एक IAS जिसने हिला दिया था पूरा सिस्टम! अखिलेश ने किया था सस्पेंड, मोदी सरकार में बदले नियम...फिर चर्चा में दुर्गा शक्ति नागपाल
IAS Durga Shakti Nagpal: IAS दुर्गा शक्ति नागपाल फिर चर्चा में हैं। 2013 में अवैध रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई और अखिलेश यादव सरकार के निलंबन से लेकर IAS नियमों में बदलाव तक, जानिए उनके विवादों की पूरी कहानी।
IAS Durga Shakti Nagpal: उत्तर प्रदेश कैडर की 2010 बैच की चर्चित और निडर आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल एक बार फिर देश की सुर्खियों में हैं। वर्तमान में देवीपाटन मंडल की मंडलायुक्त के पद पर तैनात दुर्गा शक्ति नागपाल पर गोंडा की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) शबीना खान को फोन कर एक लंबित मुकदमे में अनुचित दबाव बनाने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले पर संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने भी प्रथम दृष्टया टिप्पणी करते हुए माना है कि अधिकारी ने न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब दुर्गा शक्ति नागपाल के किसी कदम से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मचा हो। यह पूरी दास्तान वर्ष 2013 के उस बहुचर्चित प्रकरण की याद दिलाती है, जिसने देश के पूरे प्रशासनिक ढांचे की नींव हिला दी थी। एक तरफ उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जनदबाव में अपना फैसला वापस लेना पड़ा था, तो दूसरी तरफ केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार भी नियमों में संशोधन की पूरी रूपरेखा तैयार करने पर मजबूर हुई थी। अंततः वर्ष 2015 में केंद्र की मोदी सरकार ने नौकरशाही के निलंबन से जुड़े दशकों पुराने नियमों को पूरी तरह बदल डाला।
साल 2013 का वो खौफनाक रेत खनन का केस
बात वर्ष 2013 की है, जब दुर्गा शक्ति नागपाल गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) जिले में उप जिलाधिकारी (SDM) के पद पर तैनात थीं। उस दौरान यमुना और हिंडन नदी के तटीय इलाकों में बालू और रेत का अवैध खनन अपने चरम पर था। भू-माफिया बेखौफ होकर प्राकृतिक संसाधनों की लूट मचा रहे थे। नवागत आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल ने इस अवैध खनन गिरोह के खिलाफ सीधी जंग छेड़ दी। उन्होंने ताबड़तोड़ छापेमारी की, दर्जनों गाड़ियां और पोकलैंड मशीनें जब्त कीं और खनन माफिया में खौफ भर दिया।
इसी कड़ी कार्रवाई के बीच, कादलपुर गांव में एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिराए जाने का मामला सामने आया। तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने 28 जुलाई 2013 को आनन-फानन में दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित कर दिया। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि अधिकारी ने धार्मिक स्थल की दीवार ढहाकर सांप्रदायिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा पैदा किया था। लेकिन, दुर्गा शक्ति नागपाल ने इन बेबुनियाद आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका यह निलंबन सिर्फ एक जिले का मामला नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में राजनीतिक दबाव और अफसरशाही की स्वायत्तता पर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस में बदल गया।
जब अखिलेश यादव को वापस लेना पड़ा फैसला और विवश दिखे मनमोहन सिंह
दुर्गा शक्ति नागपाल के अन्यायपूर्ण निलंबन की खबर फैलते ही देशभर के आईएएस एसोसिएशन, नागरिक समाज और सोशल मीडिया पर आक्रोश का ज्वाला भड़क उठी। चारों तरफ से अखिलेश यादव सरकार की तीखी घेराबंदी शुरू हो गई। मामला इतना संवेदनशील हो गया कि केंद्र की तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को भी इसमें सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा।
तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने स्वयं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से टेलीफोन पर वार्ता की और मामले की निष्पक्ष रिपोर्ट मांगी। वहीं दूसरी तरफ, दुर्गा शक्ति नागपाल अपने सिद्धांतों पर अडिग रहीं और उन्होंने किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे झुकने से साफ इंकार कर दिया। देशव्यापी फजीहत और आईएएस लॉबी के अभूतपूर्व दबाव के आगे आखिरकार अखिलेश यादव सरकार को घुटने टेकने पड़े। अक्टूबर 2013 में राज्य सरकार ने दुर्गा शक्ति का निलंबन पूरी तरह से वापस ले लिया। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम ने यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या राज्य सरकारें अपनी निजी रंजिश या राजनीतिक लाभ के लिए देश के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को बलि का बकरा बना सकती हैं?
