1931 के बाद पहली बार: जनगणना में होगी जातियों की गिनती, तैयार की जा रही है प्रश्नावली; प्री-ट्रायल के नतीजों पर मंथन शुरू
Census: भारत में आगामी जनगणना की तैयारियां तेज हो गई हैं। आजादी के बाद पहली बार देशभर में जातिगत आंकड़े जुटाए जाएंगे। 1931 के बाद होने वाली इस जाति जनगणना के लिए प्री-ट्रायल पूरा हो चुका है।
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Census: देश में आगामी जनगणना (Census) के अगले चरण की तैयारियां तेज हो गई हैं। स्वतंत्रता के बाद यह पहला मौका होगा जब देश स्तर पर जातिगत आंकड़े (Caste Census) भी जुटाए जाएंगे। इससे पहले वर्ष 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान अंतिम बार विस्तृत जातिगत जनगणना कराई गई थी। इसी महीने 6 जुलाई से 20 जुलाई के बीच कराए गए 15 दिवसीय पूर्व-परीक्षण (Pre-Trial) के निष्कर्षों के आधार पर अब जनगणना कर्मियों के लिए प्रश्नों की सूची (प्रश्नावली) और ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किया जा रहा है।
भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त कार्यालय (ORGI) के सामने अब देश के 140 करोड़ से अधिक नागरिकों की जनसांख्यिकी के साथ-साथ उनकी सटीक जातिगत जानकारी का संकलन करने की विशाल जिम्मेदारी है।
मकान सूचीकरण से अलग और चुनौतीपूर्ण होगा दूसरा चरण
जनगणना का दूसरा चरण पूर्व के मकान सूचीकरण (House-listing) चरण से काफी अलग और जटिल होने वाला है:
तकनीकी सुलभता: इस बार जनगणना कर्मियों (Enumerators) के पास डिजिटल डेटा, मैपिंग और जियो-लोकेशन उपलब्ध होंगे, जिससे घर-घर जाकर जानकारी जुटाने में आसानी होगी।
विरोधाभास पकड़ने के लिए हुआ प्री-ट्रायल: 6 से 20 जुलाई के बीच कराए गए प्री-ट्रायल के दौरान नागरिकों को किसी तय श्रेणी या विकल्प (Dropdown Option) में बांधे बिना उनसे सीधे उनकी जाति पूछी गई। इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना था कि लोग अपनी जाति का विवरण किस प्रकार देते हैं और क्षेत्रीय बोलियों या उप-जातियों के कारण आंकड़ों में कितना विरोधाभास (Contradiction) सामने आता है।
शुद्ध डेटा की चुनौती: लोगों द्वारा खुद से बताई गई जाति के आधार पर ढेरों विविध प्रविष्टियां (Entries) मिली हैं। इन बिखरे हुए आंकड़ों से बिल्कुल शुद्ध और सटीक डेटा निकालना एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती साबित हो रहा है, जिसके लिए विशेषज्ञ आंकड़ों पर मंथन कर रहे हैं।
कर्मचारियों के प्रशिक्षण (Training) पर रहेगा विशेष जोर
प्री-ट्रायल के नतीजों का विश्लेषण करने के बाद यह तय किया जाएगा कि जाति पूछने का तरीका क्या हो—क्या विकल्पों की एक सूची दी जाए या फिर खुले उत्तर का विकल्प रखा जाए। इसके बाद ही देशभर के लाखों जनगणना कर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा कि वे नागरिकों से संवेदनशील व तकनीकी सवाल बिना किसी असमंजस के कैसे पूछें।
भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास और महत्व
1931 की जनगणना: भारत में 1931 तक की जनगणना में हर नागरिक की जाति का ब्योरा दर्ज किया जाता था। 1941 में द्वितीय विश्व युद्ध के कारण आंकड़े एकत्र तो हुए लेकिन प्रकाशित नहीं हो सके।
आजादी के बाद का नियम (1951 से 2011): 1947 में आजादी के बाद 1951 से लेकर 2011 तक की सभी जनगणनाओं में केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की ही अलग से गिनती की जाती थी। सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की जातियों का अलग आंकड़ा दर्ज नहीं होता था।
सामाजिक-आर्थिक महत्व: 1931 के 95 साल बाद हो रही इस जातिगत गणना से देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और विभिन्न सामाजिक वर्गों की सटीक आबादी का पता चलेगा, जिससे आरक्षण नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं और बजट आवंटन को अधिक न्यायसंगत और पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी।