमंड हार्बर से सांसद बने थे। शुभेंदु अधिकारी और मुकुल रॉय जैसे कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ते ही अभिषेक टीएमसी के 'नंबर-2' बन गए। लेकिन इस पूरे तख्तापलट की असल नींव साल 2021 में तब पड़ी थी, जब चुनावी रणनीतिकार कंपनी I-PAC ने बंगाल के भीतर एंट्री ली थी। आई-पैक की कॉर्पोरेट कार्यशैली ने अभिषेक बनर्जी और टीएमसी के पुराने, पसीने बहाने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच एक ऐसी गहरी खाई खोद दी थी, जिसका परिणाम आज 2026 में टीएमसी के पूर्ण 'विघटन' के रूप में सामने आ रहा है।