Goa Liberation History: गोवा पर किसका था कब्ज़ा, भारत ने कैसे कराया मुक्त?
Goa Liberation History: गोवा की धरती पर बने प्राचीन किले और गुफाएं यहाँ के लंबे संघर्ष और सांस्कृतिक इतिहास की मूक गवाह हैं।
Goa Liberation History
Goa Liberation History: 15 अगस्त, 1947 को जब पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा था, तब देश का एक हिस्सा ऐसा भी था जो क्रूर औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। वह था—गोवा, दमन और दीव। जहाँ भारत के बाकी हिस्सों पर अंग्रेजों ने लगभग 200 साल राज किया, वहीं गोवा पर पुर्तगालियों का 451 वर्षों (1510 से 1961) का लंबा और दमनकारी शासन रहा। गोवा की आजादी केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह दशकों पुराने जन-आंदोलन, रणनीतिक किलों की गवाही, सत्याग्रहियों के बलिदान और कूटनीतिक धैर्य की परिणति थी।
ऐतिहासिक धरोहरें और दमन के प्रतीक: किलों और गुफाओं का सत्य
गोवा की धरती पर बने प्राचीन किले और गुफाएं यहाँ के लंबे संघर्ष और सांस्कृतिक इतिहास की मूक गवाह हैं। किला आम्वाद (अगुआड़ा किला) और महिला जेल: यह किला पुर्तगाली वास्तुकला और सामरिक शक्ति का मुख्य केंद्र था। इसके दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर स्थित मोर्मुकगाओ प्रायद्वीप पुर्तगाली जहाजों के लिए एक प्रमुख लंगर बिंदु था। बाद में इसे एक बैरक और जेल में बदल दिया गया। इसके परिसर में स्थित महिला जेल सेल वह कुख्यात जगह थी, जहाँ गोवा की मुक्ति के लिए आवाज उठाने वाली कई महिला क्रांतिकारियों को कैद करके रखा गया था।
काबो दे रामा (खोला किला): इस प्राचीन किले का इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान राम वनवास के दौरान यहाँ ठहरे थे। सोंडेकर राजाओं के सामंतों द्वारा निर्मित इस किले पर बाद में पुर्तगालियों ने कब्जा कर लिया और इसे 1955 तक एक जेल के रूप में इस्तेमाल किया, जहाँ स्वतंत्रता सेनानियों को प्रताड़ित किया जाता था।
हाथ कतरो खम्बो (हत्कात्रो खम्बो): पुराने गोवा (ओल्ड गोवा) में स्थित यह ऐतिहासिक स्तंभ पुर्तगाली धार्मिक न्यायालय (Inquisition) और उनकी क्रूरता का सबसे वीभत्स प्रतीक है। पूछताछ और दमन के दौरान कैदियों और विद्रोहियों के हाथ काटने व उन्हें शारीरिक दंड देने के लिए इस स्तंभ का उपयोग किया जाता था।
कुंभरजुआ नहर और रक्षा तंत्र: मांडवी और जुआरी नदियों को जोड़ने वाली यह 11 किमी लंबी नहर पुर्तगालियों और अन्य शासकों के बीच 'नो मैन्स लैंड' थी। इस क्षेत्र को बाहरी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए पुर्तगालियों ने यहाँ मगरमच्छों को लाकर छोड़ दिया था, जिससे एक खतरनाक प्राकृतिक सुरक्षा घेरा तैयार हो गया था।
ऐतिहासिक गुफाएं और मंदिर: गोवा का इतिहास केवल पुर्तगाली दमन का नहीं, बल्कि प्राचीन सांस्कृतिक समृद्धि का भी है। रिवोना गुफाएं (बौद्ध इतिहास और महावीर की मूर्ति का केंद्र), लमगाओ गुफाएं (शिवलिंग पूजा) और अर्वलेम गुफाएं (छठी शताब्दी की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं, जिन्हें बौद्ध और पांडव कालीन माना जाता है) तथा 1000 वर्ष पुराना तांबडी सुरला शिव मंदिर (कदंब-यादव वास्तुकला) यह सिद्ध करते हैं कि गोवा सांस्कृतिक रूप से हमेशा से अखंड भारत का हिस्सा था।
18 जून 1946: जन क्रांति का बिगुल और डॉ. लोहिया का योगदान
भारत के मुख्य भूभाग पर जब अंग्रेजी सत्ता कमजोर हो रही थी, तब कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं का मानना था कि अंग्रेजों के जाते ही पुर्तगाली खुद-ब-खुद गोवा छोड़कर चले जाएंगे। लेकिन समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया इस विचार से असहमत थे। उनका मानना था कि बिना जन-आंदोलन के पुर्तगाली तानाशाह एंटोनियो सालाजार की सरकार पीछे नहीं हटेगी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत: जून 1946 में डॉ. लोहिया अपने मित्र डॉ. जूलियाओ मेनेजेस के निमंत्रण पर गोवा आए। उन्होंने देखा कि पुर्तगाली शासन में नागरिकों को भाषण देने या सभा करने की कोई स्वतंत्रता नहीं थी।
ऐतिहासिक तारीख - 18 जून 1946: डॉ. लोहिया और डॉ. मेनेजेस ने पुर्तगाली प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए मडगांव (Margao) में एक विशाल जनसभा का आह्वान किया। इसे ही 'गोवा क्रांति दिवस' कहा जाता है। 15 जून को पंजिम में हुई प्रारंभिक सभा के बाद, 18 जून को मडगांव में हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी। पुलिस तैनात थी, लेकिन जनसैलाब के डर से शुरुआत में वह हस्तक्षेप नहीं कर पाई।
