Tamil Nadu Farmers Loan: किसानों की बल्ले-बल्ले! तमिलनाडु में कर्ज माफ, राहत या नई राजनीतिक लड़ाई

Tamil Nadu Farmers Loan Waiver: तमिलनाडु की राजनीति में किसान कर्ज़माफी एक बार फिर सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है।

Update:2026-05-25 20:41 IST

Tamil Nadu CM Vijay Announce Farmers Loan Waiver

Tamil Nadu Farmers Loan Waiver: तमिलनाडु की राजनीति में किसान कर्ज़माफी एक बार फिर सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। अभिनेता से नेता बने और अब मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे सी. जोसेफ विजय ने चुनाव प्रचार के दौरान किसानों से जो वादे किए थे, वे अब राज्य की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सहकारी बैंकिंग व्यवस्था के केंद्र में आ गए हैं। चुनावी मंचों पर विजय लगातार कहते रहे कि तमिलनाडु का किसान कर्ज़ के बोझ तले दब चुका है और यदि उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam यानी TVK सत्ता में आई तो किसानों को राहत दी जाएगी। तंजावुर, त्रिची, कोयंबटूर और डेल्टा जिलों की सभाओं में उन्होंने विशेष रूप से सहकारी बैंकों से लिए गए कृषि ऋण का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा था कि पाँच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों का पूरा कृषि ऋण माफ किया जाएगा जबकि उससे अधिक भूमि वाले किसानों को भी बड़ी राहत दी जाएगी। चुनाव अभियान के दौरान यह घोषणा ग्रामीण तमिलनाडु में तेजी से चर्चा का विषय बन गई थी।

तमिलनाडु में कृषि राजनीति केवल खेती तक सीमित नहीं है। यहाँ सहकारी बैंक गांवों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। राज्य के हजारों Primary Agricultural Cooperative Credit Societies यानी PACS सीधे किसानों को फसल ऋण देते हैं। छोटे किसान, सीमांत किसान और डेयरी या पशुपालन से जुड़े परिवार सबसे अधिक इन्हीं संस्थाओं पर निर्भर रहते हैं। यही कारण है कि जब भी चुनाव आते हैं, सहकारी बैंकों के कृषि ऋण सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाते हैं। विजय ने इसी नब्ज़ को पकड़ा। उन्होंने अपने चुनावी भाषणों में कहा कि किसानों को साहूकारों और बैंकों के चक्र से बाहर निकालना जरूरी है। उनके भाषणों में अक्सर यह पंक्ति दोहराई जाती थी कि “किसान केवल वोट बैंक नहीं, तमिलनाडु की आत्मा हैं।”

तमिलनाडु में कृषि ऋण का आकार बहुत बड़ा है। उपलब्ध बैंकिंग और कृषि आंकड़ों के अनुसार राज्य में कुल बकाया कृषि ऋण लगभग साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये के आसपास माना जाता है। इसमें राष्ट्रीयकृत बैंक, निजी बैंक, ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक सभी शामिल हैं। लेकिन सहकारी बैंकों का हिस्सा राजनीतिक रूप से सबसे संवेदनशील माना जाता है क्योंकि इन ऋणों का बड़ा भाग छोटे किसानों के नाम पर होता है। राज्य में लगभग 80 लाख छोटे और सीमांत किसान परिवार बताए जाते हैं और उनमें से बहुत बड़ी संख्या सहकारी ढाँचे से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि विजय की कर्ज़माफी घोषणा को केवल आर्थिक राहत नहीं बल्कि ग्रामीण सत्ता समीकरण बदलने वाली रणनीति के रूप में देखा गया।

चुनाव जीतने के बाद किसानों की अपेक्षाएँ और बढ़ गईं। कावेरी डेल्टा के किसान संगठनों ने विजय को पत्र लिखकर याद दिलाया कि चुनाव के दौरान उन्होंने केवल कर्ज़माफी ही नहीं बल्कि धान और गन्ने के समर्थन मूल्य बढ़ाने का भी वादा किया था। कई किसान संगठनों ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में TVK को जो समर्थन मिला, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही वादा था कि सरकार किसानों को तत्काल राहत देगी। किसान संगठनों ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद विजय का पहला निर्णय कृषि राहत से जुड़ा होना चाहिए।