मनमोहन सरकार की अधूरी तैयारी को मोदी सरकार ने दिया मुकम्मल अंजाम
नागपाल प्रकरण से सबक लेते हुए तत्कालीन केंद्र की यूपीए (मनमोहन सिंह) सरकार ने महसूस किया कि राज्य सरकारों के पास अखिल भारतीय सेवा (IAS/IPS/IFS) के अधिकारियों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने का जो असीमित अधिकार है, उस पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी है। मनमोहन सरकार ने नियमों में संशोधन की प्रक्रिया तो शुरू की, लेकिन 2014 के आम चुनावों से पहले वे इसे वैधानिक रूप नहीं दे सके।
वर्ष 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, तो इस लंबित सुधार को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया गया। वर्ष 2015 में मोदी सरकार ने 'ऑल इंडिया सर्विसेज (डिसिप्लिन एंड अपील) रूल्स' में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव कर दिया। इस संशोधन के जरिए राज्य सरकारों की मनमानी पर हमेशा-हमेशा के लिए ब्रेक लगा दिया गया और केंद्र सरकार की निगरानी को बेहद सख्त कर दिया गया।
दुर्गा शक्ति नागपाल केस के बाद देश की अफसरशाही में क्या-क्या बदला?
2015 के नए संशोधन के बाद अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की सुरक्षा के लिए जो ऐतिहासिक नियम लागू हुए, वे इस प्रकार हैं:
48 घंटे के भीतर केंद्र को अनिवार्य सूचना: पहले राज्य सरकारें किसी भी आईएएस या आईपीएस अधिकारी को सस्पेंड करने के बाद 15 दिनों तक केंद्र को सूचित नहीं करती थीं। नए नियम के तहत निलंबन के 48 घंटे के भीतर केंद्र सरकार को तुरंत सूचना देना अनिवार्य कर दिया गया।
निलंबन की शुरुआती समय सीमा 30 दिन: पूर्व में राज्य सरकारें बिना किसी समीक्षा के अधिकारी को शुरुआती तौर पर 90 दिनों तक निलंबित रख सकती थीं। मोदी सरकार ने इस अवधि को घटाकर मात्र 30 दिन कर दिया।
30 दिनों में चार्जशीट नहीं तो निलंबन स्वतः रद्द: नए कड़े प्रावधान के अनुसार, यदि राज्य सरकार निलंबित अधिकारी के खिलाफ 30 दिनों के भीतर आधिकारिक आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल नहीं करती है, तो अधिकारी का निलंबन खुद-ब-खुद समाप्त माना जाएगा।
समीक्षा समिति की मंजूरी अनिवार्य: राज्य सरकारें अब अपनी मर्जी से अनिश्चितकाल तक निलंबन नहीं बढ़ा सकतीं। निलंबन अवधि को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय और राज्य स्तरीय समीक्षा समिति (Review Committee) की लिखित सिफारिश और केंद्र की मंजूरी जरूरी है।
सेंट्रल डेपुटेशन वाले अफसरों को विशेष सुरक्षा कवच: केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को राज्य सरकारें सीधे निलंबित नहीं कर सकतीं। उनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई का पूरा अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास ही सुरक्षित रहेगा।