Bengal Politics: बंगाल में BJP का मास्टरस्ट्रोक! PM के सलाहकार पर शुभेंदु का बड़ा दांव, वित्त मंत्री बनने की चर्चा तेज
Bengal Politics: क्या शुभेंदु अधिकारी ने बंगाल की राजनीति में चल दिया सबसे बड़ा दांव? पीएम मोदी के करीबी आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल के वित्त मंत्री बनने और नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की चर्चा तेज। जानिए BJP का पूरा मास्टरप्लान।
Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की सियासी बिसात पर एक ऐसा दांव चला जा रहा है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम की अपनी पारंपरिक सीट से इस्तीफा दे दिया है और अब वह भवानीपुर से विधायक बने रहेंगे, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। लेकिन शुभेंदु के इस फैसले ने बंगाल की राजनीति में दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं: पहला, नंदीग्राम की उस 'हॉट सीट' का उत्तराधिकारी कौन होगा? और दूसरा, बंगाल की बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने वाला वित्त मंत्री कौन बनेगा?
इन दोनों ही पेचीदा सवालों का जवाब एक ही नाम की ओर इशारा कर रहा है संजीव सान्याल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी सलाहकार और देश के जाने-माने अर्थशास्त्री संजीव सान्याल का नाम इस वक्त बंगाल की राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में है। 'द टेलीग्राफ' की एक रिपोर्ट की मानें तो सान्याल न केवल बंगाल के अगले वित्त मंत्री बन सकते हैं, बल्कि वह नंदीग्राम उपचुनाव में बीजेपी का चेहरा भी हो सकते हैं।
PM के भरोसेमंद सलाहकार और आर्थिक चाणक्य
संजीव सान्याल वर्तमान में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य हैं। यह एक ऐसी संस्था है जो सीधे प्रधानमंत्री को देश के गंभीर आर्थिक मुद्दों पर निष्पक्ष और विशेषज्ञ सलाह देती है। बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद फिलहाल मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गृह, शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्त जैसे आधा दर्जन से ज्यादा अहम मंत्रालय अपने पास रखे हैं। बीजेपी के पास विधानसभा में ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसे वैश्विक स्तर की अर्थव्यवस्था की इतनी गहरी समझ हो। ऐसे में सान्याल को सरकार में लाना बीजेपी की वही रणनीति नजर आती है, जिसके तहत एस. जयशंकर को विदेश मंत्रालय और हरदीप सिंह पुरी को पेट्रोलियम मंत्रालय सौंपा गया था।
धोती-कुर्ता और बंगाली जड़ों का गहरा नाता
शुभेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण समारोह में सान्याल को पारंपरिक बंगाली धोती-कुर्ता पहने देखा गया था, जिसे उनके औपचारिक राजनीति में प्रवेश का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। उनकी पत्नी स्मिता बरुआ भी सक्रिय नजर आई हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने चुनाव के दौरान महिला मतदाताओं को बीजेपी के पक्ष में एकजुट करने में पर्दे के पीछे से बड़ी भूमिका निभाई थी। सान्याल का व्यक्तित्व बंगाली संस्कृति और वैश्विक आर्थिक अनुभव का एक अनूठा मेल है। वह क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी सचिंद्र नाथ सान्याल के पर-भतीजे हैं, जो भगत सिंह के गुरु थे। उनके परदादा अविभाजित बंगाल विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक थे। यानी सियासत और देशप्रेम उनके खून में है।
"कोलकाता मरा नहीं, उसकी हत्या की गई"
चुनाव नतीजों के बाद से ही सान्याल लगातार मुखर हैं। उन्होंने कई लेखों और साक्षात्कारों में बंगाल के "आर्थिक पतन" पर कड़ा प्रहार किया है। उनका एक बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कहा- "कोलकाता मरा नहीं, उसकी हत्या की गई और मैं इसका गवाह हूं।" सान्याल का मानना है कि दशकों के ठहराव ने बंगाल को सांस्कृतिक और शैक्षिक रूप से भी पीछे धकेल दिया है। उनके अनुसार, पूर्वी भारत का विकास तभी संभव है जब कोलकाता को फिर से 'रिबूट' किया जाए। वह कोलकाता को एक ऐसा हब बनाना चाहते हैं जो पूरे पूर्वी क्षेत्र के विकास का इंजन बन सके।
चुनौतियां पहाड़ जैसी: बदहाल जीडीपी और कर्ज का बोझ
जो भी बंगाल का अगला वित्त मंत्री बनेगा, उसके सामने कांटों भरा ताज होगा। EAC-PM के आंकड़े बताते हैं कि 1960-61 में देश की जीडीपी में बंगाल का हिस्सा 10.5% था, जो अब घटकर मात्र 5.6% रह गया है। कभी तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा बंगाल अब 24वें स्थान पर खिसक गया है। प्रति व्यक्ति आय भी राष्ट्रीय औसत के 127% से गिरकर 80% पर आ गई है। सबसे बड़ी चिंता 7.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। संजीव सान्याल जैसे दिग्गज अर्थशास्त्री के लिए यह एक ऐसी चुनौती होगी, जहां उन्हें अपनी वैश्विक सूझबूझ का इस्तेमाल कर बंगाल की 'खोई हुई शान' वापस लानी होगी।
नंदीग्राम: सान्याल के लिए सुरक्षित सियासी जमीन
शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट छोड़कर संजीव सान्याल के लिए रास्ता साफ करने के संकेत दे दिए हैं। नंदीग्राम शुभेंदु का गढ़ माना जाता है, जहां से जीत हासिल करना सान्याल के लिए आसान होगा। बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि अगर सान्याल नंदीग्राम से उपचुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचते हैं, तो उनके पास बंगाल को बदलने के लिए जनता का जनादेश और विशेषज्ञता दोनों होंगे।