रुको, लाखों का पैकेज और रिवर्स गेयर, जरा ठहरकर सोचो
May Day Special: मजदूर की अस्मत लुट रही है, और हम रस्मों के चिराग जला रहे हैं, नई उमर के नौजवानों जरा जाग जाओ
May Day News (Social Media).jpg
May Day News: मई की शुरुआत दुनिया भर में 'मजदूर दिवस' के रूप में होती है, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए यह केवल एक सरकारी छुट्टी या औपचारिक बधाई का दिन बनकर रह गया है। हकीकत के पन्नों को पलटें तो आज से ठीक 140 साल पहले, 1886 का मई माह हजारों घरों में अंधेरा कर गया था। शिकागो का हेमार्केट चौक केवल एक स्थान नहीं, बल्कि उस मानवीय गरिमा की लड़ाई का गवाह है, जहाँ मजदूरों ने 'आठ घंटे काम, आठ घंटे मनोरंजन और आठ घंटे आराम' की मांग के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
आज का दौर, जिसे हम 'विकसित' और 'तकनीकी युग' कहते हैं, क्या वाकई उस शहादत के मूल्यों को सुरक्षित रख पाया है? या हम वापस उसी अंधेरे युग की ओर 'रिवर्स गियर' में बढ़ रहे हैं?
1. इतिहास का खूनी पन्ना और आज की रस्में
आज से ठीक 140 साल पहले, 1886 का मई माह हजारों घरों में अंधेरा कर गया था। शिकागो का हेमार्केट चौक गवाह है उस शहादत का, जहाँ मजदूरों ने 'आठ घंटे काम, आठ घंटे मनोरंजन और आठ घंटे आराम' के लिए फांसी के फंदे चूमे थे। आज 1 मई को हम रस्मों के चिराग तो जला रहे हैं, लेकिन क्या हमें पता है कि हम किस शहादत का अपमान कर रहे हैं?
अल्बर्ट पार्सन्स और अगस्त स्पाइस जैसे नेताओं को बिना सबूत फांसी दी गई थी। फांसी से पहले स्पाइस ने कहा था—"एक समय आएगा जब हमारी खामोशी उन आवाजों से ज्यादा ताकतवर होगी जिन्हें तुम आज दबा रहे हो।" आज वह खामोशी तो है, पर वह ताकत वाली नहीं, बल्कि मजबूरी वाली खामोशी है।
2. 'रिवर्स गियर' का अर्थशास्त्र: 1948 बनाम 2026
हम फॉरवर्ड गियर में नहीं, बल्कि रिवर्स गियर में हैं। प्राचीन भारतीय मुद्रा प्रणाली में पाई, धेला और दमड़ी जैसी इकाइयां गरीब की क्रय शक्ति बचाती थीं।
सच्चाई का आईना: मेरे पिताजी 1948 में ₹200 पाते थे, जो उस दौर के कई बड़े अफसरों से अधिक था। उसकी क्रय शक्ति इतनी थी कि पूरा परिवार राजसी ठाठ से रहता था।
धोखा: आज लाखों का पैकेज पाने वाला युवा भी क्रय शक्ति के मामले में उस दौर के ₹200 वाले कर्मचारी के सामने निर्धन है। हम 'वेतन वृद्धि' के भ्रम में जी रहे हैं, जबकि असलियत में हमारी आर्थिक हैसियत घट रही है।
3. नई उमर के नौजवानों: सुनहरी बेड़ियाँ और गायब रीढ़
यह संदेश विशेषकर उन युवाओं के लिए है जो इंजीनियरिंग, एमबीए और लॉ की डिग्रियां लेकर कॉर्पोरेट की चकाचौंध में खो गए हैं।
शोषण का नया चेहरा: 10-20 हजार की नौकरी हो या लाखों का सीटीसी (CTC), सबका 'टारगेट' और 'डेडलाइन' एक ही है—आपकी जिंदगी के 12 से 15 घंटे।
रीढ़ की हड्डी का निष्कर्षण: पैकेज का लोभ आपको यह सोचने ही नहीं देता कि आप तीन शिफ्ट का काम एक शिफ्ट के दाम में कर रहे हैं। उम्र ढलने तक जब जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, तब तक व्यवस्था आपकी 'रीढ़ की हड्डी' (विरोध की शक्ति) निकाल चुकी होती है। आप बोलना चाहते हैं, पर परिवार की भूख आपकी जुबान खींच लेती है।
4. पत्रकारिता और गायब होता लाल झंडा
मजदूरों की आवाज उठाने वाला पत्रकार आज खुद सबसे लाचार 'दिहाड़ी मजदूर' है। वेतन आयोग बने, कोर्ट के फैसले आए, लेकिन मुनाफाखोर मालिकों ने उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया। सरकारों के पास इच्छाशक्ति नहीं है और 'क्रांति' के स्वयंभू ठेकेदार अब पूंजीवाद की गोद में बैठकर लाल झंडे को फलक से गायब कर चुके हैं।
5. एक नई तारीख का इंतजार
पूंजीवाद के अजगर ने बोलने की ताकत निगल ली है। फैक्ट्रियों से मई दिवस की खबरें गायब हैं और इसे केवल रस्मों तक सीमित कर दिया गया है। 'सावन के अंधे' बने हुक्मरान सब कुछ हरा-भरा दिखा रहे हैं, लेकिन हकीकत में मजदूर की अस्मत रोज लुट रही है।
नई उमर के नौजवानों, जाग जाओ! अगर आज इस 'रिवर्स गियर' और 'सुनहरे पिंजरे' के खिलाफ आवाज नहीं उठाई, तो भविष्य में फिर कोई जलियांवाला बाग या हेमार्केट जैसा नरसंहार होगा, तभी इतिहास में एक नई तारीख दर्ज होगी जो आने वाली पीढ़ी को रास्ता दिखाएगी।
"खामोशी जब हद से गुजरती है, तो वह तूफान का संकेत होती है।"
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये लेखक के निजी विचार हैं)