'मच्छर मारने के लिए तलवार...' कैडिला दवा कंपनी पर FDA की कार्रवाई से क्यों भड़का HC? जमकर लगाई फटकार

Bombay HC Slams FDA: कैडिला फार्मास्यूटिकल्स पर महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने दवाओं की बिक्री पर रोक लगाने के तरीके पर सवाल उठाते हुए 'मच्छर मारने के लिए तलवार' जैसी तीखी टिप्पणी की।

Update:2026-08-11 19:12 IST

Bombay HC Slams FDA: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मंगलवार के दिन कैडिला फार्मास्यूटिकल्स को राहत प्रदान करते हुए महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के कार्यशैली की कड़े शब्दों में निंदा की। न्यायालय ने दवाओं के विक्रय पर पाबंदी लगाने वाले प्रशासनिक फरमानों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले गोलियां बरसाना और तत्पश्चात पूछताछ करना मध्यकालीन अथवा कबीलाई व्यवस्था का हिस्सा तो हो सकता है, परंतु लोकतांत्रिक कानून और सभ्य समाज में ऐसे तरीकों का कोई स्थान नहीं है। उच्च न्यायालय के अत्यंत तल्ख रवैये को भांपते हुए महाराष्ट्र नियामक प्राधिकरण कैडिला कंपनी पर आरोपित बिक्री प्रतिबंध के आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लेने हेतु रजामंद हो गया।

अधिकारों का अनुचित प्रयोग और तीखे सवाल

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश आरवी घुगे एवं न्यायमूर्ति गौतम अंखड की संयुक्त पीठ कैडिला फार्मास्यूटिकल्स द्वारा दायर याचिका पर निर्णय दे रही थी। दवा निर्माता संस्था ने औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा अपनी कई आवश्यक दवाओं के भंडारण को ज़ब्त करने तथा उनके वितरण को रोकने संबंधी फैसलों को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने आयुक्त तुकाराम मुंढे के नेतृत्व वाले प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गहरी अप्रसन्नता प्रकट की। अदालत ने कहा कि विभाग के पास असीम शक्तियां अवश्य हैं, परंतु चिंता का विषय उन अधिकारों का इस्तेमाल करने की गलत पद्धति है। न्यायाधीश ने तुलना करते हुए कहा कि मच्छरों का खात्मा करने के लिए विशाल तलवार लहराना किसी भी दृष्टिकोण से विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

मरीजों की तकलीफों पर पीठ ने जताई गहरी चिंता

मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका मुख्य ध्येय कंपनी को हुए वित्तीय घाटे का मूल्यांकन करना नहीं है। अदालत का प्रमुख ध्यानाकर्षण उन असहाय रोगियों की कठिनाइयों पर है, जो इस पाबंदी के कारण आवश्यक औषधियों से वंचित रह गए। पीठ ने कहा कि लगभग 20 दिवसों तक औषधियों का विपणन पूरी तरह ठप रहा और यदि वर्तमान समय तक की गणना की जाए तो प्रभावी रूप से 32 दिनों तक नागरिक इन दवाओं से महरूम रहे। पीठ ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि भविष्य में विधिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करके इस प्रकार के स्वेच्छाचारी निर्णय जारी किए गए, तो नियामक एजेंसी पर भारी आर्थिक जुर्माना थोपा जा सकता है।

नियामक निकाय का पक्ष और भ्रम की दलील

दूसरी ओर, महाराष्ट्र FDA ने अदालत के समक्ष अपनी आक्रामक कार्रवाई का बचाव करने का प्रयास किया। नियामक एजेंसी की ओर से दलील दी गई कि संबंधित कंपनी के कतिपय उत्पादों का नामकरण तथा ब्रांडिंग का स्वरूप काफी हद तक एक समान था, जबकि उनमें प्रयोग किए गए एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) पूरी तरह भिन्न थे। अथॉरिटी के अनुसार, इस दृश्य समानता के चलते चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कर्मियों अथवा आम उपभोक्ताओं के मध्य गलत औषधि का चुनाव करने का भारी जोखिम उत्पन्न हो सकता था। हालांकि, अदालत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के उत्तरदायित्व को स्वीकारते हुए भी विवेकपूर्ण संतुलन बनाए रखने की हिदायत दी।

आदेश वापसी की सहमति और भविष्य की प्रक्रिया

उच्च न्यायालय की सख्त मौखिक टिप्पणियों एवं कड़े रुख के उपरांत महाराष्ट्र औषधि प्रशासन अपने पूर्व आदेश को निरस्त करने पर सहमत हो गया। नियामक विभाग ने न्यायालय को आश्वस्त किया कि आगामी समय में कोई भी दंडात्मक कदम उठाने से पूर्व विधिवत स्थापित कानूनी नियमों का अक्षरशः अनुपालन किया जाएगा। इसके अंतर्गत कैडिला कंपनी को नए सिरे से कारण बताओ नोटिस निर्गत किए जाएंगे। संस्था को अपना लिखित पक्ष प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर प्रदान करने के पश्चात ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

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