RSS Ka Itihas in Hindi: शाखा से साधना तक, संघ की प्राणवायु का इतिहास
RSS History in Hindi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh History Wikipedia) की कथा केवल एक संगठन की स्थापना की कथा नहीं है, बल्कि उस विचार-प्रवाह की कहानी है
RSS Ka Itihas Founder Baliram Hedgewar Ki Kahani
RSS Ka Itihas in Hindi: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh History Wikipedia) की कथा केवल एक संगठन की स्थापना की कथा नहीं है, बल्कि उस विचार-प्रवाह की कहानी है जिसने व्यक्ति-निर्माण, अनुशासन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र-समर्पण को अपनी कार्यपद्धति का आधार बनाया। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने परतंत्र भारत की अपमानजनक स्थिति को बहुत निकट से देखा था। बचपन से ही उनके मन में स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा जाग चुकी थी। उनका जन्म नागपुर के एक मराठी परिवार में 1 अप्रैल 1889 को हुआ। 1902 की प्लेग-महामारी में वे बाल्यावस्था में ही माता-पिता से वंचित हो गए। बाद में परिवार के परिचितों और संबंधियों ने उनकी शिक्षा-दीक्षा में सहयोग किया। उन्होंने नागपुर, यवतमाल और पुणे में शिक्षा पाई। स्कूली जीवन से ही उनमें राष्ट्रीय भावना और स्वदेशी विचारों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता था। ‘वंदे मातरम्’ जैसे राष्ट्रीय उद्घोषों के कारण उन्हें कई बार शैक्षणिक कठिनाइयों और दंड का सामना भी करना पड़ा। कॉलेज जीवन में वे लोकमान्य तिलक के स्वराज्य आंदोलन से प्रभावित हुए। 1908 के बंग-भंग आंदोलन और उसके विरोध ने उनके भीतर क्रांतिकारी चेतना को और धार दी। कोलकाता जाकर उन्होंने नेशनल मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा शिक्षा प्राप्त की, पर उनका मन केवल चिकित्सा में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संगठन और अनुशासित समाज-निर्माण में अधिक रमा रहा।
युवा अवस्था में डॉ. हेडगेवार (Dr Keshavrao Baliram Hedgewar) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, हिंदू समाज-सुधार और राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलनों से गहरे प्रभावित रहे। विनायक दामोदर सावरकर और अन्य समकालीन राष्ट्रीय विचारकों के विचारों का प्रभाव उन पर माना जाता है। डॉ. बी. एस. मुंजे जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी उन्हें मार्गदर्शन दिया। हेडगेवार का लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था। वे मानते थे कि यदि समाज भीतर से संगठित, अनुशासित और जाग्रत नहीं होगा तो राजनीतिक स्वतंत्रता भी टिकाऊ नहीं हो पाएगी। इसी विचार ने आगे चलकर 27 सितंबर 1925 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का रूप लिया।
संघ को उन्होंने किसी धार्मिक-राजनीतिक संस्था की तरह नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक स्वयंसेवक संगठन के रूप में रखा। इसका उद्देश्य हिंदू समाज में अनुशासन, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक एकता और आत्मबल जगाना था। प्रारंभिक व्यवस्था में नियमित शाखा, दंड-व्यायाम, सामूहिक प्रार्थना, प्रशिक्षण, शिविर और सामाजिक कार्य को केंद्र में रखा गया। ब्रिटिश काल के सांप्रदायिक तनाव, राष्ट्रीय असुरक्षा और राजनीतिक विखंडन की पृष्ठभूमि में यह प्रयोग धीरे-धीरे एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में विकसित हुआ।
संघ की स्थापना के बाद संगठन के नाम को लेकर भी गंभीर विचार हुआ। डॉ. हेडगेवार ने 17 अप्रैल 1926 को अपने घर पर एक बैठक बुलाई। इसमें छब्बीस स्वयंसेवक शामिल हुए। सभी से पूछा गया कि संगठन का कोई निश्चित नाम होना चाहिए। विचार-विमर्श के बाद तीन नाम प्रमुख रूप से सामने आए—पहला, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ; दूसरा, ज़री पटका मंडल; और तीसरा, भारतोद्धार मंडल। राय लेने पर बीस लोगों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का समर्थन किया।
