छोटी- छोटी मगर मोटी बातें: हर मां-बाप इसे समझे, हर बच्चे में होता है ये खास गुण

विश्व रचनात्मकता दिवस पर जानें वास्तविक नवाचार मशीनों में नहीं, मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों की मौलिकता में छिपा है।

Update:2026-04-21 07:00 IST

Chhoti Chhoti Magar Moti Batein (Social Media).jpg

21 अप्रैल को पूरी दुनिया 'विश्व रचनात्मकता और नवाचार दिवस' (WCID) मनाती है। संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य मानव विकास और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में रचनात्मक सोच की भूमिका के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। लेकिन जब हम रचनात्मकता (Creativity) के मूल स्रोत की तलाश करते हैं, तो सबसे सुंदर और निश्छल स्वरूप 'बाल-मन' में दिखाई देता है। बचपन वह अवस्था है जहाँ हमारी सोच अनुभवों के बोझ से मुक्त होती है और कल्पनाएं सीमाओं को नहीं मानतीं।

बाल-मन: जिज्ञासा और सृजन का संगम

एक बच्चा जब कुछ नया करता है, तो उसके पीछे कोई स्वार्थ या 'डर' नहीं होता। वह दुनिया को एक वैज्ञानिक की तरह देखता है, जिसके लिए हर चीज एक नया प्रयोग है। बच्चों का मन जितनी तेजी से सोचता है, उतनी ही तेजी से अपनी धारणाएं विकसित करता है। उनके भीतर की यह 'क्रिएटिविटी' दरअसल उनकी उस मासूमियत से आती है, जहाँ उन्हें उचित-अनुचित या लाभ-हानि का गणित नहीं पता होता। वे परिणामों की चिंता किए बिना बस अपने कौतूहल को जीना चाहते हैं।

बाल-मन: जिज्ञासा और सृजन का संगम

एक बच्चा जब कुछ नया करता है, तो उसके पीछे कोई स्वार्थ या 'डर' नहीं होता। वह दुनिया को एक वैज्ञानिक की तरह देखता है, जिसके लिए हर चीज एक नया प्रयोग है। बच्चों का मन जितनी तेजी से सोचता है, उतनी ही तेजी से अपनी धारणाएं विकसित करता है। उनकी यह 'क्रिएटिविटी' दरअसल उनकी उस मासूमियत से आती है, जहाँ उन्हें तर्क-वितर्क या लाभ-हानि का गणित नहीं पता होता।

इसी बाल-सुलभ कल्पनाशीलता को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कालजयी कविता 'चाँद का हठ' में अद्भुत ढंग से पिरोया है। जब हम छोटे थे, तो यह कविता हमारे भीतर की कल्पनाओं को पंख लगा देती थी:

"हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला। सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।"

एक बच्चे की सोच देखिए—वह चाँद की कलाओं (घटने-बढ़ने) को वैज्ञानिक चश्मे से नहीं, बल्कि एक 'ममतामयी' नजरिए से देखता है। उसे चिंता है कि आसमान के सफर में चाँद को जाड़ा लगता होगा। जब माँ कहती है कि बेटा तेरा तो नाप हर दिन बदलता है, कभी तू चौड़ा होता है तो कभी छोटा, तो यह संवाद बच्चे के भीतर 'लॉजिक' और 'इमेजिनेशन' का एक सुंदर संतुलन बनाता है।

कनखल की स्मृतियां: संवाद की अद्भुत शक्ति

मेरी स्मृतियों में हरिद्वार के कनखल की वह घटना आज भी दर्ज है। कनखल, जो अपनी पौराणिक पहचान के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वहाँ मैंने बचपन में देखा कि कैसे एक मासूम सोच बड़े-बड़े संकटों को टाल सकती है। मुझे याद है, दो विशालकाय सांड़ सड़क पर बुरी तरह लड़ रहे थे। उस समय मेरी ढाई-तीन साल की छोटी बहन, जो परिणामों से बेखबर थी, उनके बीच पहुँच गई और उन्हें शांत कराने लगी— "लड़ो नहीं भाइयों, लड़ो नहीं!"

