Election Funding: चुनावी रैलियों में पक्ष-विपक्ष पानी की तरह बहाते है पैसा! आखिर कौन करता है फंडिंग?
Election Funding India: जानिए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों के पास अरबों रुपये कहाँ से आते हैं और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) व ADR की रिपोर्ट्स के अनुसार चुनावी खर्च का असली गणित क्या है।
Election Funding India: उत्तर प्रदेश की राजनीति को देश की सत्ता का मुख्य रास्ता माना जाता है. साल 2027 में यूपी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और सभी राजनैतिक दलों ने अभी से अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, पक्ष और विपक्ष दोनों ही जनता को रिझाने के लिए करोड़ों-अरबों रुपये पानी की तरह बहाने लगते हैं. आसमान छूते मंच, चमचमाते हुए होर्डिंग्स, लाखों लोगों की भीड़ के लिए आलीशान गाड़ियां और सोशल मीडिया पर विज्ञापनों की बाढ़ सी आ जाती है.
ऐसे में हर आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर चुनाव प्रचार में बहने वाले इस अकूत पैसे का असली जरिया क्या है? पार्टियां इतना पैसा लाती कहां से हैं? क्या चुनाव जीतने के बाद बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों पर ही रह जाते हैं या वाकई जमीन पर उतरते हैं? आइए इस पूरी व्यवस्था के पीछे के अर्थशास्त्र, इतिहास और छिपे हुए पहलुओं की गहराई से पड़ताल करते हैं.
आखिर कहां से आता है इतना पैसा?
भारत में किसी भी राजनीतिक दल के पास मुख्य रूप से तीन या चार रास्तों से सबसे ज्यादा पैसा आता है. पहला और सबसे बड़ा जरिया है कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत चंदा. देश के बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारिक घराने और कंपनियां विभिन्न राजनीतिक दलों को हर साल करोड़ों रुपये का गुप्त या सार्वजनिक चंदा देते हैं. हालांकि पहले चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) के जरिए यह पैसा बहुत आसानी से और बिना पहचान उजागर किए आता था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अब असंवैधानिक घोषित कर दिया है, लेकिन फिर भी इलेक्टोरल ट्रस्ट और अन्य प्रत्यक्ष माध्यमों से कॉर्पोरेट फंडिंग लगातार जारी है.
दूसरा जरिया है अज्ञात स्रोत (Unknown Sources). एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक दलों की कुल कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे स्रोतों से आता है जिनका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड जनता के सामने नहीं होता. इनमें 20,000 रुपये से कम मिलने वाले छोटे-छोटे नकद चंदे, कूपन की बिक्री और चुनावी सभाओं में मिलने वाली गुप्त मदद शामिल होती है. इसके अलावा, पार्टियों के अपने रजिस्टर्ड सदस्य हर महीने या साल में मेंबरशिप फीस और लेवी के रूप में अपनी पार्टी के फंड में योगदान देते हैं.
साल 2022 के चुनाव में किसने कितना बहाया पैसा
साल 2022 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान खर्चों के जो आधिकारिक आंकड़े सामने आए, वे आंखें चौंधिया देने वाले हैं. चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, साल 2022 में एक उम्मीदवार के लिए खर्च की अधिकतम सीमा 40 लाख रुपये तय की गई थी, लेकिन जब पार्टियों के केंद्रीय और प्रादेशिक स्तर के खर्चों को जोड़ा गया, तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई.
आधिकारिक डेटा के मुताबिक, साल 2022 के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों (जिसमें मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश शामिल था) के दौरान प्रमुख राजनीतिक दलों ने कुल मिलाकर 470 करोड़ रुपये से अधिक का ऑन-रिकॉर्ड चुनावी खर्च दर्ज कराया था. इस खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश की राज्य इकाइयों और वहां के प्रचार अभियानों पर केंद्रित था. उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने विशाल नेटवर्क, स्टार प्रचारकों की हवाई यात्राओं और बड़े पैमाने पर मीडिया विज्ञापनों पर सबसे ज्यादा रकम खर्च की थी. वहीं, मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) भी इस रेस में पीछे नहीं थी. उसने भी डिजिटल कैंपेन, रैलियों के आयोजन और होर्डिंग्स पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए थे.
क्या है इन आंकड़ों का असली सोर्स?
आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि इन खर्चों के विवरण का असली और एकमात्र कानूनी जरिया भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India - ECI) की वेबसाइट पर राजनीतिक दलों द्वारा दाखिल किए गए 'इलेक्शन एक्सपेंडिचर स्टेटमेंट' (चुनावी खर्च का ब्यौरा) हैं. इसके अलावा, स्वतंत्र संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और मायनेता (MyNeta.info) इन तमाम आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करके अपनी विस्तृत सालाना रिपोर्ट जनता के सामने रखती हैं, जो इस पूरी जानकारी का मुख्य कानूनी और विश्वसनीय दस्तावेज है.
कहां-कहां उड़ता है सबसे ज्यादा पैसा?
एडीआर की रिपोर्ट के विश्लेषण से यह साफ पता चलता है कि चुनावों में होने वाले खर्च को मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्सों में बांटा जाता है. सबसे बड़ा खर्चा 'पब्लिसिटी' यानी विज्ञापन और प्रचार सामग्री पर होता है. कुल खर्च का लगभग 33% से 35% हिस्सा अखबारों, टीवी चैनलों, रेडियो और सोशल मीडिया पर चलने वाले विज्ञापनों पर उड़ाया जाता है. दूसरा सबसे बड़ा खर्चा होता है 'ट्रैवल एक्सपेंस' यानी यात्रा का खर्च. पार्टियों के शीर्ष नेताओं और स्टार प्रचारकों को एक दिन में तीन-तीन, चार-चार रैलियां करनी होती हैं. इसके लिए हेलीकॉप्टर और प्राइवेट जेट बुक किए जाते हैं. साल 2022 के चुनाव में केवल स्टार प्रचारकों की हवाई यात्राओं पर पार्टियों ने करोड़ों रुपये खर्च किए थे. इसके अलावा, एक बहुत बड़ी रकम सीधे उम्मीदवारों को एकमुश्त (Lumpsum Amount) दी जाती है ताकि वे अपने स्थानीय स्तर पर रैलियों, गाड़ियों के ईंधन और कार्यकर्ताओं के खाने-पीने का इंतजाम कर सकें.
क्या चुनाव के बाद पूरे होते हैं जनता से किए गए वादे?
चुनाव आते ही घोषणापत्रों (Manifesto) की बाढ़ आ जाती है. कोई मुफ्त बिजली का वादा करता है, तो कोई मुफ्त राशन, लैपटॉप, स्कूटी या सीधे बैंक खातों में नकद पैसे भेजने की गारंटी देता है. अर्थशास्त्रियों की भाषा में इसे 'लोकलुभावन वादे' या 'फ्रीबीज' कहा जाता है. अब सवाल यह है कि क्या ये वादे पूरे होते हैं?
अगर निष्पक्ष नजरिए से देखें, तो सत्ता में आने के बाद पार्टियां अपने चुनिंदा वादों को जरूर पूरा करती हैं, खासकर उन वादों को जिनसे उनका बड़ा वोट बैंक सीधे जुड़ा होता है. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में मुफ्त राशन योजना, किसानों को सम्मान निधि या बिजली बिलों में राहत जैसे वादों को धरातल पर उतारा गया. लेकिन इसके विपरीत, कई बड़े वादे जैसे लाखों युवाओं को तुरंत सरकारी नौकरी देना, पुरानी पेंशन योजना को बहाल करना या पूरी तरह से कर्ज माफी करना, अक्सर सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ (Fiscal Deficit) के कारण ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. जब कोई सरकार लोकलुभावन योजनाओं पर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर देती है, तो राज्य में नए उद्योग लगाने, सड़कें बनाने और स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने के लिए बजट कम पड़ जाता है.
UP चुनाव 2027 का बढ़ता बजट
जैसे-जैसे तकनीक बढ़ रही है, चुनाव लड़ने का तरीका और उसका बजट भी तेजी से अपग्रेड हो रहा है. साल 2027 के यूपी चुनाव में हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डीपफेक टेक्नोलॉजी, टारगेटेड सोशल मीडिया कैंपेन और डेटा एनालिटिक्स पर पानी की तरह पैसा बहता हुआ दिखने वाला है. अब पार्टियां घर-घर जाकर पर्चे बांटने से ज्यादा जोर हर नागरिक के मोबाइल स्क्रीन पर कब्जा करने में लगा रही हैं.
अंत में, सबसे बड़ा पहलू यह है कि चुनाव में चाहे पक्ष जीते या विपक्ष, रैलियों में बहने वाला यह अथाह पैसा अंततः किसी न किसी रूप में आम जनता की जेब और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. कॉर्पोरेट घराने जो चंदा पार्टियों को देते हैं, उसकी वसूली कहीं न कहीं नीतियों के प्रभाव या उत्पादों की कीमतों के जरिए होती है.