ज़री पटका मंडल केवल पाँच लोगों की पसंद था, जबकि भारतोद्धार मंडल को लेकर कोई विशेष राय नहीं बनी। ज़री पटका मंडल का संबंध पेशवाई परंपरा से जोड़ा गया था और यह नाम प्रथम वर्ष के एक छात्र ने सुझाया था। इसके अतिरिक्त शिवाजी संघ, महाराष्ट्र सेवक संघ और हिंदू स्वयंसेवक संघ जैसे नामों पर भी चर्चा हुई थी। अंततः जिस नाम में राष्ट्र, स्वयंसेवा और संगठन—तीनों का सार समाहित था, वही नाम स्थायी हुआ—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।
संघ की नियमित शाखाओं में प्रारंभ से ही मातृभूमि को नमन करने वाली प्रार्थना का विशेष स्थान रहा। यह प्रार्थना डॉ. हेडगेवार ने अपने साथियों के साथ मिलकर तैयार की थी। उस समय नागपुर में मराठी के साथ हिंदी का भी बोलचाल में मिश्रण था, इसलिए प्रारंभिक प्रार्थना मूल रूप से मराठी में थी, पर उसमें हिंदी के कुछ शब्द भी शामिल थे। 1939 तक यह प्रार्थना संघ के कार्यक्रमों में गाई जाती रही। छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मोहर संस्कृत में थी। इसी सांस्कृतिक संकेत को ध्यान में रखते हुए 1939 में यह विचार सामने आया कि संघ की प्रार्थना संस्कृत में होनी चाहिए।
मराठी प्रार्थना को संस्कृत में रूपांतरित करने का निर्णय फ़रवरी 1939 में नागपुर से लगभग पचास किलोमीटर दूर सिंदी में नाना साहेब तलातुले के आवास पर हुई बैठक में लिया गया। इस बैठक में सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार उपस्थित थे। भविष्य के सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर और बालासाहेब देवरस भी वहाँ थे। अप्पाजी जोशी, विट्ठल राव पटकी, तात्या राव तैलंग, बाबूराव सोलडक और कृष्ण राव मोहरिले भी इस विचार-विमर्श में शामिल थे। मराठी प्रार्थना को संस्कृत में ढालने का कार्य मोहिते का बाड़ा शाखा के कार्यवाह और संस्कृत विद्वान नरहरि नारायण राव भिंडे को सौंपा गया। उनके प्रयास से नई प्रार्थना गढ़ी गई—“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे…”। इस प्रार्थना को सबसे पहले पुणे शिविर में डॉ. हेडगेवार और गुरु गोलवलकर जी के सामने संघ प्रचारक अनंत राव काले ने गाया। उल्लेखनीय है कि संघ के इसी शिविर में डॉ. भीमराव अंबेडकर भी आए थे।
संघ की मूल प्रार्थना में मातृभूमि, आर्यभूमि और धर्मभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव था—“नमो मातृभूमि जिथे जन्मलो मी, नमो आर्यभूमि जिथे वाढलो मी, नमो धर्मभूमि जियेच्याच कामी, पडो देह माझा सदा ती नमी मी।” इसका हिंदी पद भी संघ की प्रारंभिक साधना-परंपरा का हिस्सा था—“हे गुरु श्री रामदूता, शील हमको दीजिए; शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए; लीजिए हमको शरण में, रामपंथी हम बनें; ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक, वीर व्रतधारी बनें।” प्रार्थना के अंत में छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास का जयघोष लगाया जाता था—“राष्ट्रगुरु श्री समर्थ रामदास स्वामी जी की जय।” इससे स्पष्ट होता है कि संघ की प्रारंभिक सांस्कृतिक चेतना में मातृभूमि, अनुशासन, धर्मरक्षा, चरित्र-निर्माण और शिवाजी-समर्थ रामदास की परंपरा का गहरा प्रभाव था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारंभिक ढाँचे में एक समय “सर सेनापति” का पद भी था। यह पद लगभग चौदह वर्ष तक संघ में रहा। नवंबर 1929 में जब सरसंघचालक का पद बना, उसी समय सरकार्यवाह और सर सेनापति जैसे पद भी बने। सर सेनापति के पद पर मार्तंड राव जोग चुने गए। वे संघ के पहले और अंतिम सर सेनापति रहे। यह पद मूल रूप से छत्रपति शिवाजी द्वारा अपनी मराठा सेना के सर्वोच्च अधिकारी के लिए सृजित किया गया था। संघ में पथ-संचलन की शुरुआत भी मार्तंड राव जोग ने ही की थी। जोग 1920 में सेना से सेवानिवृत्त हुए थे और 1926 में कांग्रेस सेवा दल से जुड़े। बाद में संघ की संरचना में सैन्य प्रशिक्षण के स्थान पर सांस्कृतिक, अनुशासनात्मक और सामाजिक प्रशिक्षण पर अधिक बल दिया गया। 28 अप्रैल 1943 को दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने सभी शाखाओं से सैन्य प्रशिक्षण समाप्त करा दिया। सर सेनापति का पद हटने के साथ संघ के गणवेश में भी परिवर्तन हुआ। पहले खाकी नेकर और खाकी कमीज़ गणवेश का हिस्सा थे। बाद में कमीज़ का रंग सफेद कर दिया गया।
