पेपर लीक से बड़ा संकट! धर्मेंद्र प्रधान को हटाने से क्यों डर रही है मोदी सरकार?
NEET Paper Leak Row: धर्मेंद्र प्रधान पर क्यों अड़ी है मोदी सरकार? इस्तीफा नहीं, सियासी संदेश दांव पर। पढ़ें पूरी रिपोर्ट...
Dharmendra Pradhan Resignation: भारत में पेपर लीक का मुद्दा अब सिर्फ छात्रों की परीक्षा तक सीमित नहीं रहा। यह राजनीति की ऐसी परीक्षा बन चुका है, जिसमें विपक्ष सवाल पूछ रहा है, सरकार जवाब देने के बजाय व्यवस्था सुधारने का दावा कर रही है और इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में हैं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान। विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) लगातार उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार का रुख साफ है 'मंत्री नहीं हटेंगे, सिस्टम सुधरेगा।'
राजनीति के जानकार मानते हैं कि मामला अब सिर्फ एक मंत्री के पद का नहीं, बल्कि सरकार की साख, राजनीतिक रणनीति और प्रशासनिक अधिकार का बन चुका है। अगर सरकार इस मोर्चे पर झुकती है तो विपक्ष इसे अपनी जीत बताएगा और अगर नहीं झुकती तो विपक्ष के पास सरकार को घेरने का एक स्थायी मुद्दा बना रहेगा। यानी पेपर लीक की कॉपी भले जब्त हो जाए लेकिन सियासी प्रश्नपत्र अभी लंबा चलने वाला है।
सरकार का मंत्र 'व्यक्ति नहीं, व्यवस्था जिम्मेदार'
सरकार लगातार यही कह रही है कि पेपर लीक किसी एक मंत्री की गलती नहीं बल्कि वर्षों से चली आ रही व्यवस्थागत समस्या है। ऐसे में यदि केवल राजनीतिक दबाव में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिया जाता है तो यह संदेश जाएगा कि सरकार खुद अपनी नीतियों को असफल मान रही है।
सरकार शायद यह भी नहीं चाहती कि विपक्ष को यह कहने का मौका मिले कि हंगामा करो और मंत्री बदलवा लो। क्योंकि एक बार यह रास्ता खुल गया तो आगे हर विवाद में इस्तीफे की मांग राजनीति का सबसे आसान हथियार बन सकती है।
धर्मेंद्र प्रधान सिर्फ शिक्षा मंत्री नहीं, बीजेपी का बड़ा राजनीतिक चेहरा
धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के प्रभावशाली ओबीसी नेताओं में गिने जाते हैं। ओडिशा में पार्टी के विस्तार और हालिया चुनावी सफलता में उनकी भूमिका को पार्टी खुलकर स्वीकार करती रही है। ऐसे नेता को हटाना सिर्फ कैबिनेट का फैसला नहीं होगा, बल्कि पार्टी के राजनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकता है। सरकार शायद यह संदेश नहीं देना चाहती कि विपक्ष के दबाव में उसका कोई वरिष्ठ चेहरा बलि का बकरा बन सकता है।
नए कानून और सख्त कार्रवाई की विश्वसनीयता भी दांव पर
सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने के लिए नया कानून लागू किया, जिसमें पेपर लीक करने वालों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार कह चुके हैं कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
अब यदि सरकार कानून लागू करने के तुरंत बाद अपने ही शिक्षा मंत्री को हटा दे तो विपक्ष इसे कानून की नहीं, सरकार की विफलता बताएगा। इसलिए सरकार का जोर व्यक्ति बदलने से ज्यादा संस्थागत सुधार दिखाने पर है।
विपक्ष की एकजुटता सरकार के लिए अलग चुनौती
काफी समय बाद ऐसा देखने को मिला कि कई विपक्षी दल एक ही मांग पर लगभग एक सुर में दिखाई दिए। संसद से लेकर सड़क तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग लगातार उठ रही है। सरकार शायद यह संदेश भी नहीं देना चाहती कि विपक्ष यदि एकजुट हो जाए तो सरकार अपने फैसले बदल देती है। क्योंकि ऐसा हुआ तो आने वाले हर बड़े मुद्दे पर यही रणनीति दोहराई जा सकती है।
संसद में बहस से ज्यादा नियमों की लड़ाई
पेपर लीक पर संसद में बहस भी कम दिलचस्प नहीं रही। विपक्ष चाहता था कि ऐसा नियम लागू हो जिससे सरकार सीधे कठघरे में आए, जबकि सरकार ऐसे प्रावधानों के तहत चर्चा चाहती थी जिनमें मतदान या सरकार पर सीधा दबाव न बने।
कह सकते हैं कि संसद में बहस कम और नियम पुस्तिका के पन्ने ज्यादा पलटे गए। विपक्ष जवाब मांगता रहा और सत्ता पक्ष प्रक्रिया समझाता रहा। लोकतंत्र में कभी-कभी नियम भी मुख्य किरदार बन जाते हैं।
कानूनी तौर पर मंत्री की सीधी जिम्मेदारी तय नहीं
अब तक किसी जांच एजेंसी या न्यायिक प्रक्रिया में धर्मेंद्र प्रधान की व्यक्तिगत भूमिका या लापरवाही साबित नहीं हुई है। जांच का फोकस मुख्य रूप से पेपर लीक नेटवर्क, दलालों, कुछ अधिकारियों और संस्थानों पर रहा है। ऐसे में सरकार का तर्क है कि बिना प्रत्यक्ष जिम्मेदारी तय हुए किसी मंत्री को हटाना प्रशासनिक परंपरा के लिहाज से सही मिसाल नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख भी सरकार के पक्ष में
नीट-यूजी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षा पूरी तरह रद्द करने से इनकार किया था। अदालत ने व्यवस्था में सुधार की जरूरत जरूर बताई, लेकिन पूरे सिस्टम को ध्वस्त करने जैसा कोई आदेश नहीं दिया। सरकार इसी आधार पर यह कहती रही है कि सुधार किए जाएंगे, दोषियों पर कार्रवाई होगी, लेकिन केवल राजनीतिक दबाव के आधार पर मंत्री हटाना उचित नहीं होगा।
सियासत की असली परीक्षा अभी बाकी
विपक्ष का कहना है कि नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, इसलिए शिक्षा मंत्री को पद छोड़ना चाहिए। सरकार का जवाब है कि नैतिकता और कानूनी जिम्मेदारी दो अलग-अलग बातें हैं और कार्रवाई दोषियों पर होगी, मंत्री पर नहीं। दिलचस्प यह है कि जिन छात्रों की परीक्षा से यह विवाद शुरू हुआ था, उनकी चिंता अब राजनीतिक बहस के शोर में कहीं पीछे छूटती नजर आती है। संसद में आरोपों की कॉपियां खूब जांची जा रही हैं, लेकिन छात्र अब भी उस व्यवस्था के नतीजे का इंतजार कर रहे हैं जिसमें अगली परीक्षा बिना लीक के हो।
फिलहाल तस्वीर साफ है विपक्ष इस्तीफे की मांग छोड़ने के मूड में नहीं है और सरकार झुकने के संकेत नहीं दे रही। यानी आने वाले दिनों में यह लड़ाई सिर्फ शिक्षा मंत्रालय की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा भी बनी रहेगी।