एक के बाद एक बिखरीं 3 बड़ी पार्टियां, उद्धव से लेकर ममता तक का ढहा किला, जानिए कैसे

Opposition Parties Split: उद्धव ठाकरे की शिवसेना, ममता बनर्जी की TMC और AAP में उठी बगावत ने विपक्ष की राजनीति को हिला दिया है। जानिए कैसे तीन बड़ी पार्टियां संकट में पहुंचीं और इसके पीछे क्या वजहें हैं। जानिए कैसे इन बागियों के दम पर लोकसभा में NDA का आंकड़ा 319 के पार पहुंच गया है।

Update:2026-06-21 10:47 IST

Opposition Parties Split: भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय भूचाल आया हुआ है. विपक्ष में खुद को कांग्रेस के बाद नंबर दो की हैसियत का बताने वाली तीन सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों के भीतर एक के बाद एक हुई ऐतिहासिक बगावत ने पूरे देश को हैरान कर दिया है. टूटने का यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद अचानक पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खेमे में जा खड़े हुए. इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के आते ही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखरती हुई नजर आई.

अब इस सियासी तूफान का अगला शिकार महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना बनी है, जहां साल 2022 की महा-बगावत के बाद बची-खुची पार्टी में एक बार फिर से बहुत बड़ा विद्रोह हो गया है. खबर है कि उद्धव गुट के 9 में से 6 लोकसभा सांसद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ जाने की कतार में खड़े हैं. विपक्षी दल इस पूरी टूट के लिए सीधे तौर पर बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जबकि बीजेपी ने इन दावों को खारिज करते हुए इसे विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व की नाकामी और आपसी असंतोष का नतीजा बताया है.

नेताओं ने क्यों छोड़ा साथ?

इस पूरे सियासी घमासान के बीच बीजेपी के एक बेहद वरिष्ठ सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर कई अंदरूनी और कड़वे सच उजागर किए हैं. उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रीय पार्टियों के भीतर इस समय नेतृत्व का भारी अकाल पड़ा हुआ है, यही वजह है कि उनके अपने सांसद और जमीनी नेता एक-एक कर उनका साथ छोड़ रहे हैं. बीजेपी नेता ने विधायकों और सांसदों के दल बदलने के पीछे तीन सबसे बड़े कारण बताए हैं.

पहला कारण यह है कि जब किसी चुने हुए जनप्रतिनिधि को अपनी मौजूदा पार्टी में अपना खुद का राजनीतिक भविष्य पूरी तरह अंधकार में नजर आने लगता है. दूसरा बड़ा कारण यह होता है कि जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और जमीन पर खून-पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं के बीच का आपसी तालमेल और रिश्ता पूरी तरह खत्म हो जाता है. वहीं तीसरा कारण अन्य राजनीतिक लाभ या वित्तीय हिस्सेदारी होती है, जिसमें पैसा और ऊंचे पद शामिल होते हैं.

उद्धव की शिवसेना में खत्म हुआ बालासाहब वाला दौर

बीजेपी नेता ने महाराष्ट्र के संकट पर खुलकर बात करते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे के गुट में शामिल नेता अपने नेतृत्व के तौर-तरीकों से बेहद नाराज थे. उन्होंने याद दिलाते हुए कहा कि एक वो दौर था जब श्रद्धेय बालासाहब ठाकरे खुद यह सुनिश्चित करते थे कि पार्टी के हर छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता का पूरा ख्याल रखा जाए. लेकिन आज के उद्धव गुट में वैसा कोई पारिवारिक जुड़ाव या स्नेह बाकी नहीं रह गया है.

वहां के बड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच की कड़ी पूरी तरह टूट चुकी है. उन्होंने यह भी दावा किया कि आज भी जो लोग सिर्फ पुरानी वफादारी के कारण उद्धव ठाकरे के साथ मजबूरी में टिके हुए हैं, उनके मन में भी इस बात को लेकर भारी गुस्सा है कि पार्टी ने कांग्रेस जैसी धुर विरोधी विचारधारा के साथ केवल सत्ता के लिए समझौता करके अपनी कट्टर हिंदुत्व वाली छवि को हमेशा के लिए मिट्टी में मिला दिया है.

बंगाल में ममता के खिलाफ तख्तापलट

पश्चिम बंगाल की राजनीति में मचे हाहाकार पर बीजेपी के एक अन्य बड़े नेता ने बेहद तीखा तंज कसा है. उन्होंने कहा कि बंगाल में विधायकों ने ममता बनर्जी की पार्टी को सिर्फ छोड़ा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर एक बड़ा राजनीतिक तख्तापलट है. यह कोई एक या दो नेताओं की सामान्य नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि लगभग सभी विधायकों ने एक साथ सुर मिलाकर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है और रितब्रत बनर्जी को विधानसभा में नया नेता प्रतिपक्ष चुन लिया है. इसके अलावा, टीएमसी के 20 लोकसभा सांसद सीधे तौर पर एनसीपीआई में शामिल हो चुके हैं.

इस ऐतिहासिक बदलाव की सबसे बड़ी वजह यह है कि नेताओं का ममता बनर्जी के तानाशाही रवैये से भरोसा उठ चुका था. ममता बनर्जी अपनी पार्टी को लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के बजाय एक निजी जागीर की तरह चला रही थीं, जहां जनता द्वारा चुनकर आए नेताओं की आवाज को दबा दिया जाता था. यही कारण है कि जैसे ही उनके हाथ से सत्ता की चाबी फिसली, वैसे ही लोग भी उनका साथ छोड़कर भाग खड़े हुए.

दो-तिहाई बहुमत की तरफ बढ़ते NDA के कदम

भले ही सत्ताधारी दल इस पूरी टूट-फूट में अपना हाथ होने से साफ इनकार कर रहा हो, लेकिन विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि केंद्र सरकार संसद के भीतर अपनी स्थिति को अभेद्य बनाने के लिए जांच एजेंसियों के दम पर उनके सांसदों को डरा-धमका रही है. ममता और उद्धव का आरोप है कि सरकार महिला आरक्षण और देश में होने वाले नए परिसीमन विधेयक जैसे बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनों को बिना किसी अड़चन के पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने में लगी है.

अगर आंकड़ों की बाजीगरी को देखें, तो इस बगावत का सीधा और सबसे बड़ा फायदा बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन को मिलने जा रहा है. पाला बदलने वाले सभी बागी नेताओं ने खुलकर केंद्र सरकार को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी है. वर्तमान में लोकसभा के भीतर एनडीए के पास अपने 293 सांसद मौजूद हैं. अब इन नए बागी सांसदों का समर्थन मिलते ही सत्ता पक्ष का यह आंकड़ा सीधे 319 के पार पहुंच जाएगा, जिससे मोदी सरकार आने वाले दिनों में कई बड़े और कड़े फैसले संसद में एक झटके में पास कराने में पूरी तरह कामयाब हो जाएगी.

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