संघ की प्रशासनिक संरचना का एक निर्णायक प्रसंग अक्टूबर 1929 से जुड़ा है। डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखने वाले नाना पालकर के अनुसार, उस महीने नागपुर में संघ की एक बड़ी सभा हुई। डॉ. हेडगेवार ने 19 अक्टूबर 1929 को सभी प्रांतीय संघचालकों को पत्र भेजकर 9-10 नवंबर को बैठक के लिए नागपुर आने को कहा। जब स्वयंसेवक एकत्र हुए तो यह अनुभव हुआ कि अब संगठन को एक प्रशासनिक व्यवस्था और उसके नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट मुखिया चाहिए। अप्पाजी जोशी इस बात से चिंतित थे कि डॉ. हेडगेवार स्वयं कोई पद लेने को तैयार नहीं हैं। विश्वनाथ राव केलकर, बालाजी दुद्दार, अप्पाजी जोशी, कृष्ण राव मोहरिर, तात्याजी कालेकर, बाबूराव मुथाल, बाबासाहेब कोल्टे और मार्तंड राव जोग जैसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में इस विषय पर चर्चा हुई। हेडगेवार जी को इस चर्चा से दूर रखा गया। बाद में नागपुर के स्वयंसेवकों का संयुक्त कार्यक्रम मोहिते के बाड़ा में हुआ। डॉ. हेडगेवार भगवा ध्वज के पास खड़े थे और स्वयंसेवक प्रवेश द्वार के पास थे। अचानक वर्धा के संघचालक अप्पाजी जोशी ने तेज आवाज़ में कहा—“सरसंघचालक प्रणाम। एक, दो, तीन।” डॉ. हेडगेवार अवाक रह गए। इसके बाद अप्पाजी जोशी ने एक दिन पहले हुई बैठक के निर्णयों की जानकारी दी। इस तरह संगठन ने अपने संस्थापक को औपचारिक रूप से सरसंघचालक के रूप में स्वीकार किया।
हेडगेवार और संघ की चर्चा अप्पाजी जोशी के उल्लेख के बिना अधूरी रहती है। अप्पाजी से हेडगेवार की निकटता उस समय बनी जब स्त्री-वेश धारण करने वाले लड़कों के प्रशिक्षण की बात चली। हेडगेवार महिला-वेशधारी कलाकारों के माध्यम से क्रांतिकारियों तक सामग्री पहुँचाने के काम में लगे थे। इसी काल में दोनों के बीच गहरा संबंध बना। 1917 में प्रशिक्षित युवकों के साथ 1919 में हेडगेवार ने अप्पाजी को भी भेजा। लौटने पर उन्हें क्रांतिकारी अर्जुन सेठी की सेवा में लगाया गया। अर्जुन सेठी वर्धा जेल में कठोर यातना के कारण विक्षिप्त हो गए थे। अप्पाजी ने उन्हें तीन-चार वर्ष तक अपने घर पर रखा और स्वस्थ होने के बाद ही छोड़ा। अप्पाजी इस बात से चिंतित थे कि हेडगेवार कोई पद नहीं ले रहे हैं, जबकि संघ का कोई प्रमुख भी नहीं था। उन्होंने संघ के अन्य बड़े कार्यकर्ताओं से चर्चा की और फिर हेडगेवार जी को बताया कि हम सबने मिलकर आपको सरसंघचालक चुन लिया है। पहले हेडगेवार जी नाराज़ हुए, पर धीरे-धीरे उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया।
अप्पाजी जोशी को इसके लिए अपना पूरा जीवन संघकार्य की ओर मोड़ना पड़ा। वे 56 संस्थाओं के सदस्य थे। डॉ. हेडगेवार के कहने पर उन्होंने उन सभी संस्थाओं से त्यागपत्र भेजे और उनकी प्रतियाँ हेडगेवार जी के चरणों में रख दीं। एक प्रसंग वर्धा का है, जहाँ बाबा के वेश में रह रहे क्रांतिकारी गंगा प्रसाद पांडेय के घर रखी पिस्तौल हटाने डॉ. हेडगेवार पहुँचे। अप्पाजी भी उनके साथ थे। उन्हें यह पता नहीं था कि एक जासूस उनके पीछे लग चुका है। जैसे ही गंगा प्रसाद पांडेय ने पिस्तौल हेडगेवार जी को सौंपी, पुलिस का जासूस बीच में कूद पड़ा। हेडगेवार जी ने तत्काल पिस्तौल अप्पाजी को देकर उन्हें वहाँ से भगा दिया। उस पिस्तौल के एक लूटकांड में इस्तेमाल का संदेह था। बाद में इस प्रसंग को समाप्त करवाने की भूमिका भी अप्पाजी ने निभाई। जब डॉ. हेडगेवार ने जंगल सत्याग्रह के लिए सरसंघचालक का दायित्व डॉ. परांजपे को देने का विचार किया, तब अप्पाजी जोशी ने तय किया कि वे भी डॉक्टर साहब के साथ जेल जाएँगे—और वे जेल गए भी। हेडगेवार मन ही मन गुरु गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी पसंद कर चुके थे, पर वे किसी को आहत नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अप्पाजी से पूछा कि यदि गुरुजी को सरसंघचालक बना दिया जाए तो कैसा रहेगा। अप्पाजी ने उत्तर दिया—“आपने तो मेरे मन की बात कह दी, डॉक्टर जी।” 1940 में जब हेडगेवार उपचार के लिए बिहार के राजगीर जा रहे थे, वे अप्पाजी को भी साथ ले गए, पर उन्हें सरसंघचालक नहीं बनाया। इससे अप्पाजी के समर्थक नाराज़ हुए। तब अप्पाजी ने उन्हें समझाया—“मैं डॉक्टर जी का दाहिना हाथ था, यह सत्य है, पर गुरुजी तो डॉक्टर जी का हृदय हैं।” आगे चलकर अप्पाजी गुरुजी के भी दाहिने हाथ बने रहे।
डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व प्रेरक प्रसंगों से भरा था। एक बार एक अंग्रेज अफसर ने उनसे पूछा—“तुम्हारा धर्म क्या है?” हेडगेवार ने उत्तर दिया—“मेरा धर्म भारत माता की सेवा है।” उनकी सादगी ऐसी थी कि अपने घर में स्वयं झाड़ू लगाना या स्वयंसेवकों के साथ बैठकर साधारण भोजन करना उनके लिए सामान्य बात थी। यद्यपि संघ प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक आंदोलन से अलग रहा, पर डॉ. हेडगेवार स्वयं असहयोग आंदोलन 1920 और नागपुर ध्वज सत्याग्रह 1923 में जेल गए। उनकी सोच थी कि पहले राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण आवश्यक है, तभी राजनीतिक स्वतंत्रता स्थायी होगी। प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने नागपुर क्षेत्र में छोटे-छोटे शिविर आयोजित किए।
स्वयंसेवकों को कठोर अनुशासन, शारीरिक अभ्यास और मानसिक प्रशिक्षण दिया गया। कहा जाता है कि वे स्वयं भी अभ्यासों में अगली पंक्ति में रहते थे, जिससे स्वयंसेवकों में नेतृत्व और अनुशासन का भाव पैदा होता था। उन्होंने संगठन को धार्मिक प्रदर्शन की बजाय सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान का माध्यम बताया और समाज के विभिन्न तबकों में समरसता लाने की आकांक्षा रखी। 1940 में स्वास्थ्य बिगड़ने पर भी वे संगठन को व्यवस्थित और विस्तृत होते देखना चाहते थे। उन्होंने एम. एस. गोलवलकर को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया। उनके अंतिम संदेशों में संगठन के विस्तार और समाज की एकता का भाव प्रमुख था।
डॉ. हेडगेवार ने स्वयं बहुत व्यापक साहित्य नहीं छोड़ा। उनका वास्तविक साहित्य उनका संगठनात्मक प्रयोग, अनुशासन और कार्यपद्धति ही था। बाद के सरसंघचालकों, विशेषकर माधव सदाशिव गोलवलकर ने उनके आदर्शों को विचार और वैचारिक ग्रंथों के रूप में विस्तार दिया। हेडगेवार का मूल योगदान संगठन-निर्माण, नेतृत्व-प्रशिक्षण और व्यवहारिक अनुशासन में निहित माना जाता है। 21 जून 1940 को नागपुर में उनका निधन हुआ। उनके बाद संघ ने राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र विस्तार लिया। उनकी स्मृति आज संघ के संस्थागत स्मृतिचिह्नों, स्मृति मंदिर, जन्मतिथि आयोजनों और जीवनी-प्रकाशनों में संरक्षित है। आधुनिक समय में उनके योगदान की व्याख्या अलग-अलग दृष्टियों से की जाती है। कुछ उन्हें देशभक्ति, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पुरुष मानते हैं, जबकि कुछ आलोचनात्मक दृष्टि से भी देखते हैं। फिर भी आधुनिक भारत के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास में उनकी भूमिका एक प्रभावशाली संस्थापक के रूप में दर्ज है।
संघ की परंपरा में कुछ पर्वों का विशेष महत्व है। संघ छह प्रमुख पर्व मनाता है—चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, विजयादशमी, हिंदू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, मकर संक्रांति और रक्षा बंधन। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का जन्मदिन माना जाता है। उनका जन्म 1 अप्रैल 1889 को हुआ था और वर्ष प्रतिपदा से उसका विशेष संबंध माना गया। विजयादशमी से डॉ. हेडगेवार के जीवन का एक बड़ा विरोध-प्रदर्शन भी जुड़ा था, और 27 सितंबर 1925 को संघ की स्थापना भी दशहरे के दिन हुई। हिंदू साम्राज्य दिवस का संबंध विक्रम संवत 1731 की ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से है, जब छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। गुरु पूर्णिमा संघ की गुरु-दक्षिणा परंपरा से जुड़ी है। नाना पालकर ने गुप्त धन लेने की परंपरा का श्रेय डॉक्टर जी को दिया है। पहले गुरु-दक्षिणा उत्सव में 84 रुपये आए थे। संघ गुरु-दक्षिणा के धन से चलता रहा। एक अन्य पर्व उस दिन से जुड़ा है जब डॉक्टर जी को आद्य सरसंघचालक घोषित किया गया था। इस दिन आद्य सरसंघचालक प्रणाम कहा जाता है।
संघ की स्मृति-परंपरा में अनेक कार्यकर्ताओं और प्रचारकों का उल्लेख आवश्यक है। नाना पालकर ने डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखी। विश्वनाथ राव केलकर, बालाजी दुद्दार, अप्पाजी जोशी, कृष्ण राव मोहरिर, तात्याजी कालिकर, बाबूराव मुचाल, बाबासाहेब कोल्टे और मार्तंड राव जोग जैसे नाम संघ की प्रारंभिक यात्रा में महत्वपूर्ण रहे।
