Bhojshala Controversy: क्या है वो सदियों पुराना भोजशाला विवाद? जिस पर इंदौर हाईकोर्ट ने आज सुनाया ऐतिहासिक फैसला

Bhojshala Controversy: भोजशाला विवाद मध्य प्रदेश के धार जिले का एक ऐतिहासिक और धार्मिक मामला है, जिस पर इंदौर हाईकोर्ट ने आज एक बड़ा फैसला सुनाया है। इसमें मंदिर या मस्जिद होने को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है।

Update:2026-05-15 14:23 IST

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Bhojshala Controversy: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर आज पूरे देश की नजरें इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ पर टिकी हुई थीं। जिसमें लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अदालत आज इस मामले में अपना अहम फैसला सुनाया है। फैसले को देखते हुए धार और आसपास के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। तो क्या है ये सदियों पुराना भोजशाला विवाद आइए डालते हैं इसपर एक नजर।

आस्था, इतिहास और अधिकारों से जुड़ा जटिल विवाद

दरअसल, भोजशाला विवाद सिर्फ जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं है, बल्कि यह आस्था, इतिहास और पुरातात्विक साक्ष्यों से जुड़ी एक जटिल गुत्थी बन चुका है। इस विवाद में हिंदू पक्ष का दावा है कि यह 11वीं सदी का प्राचीन वाग्देवी यानी सरस्वती मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला की मस्जिद बताता है।

जिसको लेकर इंदौर हाईकोर्ट ने मार्च 2024 में एएसआई को निर्देश दिया था कि ज्ञानवापी की तर्ज पर आधुनिक तकनीकों जैसे जीपीआर सर्वे के जरिए वैज्ञानिक जांच की जाए। इसके बाद लगभग 98 दिनों तक सर्वे चला और अब एएसआई ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है।

11वीं सदी से शुरू हुआ ऐतिहासिक विवाद

रिपोर्ट्स के अनुसार भोजशाला का निर्माण 11वीं सदी में वर्ष 1034 ईस्वी में परमार वंश के राजा भोज ने करवाया था। राजा भोज को विद्या और कला का संरक्षक माना जाता है और उन्होंने इसे एक प्रकार की संस्कृत पाठशाला और शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया था, जहां मां सरस्वती की उपासना होती थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सल्तनत काल में 13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी और बाद में दिलावर खान गौरी के आक्रमणों के बाद इस संरचना में बदलाव किए गए। हिंदू पक्ष का आरोप है कि मंदिर को तोड़कर इसे मस्जिद का रूप दिया गया और बाद में कमाल मौला मस्जिद के रूप में स्थापित किया गया। वहीं अंग्रेजों के समय वर्ष 1902 के आसपास एएसआई की जांच के बाद भी इसके स्वरूप को लेकर मतभेद बने रहे और आजादी के बाद 1951 में इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया।

वर्तमान व्यवस्था और पूजा नमाज का विवाद

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2003 में एएसआई द्वारा तय व्यवस्था के अनुसार हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार को यहां पूजा की अनुमति दी गई है, जबकि मुसलमानों को हर शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने का अधिकार दिया गया है। अन्य दिनों में यह परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता है।

हालांकि हिंदू पक्ष पूरे परिसर पर पूर्ण अधिकार और नियमित पूजा की मांग कर रहा है। वहीं विवाद तब और बढ़ जाता है जब वसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ती है, क्योंकि उस दिन दोनों पक्ष अपने अधिकारों को लेकर आमने सामने आ जाते हैं।

इसको लेकर हिंदू पक्ष का कहना है कि सरस्वती मंदिर में नमाज पढ़ना उचित नहीं है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे अपनी सदियों पुरानी इबादतगाह मानता है और किसी भी बदलाव का विरोध करता है।

एएसआई सर्वे में मिले महत्वपूर्ण साक्ष्य

वहीं कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने लगभग 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वे किया जिसमें जीपीआर तकनीक, खुदाई और अन्य आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट में परिसर के नीचे दबे अवशेष, मूर्तियों के अंश और दीवारों पर उकेरी गई लिपियों का अध्ययन किया गया है।

यहां हिंदू पक्ष का दावा है कि सर्वे में शंख, चक्र और संस्कृत शिलालेख जैसे सनातन धर्म से जुड़े प्रमाण मिले हैं, जो इसे मूल रूप से मंदिर साबित करते हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसके धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप बताया है।

मुस्लिम पक्ष का रुख

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थल सूफी संत कमाल मौला की दरगाह और मस्जिद है और सदियों से मुस्लिम समुदाय की आस्था का केंद्र रहा है। वे प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का हवाला देते हैं, जिसके अनुसार 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसे बदला नहीं जा सकता।

मुस्लिम पक्ष ने यह भी आशंका जताई है कि सर्वे के दौरान मूल संरचना के साथ छेड़छाड़ हो सकती है और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक भी इस मामले में गुहार लगाई थी।

वाग्देवी प्रतिमा और आस्था का पहलू

दरअसल, भोजशाला से जुड़ी वाग्देवी यानी सरस्वती की मूल प्रतिमा वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है, जिसे अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड अपने साथ ले गए थे। हिंदू पक्ष की मांग है कि यदि कोर्ट इस स्थल को मंदिर घोषित करता है तो इस प्रतिमा को वापस लाकर भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाए।

कोर्ट ने क्या सुनाया फैसला?

 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने धार भोजशाला मामले में शुक्रवार को फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह परिसर हिंदू मंदिर है और इसके धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए किसी भी तरह के अनुचित उपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी। यह निर्णय स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की सुरक्षा को लेकर अहम माना जा रहा है।

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