क्रांति की मशाल: हालांकि डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर गोवा से बाहर भेज दिया गया, लेकिन उन्होंने आजादी की जो चिंगारी सुलगाई थी, उसने युवाओं को झकझोर दिया। अगले 14 वर्षों तक गोवा के स्थानीय संगठनों (जैसे आजाद गोमंतक दल) और भारतीय सत्याग्रहियों ने इस संघर्ष को जीवित रखा।
सत्याग्रहियों पर बर्बरता और मूर्तियों में कैद बलिदान
पुर्तगाली प्रशासन ने गोवा की आजादी की मांग करने वाले शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर अमानवीय अत्याचार किए। आज पुनर्निर्मित पुराने जेल गेट (संग्रहालय) के मुख्य द्वार के बाहर स्थित मूर्तियां उस दौर के बलिदान को बयां करती हैं। वहाँ स्थापित टूटी बेड़ियों को थामे एक महिला की मूर्ति विदेशी बेड़ियों से मुक्त 'भारत माता' का प्रतीक है। वहीं, एक घायल सत्याग्रही को अपनी बाहों में उठाए हुए व्यक्ति की दूसरी मूर्ति उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के सर्वोच्च बलिदान को दर्शाती है, जिन्हें पुर्तगाली सेना ने बेरहमी से पीटा और शहीद कर दिया था।
वैश्विक राजनीति, नेहरू की कूटनीति और 'ऑपरेशन विजय'
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पुर्तगाल के साथ शांतिपूर्ण कूटनीतिक बातचीत के कई प्रयास किए। लेकिन पुर्तगाल के तानाशाह सालाजार ने गोवा को अपनी 'विदेशी प्रांतीय भूमि' (Overseas Province) बताते हुए बातचीत से साफ इनकार कर दिया।
वैश्विक भू-राजनीति का पेंच:
इस संघर्ष में भारत के सामने बड़ी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां थीं:
नाटो (NATO) का दबाव: पुर्तगाल नाटो का संस्थापक सदस्य था। सालाजार की नीति थी कि यदि भारत गोवा पर हमला करता है, तो इसे नाटो देशों पर हमला माना जाए। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश परोक्ष रूप से पुर्तगाल का समर्थन कर रहे थे।
सत्याग्रहियों का नरसंहार (1955): 15 अगस्त 1955 को भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लगभग 3000 से अधिक निहत्थे सत्याग्रहियों ने गोवा की सीमा में प्रवेश करने का प्रयास किया। पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें 20 से अधिक सत्याग्रही शहीद हो गए। इस घटना ने पूरे भारत को झकझोर दिया और नेहरू सरकार पर सैन्य कार्रवाई का दबाव चरम पर पहुंच गया।
सैन्य कार्रवाई: 'ऑपरेशन विजय' (17-19 दिसंबर, 1961)
जब कूटनीति के सारे रास्ते बंद हो गए और अफ्रीका में पुर्तगाली उपनिवेशों के क्रूर दमन के खिलाफ वैश्विक माहौल बना, तब भारत ने सैन्य विकल्प चुना। 36 घंटे का सैन्य अभियान: 17 दिसंबर 1961 को भारतीय थल सेना, वायुसेना और नौसेना ने संयुक्त रूप से 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया। नौसेना की भूमिका: इस ऑपरेशन में पेक्वेनो द्वीप (बेट आइलैंड) एक रणनीतिक बिंदु था, जो मूल रूप से भारतीय नौसेना के नियंत्रण और अधिकारियों के आवास के लिए इस्तेमाल हुआ, जिसने पुर्तगाली नौसैनिक जहाजों की घेराबंदी की।
आत्मसमर्पण: पुर्तगाली सेना भारतीय सेना के आधुनिक लड़ाकू विमानों और सैन्य कौशल के सामने टिक नहीं सकी। 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली गवर्नर-जनरल मैनुअल एंटोनियो वासालो ए सिल्वा ने आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।
केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य का सफर
19 दिसंबर 1961 को गोवा के पंजिम में सचिवालय पर पुर्तगाली झंडा उतारकर भारतीय तिरंगा फहराया गया। इस प्रकार, गोवा, दमन और दीव को भारत का एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। बाद में, 30 मई 1987 को गोवा को भारत के 25वें पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
आज डोना पाउला के शांत घाट, बटरफ्लाई बीच के लुभावने दृश्य, और चोरला घाट के प्राकृतिक झरने जिस शांति और स्वतंत्रता का अहसास पर्यटकों को कराते हैं, उसकी नींव में डॉ. राममनोहर लोहिया की जनक्रांति, वीर सत्याग्रहियों का खून और भारतीय सेना का पराक्रम शामिल है। गोवा की मुक्ति आधुनिक भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जो यह सिद्ध करता है कि भारत की संप्रभुता और अखंडता से कोई भी औपनिवेशिक ताकत कभी समझौता नहीं कर सकती।