बालासाहेब देवरस ने पहले और दूसरे सरसंघचालक के चित्रों को भारत माता के चित्र के साथ लगाने का निर्देश दिया था। डॉ. हेडगेवार की समाधि-स्मृति मंदिर की डिजाइन मुंबई के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट गोविंद वासुदेव दीक्षित ने तैयार की थी। वर्धा के रहने वाले पांडुरंग नागपुर कार्यालय के प्रभारी थे। उनकी जान नागपुर कार्यालय में ही बसती थी। रेशमी बाग में पांडुरंग की स्मृति में पांडुरंग भवन बनाया गया।
संघ के विस्तार में प्रांतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 1949 में बाबूराव पालधिकर को उड़ीसा का पहला प्रांत प्रचारक बनाकर भेजा गया। 1936 में उड़ीसा अलग राज्य बना था। अनंत लाल श्रीवास्तव ने पश्चिम उड़ीसा के संबलपुर में, पूर्णानंद स्वामी ने दक्षिण उड़ीसा के गंजाम में, और डॉ. बी. एस. मुंजे के भतीजे मुकुंद राव मुंजे मध्य प्रदेश के बिलासपुर से कटक में शाखा शुरू करने आए। 1942/1949 के आसपास प्रतिबंध हटने के बाद संघ ने उड़ीसा को एक राज्य के रूप में प्रांत घोषित किया। प्रतिबंध हटने के बाद कांग्रेस नेता नीलकंठ दास ने संघ की मदद की। नीलकंठ दास को अक्टूबर 1950 में नागपुर में आयोजित प्रतिष्ठित विजयादशमी उत्सव की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। जब नीलकंठ जी नागपुर आए तो गुरु गोलवलकर स्वयं स्टेशन पर अपने अतिथि को लेने पहुँचे। बाबूराव को मराठी, संस्कृत और अंग्रेज़ी आती थी। बाद में उन्होंने हिंदी, उर्दू और पंजाबी भी सीखी।
संघ के पूर्वोत्तर विस्तार में भी अनेक कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। हॉकी खिलाड़ी ठाकुर राम सिंह ने कामाख्या राव बरुआ के साथ असम में संघ को खड़ा किया। वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य असम में 1977-78 में शुरू हुआ और इसकी जिम्मेदारी वसंतराव भट्ट को मिली। कृष्ण राव सप्रे को पूर्वोत्तर का भगीरथ कहा जाता था। श्यामल सेन गुप्ता, दिनेंद्र नाथ डे, सुधामय दत्ता, शुभंकर चतुर्वेदी, मधु लिमये, सतीश और सुनील त्रिवेदी, अतुल जोग, गजानन बापट और डॉ. रामगोपाल गुप्त जैसे नाम भी संघ के विभिन्न क्षेत्रों के प्रसार और कार्य-विस्तार में उल्लेखनीय रहे।
संघ और उससे जुड़े कुछ निजी प्रसंग भी उसके संगठनात्मक चरित्र को समझने में मदद करते हैं। बाबूराव चौथाई वाले विस्तारक रहे। जीवन भर प्रचारक न होते हुए भी वे सीधे सरसंघचालक से जुड़े रहे। उन्हें सरसंघचालकों का पत्रलेखक कहा जाता था। 1975 में प्रतिबंध लगते ही उन्होंने गुरु गोलवलकर के निजी सामान—पत्र, कमंडल आदि—को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की। गुरु गोलवलकर बाबूराव के घर को अपना घर समझते थे। जब उन्हें कोई विशेष चीज खाने की इच्छा होती तो बाबूराव के घर पर बनवा लेते। बाबूराव ने गुरु गोलवलकर के लगभग 11,000 पत्रों की प्रतिलिपि से “पत्ररूप श्री गुरुजी” ग्रंथ बनाया। गुरु गोलवलकर पत्रों का उत्तर स्वयं लिखते थे, जबकि तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस पत्र का उत्तर बाबूराव को बता देते और बाबूराव उसे लिखते थे।
गोलवलकर जी बालासाहेब का कितना सम्मान करते थे, इसका उल्लेख उनके निजी सचिव बाबूराव चौथाई वाले ने एक घटना में किया है। गोलवलकर जी अस्वस्थ थे। उनके देहावसान से पंद्रह दिन पहले बालासाहेब फूड प्वाइजनिंग के कारण बेहोश होकर गिर पड़े। जब गुरु गोलवलकर के देहावसान के बाद बालासाहेब को पता चला कि अंतिम पत्र में गुरुजी ने सरसंघचालक के लिए उनका नाम लिखा है, तो उनका पहला सवाल था—“हमारे स्वास्थ्य के बारे में गुरुजी को जानकारी थी?” यह पत्र बालासाहेब भिड़े ने पढ़ा था।
इस तरह की कहानियाँ बाबूराव जैसे निकटस्थ कार्यकर्ताओं के कारण ही सामने आईं। डॉ. आबाजी थत्ते की बीमारी के दौरान बाबूराव चौथाई वाले ने कुछ समय गुरु गोलवलकर जी के साथ प्रवास किया। बाद में उन्होंने “मेरे देखे हुए श्री बालासाहेब देवरस” नामक पुस्तक लिखी।