इसके बाद विजय सरकार ने अपनी पहली बड़ी कृषि राहत योजना की घोषणा की। मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि सहकारी बैंकों से लिए गए फसल ऋण में सीमांत किसानों का ₹50,000 तक का ऋण पूरी तरह माफ किया जाएगा। बड़े किसानों के लिए ₹5,000 की राहत राशि देने की भी घोषणा की गई। सरकार के अनुसार इस योजना से लगभग 14.22 लाख किसानों को सीधा लाभ मिलने की संभावना है और इस पर लगभग ₹2,044 करोड़ का सरकारी व्यय आएगा। यह घोषणा होते ही तमिलनाडु की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई।

हालांकि यह योजना चुनावी वादे के मुकाबले कुछ सीमित मानी जा रही है। चुनाव प्रचार में विजय ने पाँच एकड़ से कम भूमि वाले किसानों के लिए पूर्ण कर्ज़माफी और बड़े किसानों के लिए 50 प्रतिशत तक राहत की बात कही थी, लेकिन सरकार बनने के बाद जो प्रारंभिक योजना सामने आई, उसमें ₹50,000 की सीमा तय कर दी गई। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में इसे बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि तमिलनाडु में बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है जिनके छोटे फसल ऋण सहकारी समितियों में फंसे हुए हैं और वे लगातार ब्याज के दबाव में रहते हैं।

तमिलनाडु में पहले भी कृषि ऋण माफी राजनीतिक हथियार रही है। 2021 में AIADMK सरकार ने सहकारी बैंकों के लगभग ₹12,110 करोड़ के फसल ऋण माफ किए थे। उस योजना से करीब 16 लाख किसानों को लाभ मिला था। उस समय भी राज्य सरकार ने इसे किसानों को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की बड़ी पहल बताया था। अब विजय सरकार की नई योजना की तुलना उसी मॉडल से की जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार राहत राशि और पात्रता की शर्तें अलग हैं।

किसान संगठनों का एक वर्ग विजय सरकार के फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। कावेरी किसान सुरक्षा संघ सहित कई संगठनों ने मांग की है कि कर्ज़माफी को जमीन के आकार के आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि खेती की लागत सभी किसानों के लिए लगभग समान होती है। डीजल, खाद, बीज और बिजली की कीमतें छोटे और बड़े किसान में अंतर नहीं करतीं। इसलिए राहत भी समान होनी चाहिए। कई संगठनों ने यह भी कहा कि केवल crop loan ही नहीं बल्कि पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन से जुड़े सहकारी ऋणों को भी योजना में शामिल किया जाए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय की यह रणनीति केवल किसानों को राहत देने तक सीमित नहीं है। दरअसल तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। विजय ने पहली बार ग्रामीण तमिलनाडु में “भावनात्मक किसान राजनीति” का प्रयोग किया है। उनके भाषणों में किसान केवल आर्थिक इकाई नहीं बल्कि सम्मान और आत्मसम्मान का प्रतीक बनकर उभरे। यही कारण है कि चुनावों में TVK को कावेरी डेल्टा, पश्चिमी तमिलनाडु और कई ग्रामीण सीटों पर अप्रत्याशित समर्थन मिला।

विशेषज्ञों का कहना है कि सहकारी बैंकों की स्थिति भी इस पूरी बहस में बेहद महत्वपूर्ण है। यदि सरकार बड़े पैमाने पर ऋण माफ करती है तो सहकारी ढाँचे को पुनर्पूंजीकरण की आवश्यकता होगी। क्योंकि इन बैंकों की आय का बड़ा हिस्सा कृषि ऋण से आता है। पिछले वर्षों में कई सहकारी समितियों पर पहले से ही वित्तीय दबाव बढ़ा है। कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि कुछ समितियाँ किसानों को घोषित सीमा से कम ऋण दे रही थीं क्योंकि उनके पास पर्याप्त नकदी नहीं थी। ऐसे में नई कर्ज़माफी योजना राज्य के वित्तीय ढाँचे पर भी असर डालेगी।

फिर भी राजनीतिक दृष्टि से देखें तो विजय फिलहाल किसानों को यह संदेश देने में सफल दिखाई दे रहे हैं कि उनकी सरकार ग्रामीण संकट को प्राथमिकता दे रही है। तमिलनाडु में कृषि केवल अर्थव्यवस्था का विषय नहीं है। यह सामाजिक प्रतिष्ठा, जातीय समीकरण, ग्रामीण रोजगार और स्थानीय राजनीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यही कारण है कि विजय की कर्ज़माफी योजना को केवल एक आर्थिक पैकेज नहीं बल्कि तमिलनाडु की नई राजनीतिक दिशा के रूप में देखा जा रहा है।

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