वह दृश्य आज भी अचंभित करता है कि उन बेजुबानों ने उस अबोध की पुकार सुनी और अलग हो गए। यह बाल-मन की वह 'पॉजिटिव क्रिएटिविटी' थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के संवाद में विश्वास रखती थी। हालांकि, एक अभिभावक के तौर पर यह दृश्य डराने वाला भी था, जो हमें याद दिलाता है कि बच्चों की इस ऊर्जा को हमेशा सशक्त निगरानी की जरूरत होती है।

कल्पनाशीलता का विस्तार: रेडियो और खेल

वह दौर आज की तरह डिजिटल स्क्रीन का नहीं था। हम 'हवा महल' जैसे रेडियो नाटकों को सुनकर मन के परदे पर दृश्य गढ़ते थे। 'अंधेर नगरी' के संवाद हों या 'बहरे बाबा' के कार्यक्रम, वे हमारी कल्पनाशीलता को धार देते थे। हम बच्चे गलियों में कंचे, गिल्ली-डंडा खेलते हुए खुद अपनी कहानियाँ बुनते और उनके पात्र बनते थे।

उस दौर में रचनात्मकता हमारी जीवनशैली का हिस्सा थी। लोग अपने घरों के डिजाइन खुद अपनी जरूरतों के अनुसार तैयार करते थे। घरों के बाहर बिछी चारपाइयां 'सोशल पुलिसिंग' का काम करती थीं। उन पर बैठे बड़े-बुजुर्ग अनजाने में ही बच्चों के परम संरक्षक होते थे, जो उन्हें खेलते हुए देखते भी थे और किसी भी संभावित खतरे से बचाते भी थे।

सूझबूझ और सुरक्षा का नवाचार

एक घटना 1972-73 के आसपास की है, जब मेरे पिताजी (जो दैनिक जागरण, कानपुर में वरिष्ठ संपादकीय पद पर थे) देर रात घर लौटते थे। एक रात किसी ने उनकी आवाज की नकल कर दरवाजा खुलवाने का प्रयास किया। उस समय मेरी माँ की 'त्वरित बुद्धि' (Presence of Mind) और सजगता ने एक बड़ी अनहोनी को टाल दिया। यह घटना सिखाती है कि रचनात्मकता केवल कुछ नया बनाना नहीं, बल्कि संकट के समय सही निर्णय लेना भी है। माँ की वह सतर्कता आज के 'स्मार्ट सुरक्षा सिस्टम' से कहीं अधिक प्रभावी थी।

रचनात्मकता को उभारें, पर सतर्कता के साथ

आज विज्ञान की प्रगति के साथ हम 'एआई' और 'गूगल' के युग में हैं। तकनीक जरूरी है, लेकिन यह हमारे बच्चों की मौलिक सोच और उनके 'अनुभवजन्य बोध' को सीमित कर रही है। हमें बच्चों की रचनात्मकता को दबाना नहीं है, बल्कि उसे सही दिशा और सुरक्षा देनी है।

हमें समझना होगा कि:

बच्चों की निडर जिज्ञासा ही नवाचार की जननी है, लेकिन उसे बड़ों के अनुभव का कवच चाहिए।

शिक्षा पद्धति और पालन-पोषण ऐसा हो, जहाँ बच्चा सवाल पूछे, प्रयोग करे, लेकिन वह हमेशा सुरक्षित घेरे में रहे।

रचनात्मकता का मतलब केवल जोखिम उठाना नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण ढंग से समाधान खोजना है।

विश्व रचनात्मकता दिवस पर हमारा संकल्प होना चाहिए कि हम भावी पीढ़ी के भीतर के उस 'नन्हे आविष्कारक' को जीवित रखें, उसे कल्पनाओं के ऊंचे आसमान में उड़ने दें, लेकिन अपनी मजबूत निगरानी और संस्कार की डोर हमेशा अपने हाथ में रखें। तभी हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर पाएंगे जो न केवल 'स्मार्ट' होगी, बल्कि 'संवेदनशील' और 'मौलिक' भी होगी।

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