चमन लाल का उल्लेख भी संघ की कथा में महत्वपूर्ण है। अगस्त 2021 में वेंकैया नायडू ने उन पर एक डाक टिकट जारी किया। अश्विनी वैष्णव के अनुसार मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने अपने बेटे के विवाह में चमन लाल को पोर्ट लुई बुलवाया था। कश्मीर आंदोलन के समय गुरु गोलवलकर ने चमन लाल के हाथ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र भेजकर सावधान किया था। यह प्रसंग संघ और तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति के बीच संवाद की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसी संदर्भ में सावरकर के छोटे भाई की मॉब लिंचिंग में मृत्यु का उल्लेख भी आता है।
वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत का संघ-संसार भी पुराने कार्यकर्ताओं की परंपरा से जुड़ा है। वे 1994 से 1999 तक बिहार के क्षेत्र प्रचारक रहे। इस दौरान उन्होंने बिहार और झारखंड के सुदूर क्षेत्रों की यात्रा सरकारी बसों और स्वयंसेवकों की मोटरसाइकिलों पर बैठकर की। उनके दादा श्री नारायण पांडुरंग, जिन्हें नाना साहेब कहा जाता था, डॉ. हेडगेवार के साथ थे। नाना साहेब कांग्रेस से भी जुड़े रहे और उन्होंने इलाहाबाद से एलएलबी किया। चंद्रपुर में वे संघ कार्य के खेवनहार बने। मोहन भागवत के पिता मधुकर राव भागवत ने लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी को प्रशिक्षित किया। गुजरात में संघ को खड़ा करने का श्रेय मधुकर राव जी को दिया जाता है। नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक “ज्योति पुंज” में मधुकर राव के बारे में विस्तार से लिखा है।
बालासाहेब देवरस का पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था। बालासाहेब और उनके भाई भाऊराव देवरस एक समय निष्क्रिय हो गए थे, पर गुरुजी के आग्रह पर वे वापस आए। आगे चलकर बालासाहेब देवरस ने संघ को सामाजिक संवाद, सेवा और विस्तार की दिशा में नए चरण में पहुँचाया। लेकिन उससे पहले संघ की सबसे निर्णायक वैचारिक यात्रा माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ के नेतृत्व में आकार ले चुकी थी।
माधव सदाशिव गोलवलकर का जन्म 19 फरवरी 1906 को नागपुर के निकट रामटेक में हुआ। उनके अनुयायी उन्हें ‘गुरुजी’ कहते हैं। वे संघ की वैचारिक नींव को मजबूत करने वाले प्रमुख व्यक्तित्व माने जाते हैं। वे मराठी करहाड़े ब्राह्मण परिवार से थे। उनकी माता लक्ष्मीबाई गोलवलकर धार्मिक और सादगीपूर्ण महिला थीं। परिवार में कुल छह भाई-बहन थे। माधवजी बचपन से अध्ययनशील, मृदुभाषी और गंभीर स्वभाव के माने जाते थे। उनके पिता सदाशिवराव शिक्षक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि से जुड़े थे। उन्होंने फर्ग्युसन कॉलेज, पुणे में पढ़ाई की और बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.एससी. और एम.एससी. की शिक्षा प्राप्त की। कुछ स्रोतों में उनके कानून अध्ययन का भी उल्लेख मिलता है। BHU में वे महामना मदन मोहन मालवीय के संपर्क में आए, जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। अध्ययन काल में उनका झुकाव विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म तीनों की ओर था। वे अपने अध्यापकों के प्रिय विद्यार्थी थे और गहरे विश्लेषण की क्षमता के लिए जाने जाते थे। कुछ समय तक उन्होंने BHU में अध्यापन भी किया और फिर नागपुर लौट आए। उनकी शिक्षा ने उन्हें वैचारिक लेखन, संवाद और शास्त्रार्थ की शक्ति दी।
गोलवलकर जी 1930 के दशक में डॉ. हेडगेवार के निकट आए। संघ के भीतर उन्हें मुख्यतः शिक्षा और प्रशिक्षण से जुड़े दायित्व दिए गए। 1937 से 1939 के बीच उन्होंने अखिल भारतीय अधिकारी प्रशिक्षण शिविर का आयोजन सफलतापूर्वक संभाला। इससे हेडगेवार ने उन्हें आगे के नेतृत्व के लिए तैयार किया। डॉ. हेडगेवार ने उन्हें “गोलवलकर गुरुजी” कहकर संबोधित करना शुरू किया, जो आगे चलकर “श्रीगुरुजी” के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 1937 में उन्हें अखंड प्रचारक के रूप में नियुक्त किया गया, अर्थात उनका जीवन पूर्ण रूप से संघकार्य के लिए समर्पित हो गया। डॉ. हेडगेवार ने पहले उन्हें नागपुर की जिम्मेदारी दी, फिर संघ शिक्षा वर्ग का सर्वाधिकारी बनाया, फिर एक महीने के लिए बंगाल भेजा। हेडगेवार को लगता था कि ऐसे व्यक्ति को दूसरे सरसंघचालक के रूप में तैयार किया जाना चाहिए। इसलिए उन्हें सरकार्यवाह बनाकर नागपुर केंद्र में रखा गया।
