TMC Rebellion: बर्बाद हो गईं ममता दीदी! बागी गुट को स्पीकर ने दी मान्यता, ऋतब्रत बनर्जी होंगे विपक्ष के नेता
TMC Rebellion: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े उलटफेर के दावे के बीच टीएमसी में बगावत, बागी विधायकों को मान्यता, ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति और दलबदल कानून से जुड़े घटनाक्रम पर विस्तृत रिपोर्ट।
TMC Rebellion (Image Credit-Social Media)
TMC Rebellion: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बहुत बडा़ उलटफेर हो गया। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी हालिया विधानसभा चुनाव हार गई थीं और उनकी पार्टी से 80 नेता चुनाव जीतकर विधायक बने थे। लेकिन 3 जून, बुधवार को तेजी से बदले घटनाक्रम ने ममता के पैरो के नीचे से जमीन खिसका दी है। अब न उनके पास पार्टी बची है और न ही पार्टी का चुनाव चिन्ह। यानी ममता दीदी अब सियासी मैदान में पूरी तरह से बर्बाद हो गई हैं।
बागी गुट के टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष को 60 विधायकों के दस्तक वाला सर्मथन पत्र सौंपा। इसके कुछ ही घंटे बाद राज्य के विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट को ही असली टीएमसी के रूप में मान्यता दे दी। इसी बीच बागी गुट के नेताओं ने आपस में मिलकर ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया यानी अब प्रतिपक्ष के नेता होंगे।
संविधान के इस नियम से नहीं लागू होगा दलबदल कानून
संविधान के 52वें संशोधन में 1985 में सरकार ने दलबदल कानून व नियमों संबंधी 10वीं अनुसूची जोडी़ थी। इस अनुसूची के अनुसार किसी पार्टी के दो तिहाई नेता यदि पार्टी छोड़ते हैं तो उनपर दल बदल विरोधी कानून नहीं लागू होगा। यही कारण है कि टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं और बागी गुट में 60 विधायकांे ने सरकार को अपना समर्थन देने का ऐलान किया। यही कारण है इन नेताओं पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा। यही नेता ही अब असली टीएमसी के कर्णधार माने जाएंगे।
आशंका में ममता ने भंग की थी सभी समितियां
घटना से पहले दोपहर को ममता बनर्जी ने स्थितियों को भांग कर पार्टी की सभी 16 इकाइयां भंग कर दी और नए शिरे से पार्टी को खडा़ करने का ऐलान किया था, लेकिन अब जो हुआ है उनके हाथ से पार्टी भी खिसक गई है।
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे गुट ने भी शिवसेना के साथ ऐसा ही करके मुख्यमंत्री बन गए थे। 2022 में शिंदे 37 विधायकों के साथ भाजपा को समर्थन दिया था। दलबदल कानून के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था जहां अदालत ने 2024 को मामले पर निर्णय लेने का अधिकार स्पीकर को बताया था। इस प्रकार शिवसेना का चिन्ह व मान्यता शिंदे गुट को ही मिली थी।