बिहार में 'नीतीश युग' का अंत,जाते-जाते खाली कर गए खजाना? तेजस्वी के दावों ने मचाया हड़कंप!
Nitish Kumar Resignation News: बिहार में नीतीश युग का अंत! क्या इस्तीफे से पहले नीतीश कुमार ने खाली कर दिया सरकारी खजाना? जानें तेजस्वी यादव के आरोपों का सच और बिहार पर बढ़ते 3.88 लाख करोड़ के कर्ज की पूरी रिपोर्ट।
Nitish Kumar Resignation News: बिहार की राजनीति में एक ऐसे अध्याय का अंत होने जा रहा है जिसने दशकों तक सूबे की किस्मत को अपने हाथों में थामे रखा। मंगलवार का दिन बिहार के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होने वाला है या सुनहरे, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन एक बात तय है कि नीतीश कुमार के इस्तीफे के साथ ही एक बड़े युग का समापन हो रहा है। जहां एक तरफ सत्ता के गलियारों में नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर हलचल तेज है, वहीं दूसरी तरफ पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने एक ऐसा बम फोड़ा है जिसने पूरे प्रदेश के होश उड़ा दिए हैं। तेजस्वी का सीधा आरोप है कि नीतीश कुमार बिहार को उस मोड़ पर छोड़कर जा रहे हैं जहां खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है और अब बिहार की सरकार स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि 'दिल्ली' के इशारों पर चलेगी।
कंगाल हो गया बिहार?
तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार की विदाई के वक्त जो आंकड़े पेश किए हैं, वे किसी डरावनी फिल्म की कहानी से कम नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए के 20 साल के शासन के बाद भी बिहार आज वहां खड़ा है जहां गरीबी सबसे ज्यादा है और विकास के नाम पर सिर्फ खोखले वादे बचे हैं। तेजस्वी का दावा है कि नीतीश कुमार ने जाते-जाते राज्य की तिजोरी में सिर्फ उधारी और कर्ज छोड़ा है। लोगों के मन में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई बिहार के पास अब अपने कर्मचारियों को सैलरी देने तक के पैसे नहीं बचे हैं? क्या निवेश और शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली का जो दावा तेजस्वी कर रहे हैं, वह बिहार की अगली सरकार के लिए एक सुलगता हुआ कांटा बनने वाला है?
आंकड़ों की जुबानी
जब हम बिहार के बजट के दस्तावेजों को खंगालते हैं, तो तेजस्वी के दावों में एक कड़वी सच्चाई नजर आती है। बिहार का 2026-27 का बजट करीब 3.47 लाख करोड़ रुपये का है, लेकिन इसकी गहराई में छिपे तथ्य बेहद चिंताजनक हैं। बिहार सरकार की अपनी कमाई इतनी कम है कि उसे अपनी जरूरतों का करीब 74% हिस्सा केंद्र सरकार से मिलने वाली मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बिहार आज देश के सबसे कर्जदार राज्यों की सूची में ऊपर आ गया है। आपको जानकर हैरानी होगी कि बिहार सरकार हर रोज करीब 132 करोड़ रुपये सिर्फ पुराने कर्ज की किश्तें और उनका ब्याज भरने में लुटा रही है। यानी विकास के काम शुरू होने से पहले ही राज्य की एक बड़ी रकम उधारी चुकाने में खत्म हो जाती है।
विकास के लिए बचा है सिर्फ 18 फीसदी पैसा
बिहार की माली हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार को अपनी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा यानी 1.31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा तो सिर्फ सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और पेंशन देने में खर्च करना पड़ रहा है। इसके बाद जो थोड़ा-बहुत बचता है, वह सब्सिडी और अन्य प्रशासनिक खर्चों की भेंट चढ़ जाता है। आलम यह है कि पूरे बजट का सिर्फ 18% हिस्सा ही ऐसा बचता है जिसे स्कूल, अस्पताल, सड़क और कॉलेज जैसे बुनियादी ढांचे पर खर्च किया जा सके। 2026-27 तक बिहार पर कुल कर्ज का बोझ बढ़कर 3.88 लाख करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है, जो राज्य की जीडीपी का लगभग 30% है।
क्या अब दिल्ली से चलेगी बिहार की सरकार?
तेजस्वी यादव का यह कहना कि 'अब सरकार दिल्ली से चलेगी', बिहार की जनता के मन में एक गहरा डर पैदा कर रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर होने का मतलब है कि अब हर छोटी-बड़ी योजना के लिए बिहार को केंद्र के सामने हाथ फैलाने होंगे। नीतीश कुमार के जाने के बाद जो भी नया मुख्यमंत्री कुर्सी पर बैठेगा, उसके सामने फूलों की सेज नहीं बल्कि कांटों भरा ताज होगा। क्या नई सरकार इस खाली खजाने के साथ बिहार को पटरी पर ला पाएगी? या फिर कर्ज का यह दलदल बिहार के भविष्य को निगल जाएगा? फिलहाल तो सबकी निगाहें मंगलवार के उस इस्तीफे पर टिकी हैं, जो बिहार की राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल देगा।