21 जून 1940 को डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद माधव सदाशिव गोलवलकर सरसंघचालक बने। वे 1973 तक इस पद पर रहे। उनके नेतृत्वकाल ने संघ की विचारधारा, संगठन-विस्तार और बाहरी प्रभाव—तीनों को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। जब 1940 में हेडगेवार का देहांत हुआ, तब संघ का भविष्य अनेक लोगों को अनिश्चित दिखाई देता था। पर उसी समय एक शांत, मनीषी और गहरे वैचारिक व्यक्तित्व ने संगठन को संभाला। गुरुजी ने विचार को संगठन और दर्शन को व्यवहार में बदलने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में संघ ने स्वयं को केवल शाखा-आधारित संगठन नहीं, बल्कि एक जीवंत राष्ट्रीय चेतना के रूप में परिभाषित किया। उनके शब्दों में—“हमारा कार्य व्यक्ति-निर्माण है। व्यक्ति बनेगा तो राष्ट्र स्वयं उठ खड़ा होगा।”
गुरुजी ने संघ की शाखाओं को पूरे देश में फैलाने का काम तेज किया। 1940 में जहाँ लगभग 500 शाखाएँ बताई जाती हैं, वहीं 1947 तक यह संख्या 5000 से अधिक पहुँचने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने संघ को केवल सांस्कृतिक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का साधन बताया। उनके भाषणों में “एक देश, एक समाज, एक संस्कृति” की भावना बार-बार प्रकट होती थी। शाखाओं की संख्या, प्रांतीय समन्वय और प्रचारक-प्रणाली में उनके नेतृत्व में बड़ी वृद्धि हुई। संघ के कई सामाजिक-शैक्षिक कदम इसी दौर में व्यवस्थित हुए। गुरुजी ने संघ को विचार-केंद्रित संगठन बनाया। उनका लेखन और भाषण संघ के वैचारिक आधार को परिभाषित करते रहे। वे संगठन के अनुशासन, आचार-नीति और भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि पर बल देते थे।
गुरुजी से जुड़ा “We, or Our Nationhood Defined” 1939-40 के आसपास का सबसे चर्चित और विवादास्पद ग्रंथ माना जाता है। इसे गुरुजी के नाम से प्रकाशित किया गया। इस ग्रंथ के कुछ अंशों को आलोचकों ने सांप्रदायिक टिप्पणी माना, विशेषकर उन अंशों को जहाँ मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को आंतरिक खतरे के रूप में देखा गया। इस पर अनेक विद्वानों और सामाजिक विचारकों ने आपत्ति की। समर्थकों का कहना रहा कि गुरुजी की चिंताएँ राष्ट्र-एकता की रक्षा के संदर्भ में थीं और उस समय की परिस्थितियों को समझे बिना निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह गोस्वामी गोपालकांत या वी. डी. सावरकर के विचारों से प्रेरित या संपादित रूप था। स्वयं गोलवलकर ने कभी इसे संक्षेप या अनुवाद बताया, पर बाद के तुलनात्मक अध्ययनों में यह संकेत भी मिला कि यह स्वतंत्र वैचारिक रचना थी। ग्रंथ में राष्ट्र-परिभाषा, संस्कृति-केंद्रित दृष्टि और आंतरिक खतरे पर कठोर टिप्पणियाँ मिलती हैं। इसी कारण गुरुजी को समझने के लिए उनके अपने ग्रंथों, संघ-अभिलेखों और आलोचनात्मक अध्ययनों—तीनों का संतुलित अध्ययन आवश्यक माना जाता है।
देश के विभाजन और सांप्रदायिक दंगों के समय गुरुजी ने स्वयंसेवकों को राहत, पुनर्वास और शरणार्थी सहायता कार्यों में लगाया। उन्होंने स्वयं दिल्ली, पंजाब और बंगाल के राहत शिविरों का दौरा किया। कराची में बमकांड में फँसे स्वयंसेवकों की सुरक्षित रिहाई हो या विभाजन के समय पीड़ितों से मिलने के लिए जान जोखिम में डालकर जाना—इन अनेक प्रसंगों में उनके निकट सहयोगी वासुदेव केशव थत्ते, जिन्हें आबाजी थत्ते कहा जाता था, उनके साथ उपस्थित रहे। आबाजी थत्ते को गुरुजी की परछाईं कहा जाता था। उन्होंने गुरुजी के साथ देश भर में प्रवास किया। उन्हें गुरुजी से जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएँ ज्ञात थीं, पर उन्होंने न तो उन्हें सार्वजनिक रूप से बताया, न लिखा, जबकि वे डायरी लिखा करते थे। एक बार किसी ने उनसे कहा कि आपके पास गुरुजी के साथ रहने का सबसे अधिक अनुभव है, आप पुस्तकें क्यों नहीं लिखते। उन्होंने उत्तर दिया—“श्रीराम के साथ हनुमान लंबे समय तक रहे, लेकिन श्रीरामचरित वाल्मीकि जी ने लिखा, हनुमान जी ने नहीं।” पूछने वाला निरुत्तर हो गया।
गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा। गुरुजी ने स्पष्ट कहा कि संघ का गांधीजी की हत्या से कोई संबंध नहीं है और संघ का मार्ग राष्ट्र-निर्माण का है। 1949 में प्रतिबंध हटने के बाद संघ ने संविधान और सार्वजनिक गतिविधियों का औपचारिक स्वरूप अपनाया। सरकार का आरोप था कि संघ का घटना से कोई न कोई संबंध हो सकता है, जबकि संघ ने इस आरोप का खंडन किया। प्रतिबंध हटवाने के लिए वार्ता हुई और अंततः प्रतिबंध हटाया गया। इसके बाद 1949-50 में संघ ने अपने तंत्र को अधिक सार्वजनिक और संवैधानिक मानदंडों के अनुरूप व्यवस्थित किया। प्रतिबंध हटने के बाद गुरु गोलवलकर ने उड़ीसा पर भी विशेष ध्यान दिया और बाबूराव पालधिकर को पहला प्रांत प्रचारक नियुक्त किया।
1950 से 1970 के बीच गुरुजी ने लगभग हर राज्य में जाकर हजारों सभाएँ कीं। उनके उद्बोधनों में आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और भारतीय संस्कृति के गौरव का विशेष उल्लेख रहता था। “विचार दर्शन” जैसे हिंदी संकलनों में उनके 1940 से 1970 के बीच दिए गए प्रमुख उद्बोधनों का संग्रह मिलता है। उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सादा था। वे देशभर की यात्राओं में सामान्य स्वयंसेवकों के घर ठहरते, साधारण भोजन करते और मिलने वालों के नाम याद रखते। एक प्रसंग में शाखा में किसी युवा ने उन्हें पहचाना नहीं और कहा—“आप जमीन पर क्यों बैठे हैं, ऊपर बैठिए।” गुरुजी मुस्कराए और बोले—“संघ में ऊपर या नीचे कोई नहीं होता, सब स्वयंसेवक हैं।” गांधीजी के निधन के बाद जब देश में उथल-पुथल थी, उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि गांधीजी ने जिस एकता और अहिंसा का संदेश दिया, वही समाज-निर्माण की दिशा में प्रेरक होना चाहिए।
गोलवलकर जी के काल में संघ के लिए शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक क्षेत्रों में अनेक संबद्ध संस्थाएँ सक्रिय हुईं। संघ का प्रभाव गाँव-कस्बों से लेकर शहरों तक फैलने लगा। संघ स्वयं को राजनीतिक संगठन नहीं मानता रहा, पर गुरुजी के विचारों ने राजनीतिक-विचारधारात्मक आधार अवश्य दिया। बाद में संघ के निकट बने राजनीतिक संगठनों, जैसे जनसंघ और आगे चलकर भाजपा के वैचारिक पूर्ववर्ती ढाँचों पर इसका प्रभाव देखा गया। आधुनिक लेखों और आलोचनाओं में गुरुजी के राष्ट्र-केंद्रित और सांस्कृतिक विचारों की तुलना कभी-कभी यूरोप की फासीवादी या नाज़ी विचारधाराओं से भी की गई है, पर यह तुलना अत्यंत विवादित और बहस योग्य है। कई इतिहासकार इसे सटीक नहीं मानते, जबकि कुछ शोध विचार-समानताओं की चर्चा करते हैं। संघ समर्थक और आधिकारिक लेखन यह तर्क देते हैं कि गुरुजी का ध्यान राष्ट्र-एकता और सामाजिक समन्वय पर था, किसी हिंसक आदर्श पर नहीं। इसलिए इस विषय में निष्पक्ष समालोचना और प्राथमिक स्रोतों का अध्ययन दोनों आवश्यक हैं।
गुरुजी का निधन 5 जून 1973 को नागपुर में हुआ। उनके बाद बालासाहेब देवरस को नेतृत्व सौंपा गया। गुरुजी को संघ का वैचारिक निर्माता और संगठन-शक्ति बढ़ाने वाला नेता माना जाता है। उनके अनुयायी उन्हें आदर से ‘गुरुजी’ कहते हैं। आलोचक उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तीव्र प्रवक्ता के रूप में देखते हैं, विशेषकर “We, or Our Nationhood Defined” के कुछ अंशों के कारण। इसीलिए आधुनिक भारत के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास में उनका स्थान जटिल, बहुआयामी और बहसों से घिरा हुआ है। उन्हें समझने के लिए उनके स्वयं के ग्रंथों, संघ-अभिलेखों और इतिहासकारों की आलोचनात्मक समीक्षाओं का संतुलित अध्ययन आवश्यक है।
इस पूरी यात्रा में संघ की प्राणवायु केवल शाखा, गणवेश या संगठनात्मक पदों में नहीं, बल्कि उन कार्यकर्ताओं की मौन साधना में दिखाई देती है जिन्होंने स्वयं को पीछे रखकर संगठन को आगे बढ़ाया। कोई पत्र लिखता रहा, कोई गुरुजी की परछाईं बनकर चलता रहा, कोई प्रांतों में शाखा खड़ी करता रहा, कोई प्रतिबंध के दिनों में कागज, पत्र और स्मृतियाँ बचाता रहा, कोई साधारण भोजन और सामान्य गृहस्थी के बीच बड़े ऐतिहासिक प्रसंगों का वाहक बन गया। संघ की कथा ऐसे ही अनगिनत नामों, प्रसंगों और परंपराओं से बनी है—जहाँ डॉ. हेडगेवार का संगठन-बीज, गुरु गोलवलकर का वैचारिक विस्तार, बालासाहेब देवरस का सामाजिक संवाद, और अनेक स्वयंसेवकों का निःशब्द समर्पण मिलकर उस धारा को जन्म देते हैं जिसे संघ अपनी प्राणवायु मानता है।
(लेखक पत्रकार हैं।)