जब संबंध नहीं बनाना तो शादी क्यों करनी है? — ‘मैरिटल रेप’ पर स्पष्ट और तथ्यपरक चर्चा

वैवाहिक बलात्कार, विवाह में सहमति और भारत में कानूनी और सामाजिक बहस पर एक संतुलित और तथ्य-आधारित चर्चा।

Update:2026-04-20 23:02 IST

Marital Rape India (Image Credit-Social Media)

Marital Rape India: असीम निराशा के साथ यह लिखा जा रहा है, लेकिन इस बार केवल गुस्से में नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से—ताकि साफ दिख सके कि यह समस्या कुछ व्यक्तियों की सोच भर नहीं है, बल्कि लंबे समय से समाज में मौजूद एक जटिल संरचनात्मक समस्या है।

‘पितृसत्ता’ कोई नई अवधारणा नहीं है। इसका संबंध इतिहास में संपत्ति, वंश और नियंत्रण की प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। समय के साथ स्त्री को कई बार ‘वंश चलाने का माध्यम’ और ‘घर की इज़्ज़त’ जैसे प्रतीकों में सीमित किया गया, जिससे उसके शरीर और निर्णय पर उसके अधिकार को कमतर आँका गया। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज भी कई सामाजिक व्यवहारों को प्रभावित करती है।


विवाह, जो सामान्यतः एक पवित्र संस्था के रूप में देखा जाता है, लंबे समय तक ऐसी व्यवस्था भी रहा है जिसमें स्त्री की सहमति को स्थायी मान लेने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। यानी एक बार विवाह होने के बाद उसकी इच्छा को स्वतः स्वीकार मान लिया गया। यही वह बिंदु है जहाँ ‘मैरिटल रेप’ (वैवाहिक बलात्कार) जैसी अवधारणा पर बहस शुरू होती है।

‘सेक्स’, ‘बलात्कार’, ‘शादी में सेक्स’ और ‘मैरिटल रेप’—इनके बीच का अंतर समझना जटिल नहीं है, लेकिन कई बार इसे जानबूझकर धुंधला कर दिया जाता है।

‘सेक्स’ वह स्थिति है जहाँ दोनों व्यक्तियों की इच्छा और सहमति मौजूद हो। इसमें किसी प्रकार का डर, दबाव या बाध्यता नहीं होती। यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मानसिक स्वीकृति का भी हिस्सा है।

‘बलात्कार’ वह स्थिति है जहाँ एक व्यक्ति की इच्छा दूसरे पर थोपी जाती है, जहाँ ‘ना’ को अनदेखा किया जाता है। ऐसी स्थिति में सहमति समाप्त हो जाती है और यह एक आपराधिक कृत्य बन जाता है।

अंतर मूल रूप से इतना ही स्पष्ट है। इसे जटिल बनाना अक्सर दृष्टिकोण का प्रश्न होता है।

‘शादी में सेक्स’ एक सामान्य सामाजिक व्यवहार है, जहाँ दो व्यक्ति आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं। विवाह इस संबंध को सामाजिक और कानूनी मान्यता देता है, लेकिन यह किसी एक पक्ष को दूसरे के शरीर पर स्वतः अधिकार नहीं देता। यह सुविधा या वैधता है, पर ‘अनिवार्य अधिकार’ नहीं है।


यही वह जगह है जहाँ ‘मैरिटल रेप’ (वैवाहिक बलात्कार) की चर्चा महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि विवाह के भीतर भी किसी एक की इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाया जाता है, तो वह सहमति के सिद्धांत के खिलाफ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों में इसे अपराध माना गया है, जबकि भारत में इस विषय पर कानूनी स्थिति अब भी बहस का विषय है।

यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि समाज की सोच का भी है। जब तक ‘सहमति’ को हर संबंध का मूल आधार नहीं माना जाएगा, तब तक इस तरह की समस्याएँ बनी रहेंगी।

अंततः सवाल यही है—क्या विवाह किसी व्यक्ति की इच्छा को स्थायी रूप से खत्म कर देता है? या फिर हर बार, हर संबंध में सहमति आवश्यक है? महाभारत हो या आधुनिक समाज, मूल प्रश्न हमेशा ‘धर्म’ और ‘न्याय’ का ही रहता है—और न्याय वहीं संभव है जहाँ व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित हो।

(साभार – सामाजिक अध्ययन, कानूनी विमर्श और समकालीन बहस)

 

Similar News