मराठी पर महा-बवाल! शिवसेना-MNS के बाद मैदान में उतरे शरद पवार, इस बड़े कदम से राजनीतिक भूचाल
मुंबई में मराठी भाषा को लेकर जारी विवाद के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है। एनसीपी अल्पसंख्यक विभाग के मुंबई अध्यक्ष राशिद खान ने कहा कि मराठी सीखना जरूरी है, लेकिन इसे जबरदस्ती नहीं बल्कि प्यार और सहयोग के साथ सिखाया जाना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि डर या दबाव के जरिए किसी को भाषा नहीं सिखाई जा सकती।
मुंबई में मराठी भाषा को लेकर चल रहा विवाद अब और गहराता जा रहा है। एक ओर जहां महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मराठी को अनिवार्य बनाने की मांग कर रही है, वहीं शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने अलग राह अपनाई है। एनसीपी ने “सिखाओ, जोड़ो” पहल की शुरुआत की है, जिसके तहत अंजुमन-इस्लाम संस्थान के सहयोग से मराठी सिखाने का अभियान चलाया जा रहा है।
पार्टी के अनुसार, मुंबई के 22 केंद्रों पर मुफ्त मराठी कक्षाएं शुरू की जाएंगी, जो खासतौर पर मुस्लिम और गैर-मराठी भाषी लोगों के लिए होंगी। एनसीपी का कहना है कि भाषा सिखाने के लिए दबाव नहीं, बल्कि अनुकूल माहौल जरूरी होता है। पार्टी ने स्पष्ट किया कि मराठी के नाम पर किसी तरह की जबरदस्ती या दादागिरी स्वीकार नहीं की जाएगी। एनसीपी अल्पसंख्यक विभाग के मुंबई अध्यक्ष राशिद खान ने कहा कि मराठी सीखना अच्छी बात है, लेकिन इसे प्यार और सहयोग के जरिए सिखाया जाना चाहिए, न कि डर के माहौल में।
दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब मनसे कार्यकर्ताओं ने दुकानदारों और ऑटो चालकों पर मराठी बोलने का दबाव बनाना शुरू किया। कई जगह पोस्टर और स्टिकर लगाकर चेतावनियां भी दी गईं। मनसे का कहना है कि महाराष्ट्र में रहने वालों को मराठी आनी चाहिए, जबकि विरोधी दल इसे भाषाई दबाव और दबंगई करार दे रहे हैं।
अब एनसीपी ने इस मुद्दे को सामाजिक समरसता के नजरिए से उठाया है। राशिद खान का दावा है कि अंजुमन-इस्लाम के साथ मिलकर शुरू की गई यह पहल अलग-अलग समुदायों के बीच दूरी कम करने में मदद करेगी। हालांकि, कई लोग इस पूरे विवाद को राजनीतिक नजरिए से भी देख रहे हैं।
इस बीच, पिछले महीने महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सारनिक ने घोषणा की थी कि 1 मई से सभी लाइसेंसधारी ऑटो चालकों के लिए मराठी अनिवार्य होगी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि भाषा न आने पर लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। हालांकि, बाद में राज्य सरकार ने 100 दिन की सत्यापन अभियान चलाने का फैसला लिया, ताकि सख्त नियम लागू करने से पहले लोगों को तैयारी का समय मिल सके।
उधर, बिहार और उत्तर प्रदेश से इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा विरोध सामने आया है, क्योंकि इन राज्यों से बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए मुंबई आते हैं। आरजेडी नेता मनोज कुमार झा ने कहा कि भाषा को टकराव का आधार बनाना गलत है। उनके मुताबिक, भाषा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना होता है, न कि विभाजन पैदा करना।