ISBN क्या है? किताबों की यह ग्लोबल पहचान कैसे बनी और क्यों जरूरी हुई?

What is ISBN: दि किसी पुस्तक विक्रेता को, History of India मँगानी हो और उसी नाम से बीस पुस्तकें बाजार में हों, तो लेखक, प्रकाशक, संस्करण, वर्ष और प्रारूप का पूरा विवरण देना पड़ता था। इसी आवश्यकता ने उस प्रणाली को जन्म दिया जिसे आगे चलकर ISBN कहा गया।

Update:2026-08-07 20:13 IST

ISBN Meaning

What is ISBN: किसी भी पुस्तक के पिछले कवर या कॉपीराइट पृष्ठ पर अक्सर एक लंबी-सी संख्या दिखाई देती है, जिसके आगे ‘ISBN’ लिखा होता है। आज यह संख्या इतनी सामान्य हो चुकी है कि अधिकांश पाठक उसे देखे बिना ही पुस्तक पढ़ना शुरू कर देते हैं। लेकिन प्रकाशन जगत के लिए यह संख्या किसी पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक पहचान में से एक है। ISBN का पूरा नाम International Standard Book Number है, अर्थात् अंतरराष्ट्रीय मानक पुस्तक संख्या। आधुनिक ISBN 13 अंकों का होता है और उसका उद्देश्य किसी विशेष पुस्तक के किसी विशेष संस्करण और प्रारूप की ऐसी विशिष्ट पहचान बनाना है जिसे पुस्तक विक्रेता, प्रकाशक, वितरक, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, ऑनलाइन बुकस्टोर और अंतरराष्ट्रीय पुस्तक व्यापार की प्रणालियाँ बिना भ्रम के पहचान सकें। यह समझना बहुत जरूरी है कि ISBN लेखक का व्यक्तिगत नंबर नहीं होता और न ही यह केवल पुस्तक के शीर्षक का नंबर होता है। वास्तव में ISBN किसी विशेष प्रकाशन उत्पाद की पहचान है। इसलिए एक ही लेखक की दस पुस्तकों के दस अलग ISBN हो सकते हैं और उसी पुस्तक के पेपरबैक, हार्डबैक, ई-बुक या संशोधित संस्करण के भी अलग ISBN हो सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय ISBN एजेंसी के अनुसार वर्तमान ISBN पाँच तत्वों से मिलकर बनता है और 1 जनवरी 2007 से यह हमेशा 13 अंकों का होता है; उससे पहले ISBN दस अंकों का होता था।

व्यावहारिक समस्या से निकली व्यवस्था

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक प्रकाशकों की संख्या बढ़ चुकी थी।किताबों के नए संस्करण तेजी से निकल रहे थे और पुस्तक विक्रेताओं को हजारों अलग-अलग शीर्षकों का रिकॉर्ड रखना पड़ता था। समस्या यह थी कि कई पुस्तकों के नाम एक जैसे हो सकते थे, एक ही लेखक अपनी पुस्तक को कई प्रकाशकों से प्रकाशित कर सकता था। और किसी प्रसिद्ध पुस्तक के अलग-अलग संस्करण बाजार में एक ही समय पर उपलब्ध हो सकते थे। केवल शीर्षक लिखकर किसी पुस्तक का ऑर्डर देना भ्रम पैदा कर सकता था। यदि किसी पुस्तक विक्रेता को, History of India मँगानी हो और उसी नाम से बीस पुस्तकें बाजार में हों, तो लेखक, प्रकाशक, संस्करण, वर्ष और प्रारूप का पूरा विवरण देना पड़ता था। इसी आवश्यकता ने उस प्रणाली को जन्म दिया जिसे आगे चलकर ISBN कहा गया।

ब्रिटेन से हुई शुरुआत

इस कहानी की औपचारिक शुरुआत ब्रिटेन में 1965 में हुई। प्रसिद्ध पुस्तक विक्रेता कंपनी W.H. Smith ने घोषणा की कि वह अपने विशाल गोदाम को कंप्यूटरीकृत करना चाहती है और इसके लिए ऐसी मानक संख्या आवश्यक है जिससे प्रत्येक पुस्तक को तुरंत और स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके। उस समय पुस्तक उद्योग के लिए कोई एक सामान्य व्यवस्था नहीं थी। W.H. Smith की इसी आवश्यकता ने एक मानक पुस्तक संख्या प्रणाली के निर्माण की प्रक्रिया को गति दी। एक नौ-अंकीय Standard Book Number, यानी SBN, प्रणाली विकसित की गई जिसमें अंतिम अंक एक ‘चेक डिजिट’ था, जो संख्या की गणितीय शुद्धता जाँच सकता था। ब्रिटेन इस प्रणाली को अपनाने वाला पहला देश बना और J. Whitaker & Sons Ltd. ने पहली पंजीकरण एजेंसी के रूप में काम किया। व्यवस्था इतनी सफल हुई कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, स्वीडन और नीदरलैंड सहित अन्य देशों के प्रकाशन तथा पुस्तकालय जगत ने भी इसमें रुचि दिखाई। अंतरराष्ट्रीय विस्तार के लिए नौ-अंकीय SBN को दस अंकों में बदला गया और 1970 में International Organization for Standardization, यानी ISO, के अंतर्गत इसे अंतरराष्ट्रीय मानक का दर्जा मिला। यहीं से आधुनिक अर्थ में International Standard Book Number की वैश्विक यात्रा शुरू हुई।

तेरह अंकों का कोड

1970 से लेकर 2006 तक ISBN मुख्यतः दस अंकों का रहा। लेकिन समय के साथ वैश्विक प्रकाशन उद्योग इतना बढ़ा कि संख्या क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई और पुस्तक व्यापार सामान्य खुदरा बारकोड व्यवस्था के साथ भी अधिक एकीकृत हो गया। इसी कारण 1 जनवरी 2007 से ISBN को 13 अंकों का कर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय ISBN एजेंसी के अनुसार आज सभी ISBN 13 अंकों के होते हैं और उनकी शुरुआत वर्तमान में 978 या 979 से होती है। 13 अंकों की प्रणाली ने उपलब्ध नंबरों की क्षमता बढ़ाई और ISBN को अंतरराष्ट्रीय EAN-13 उत्पाद-कोड व्यवस्था के साथ अधिक सुगमता से जोड़ा। यही कारण है कि आज किसी पुस्तक के पीछे दिखाई देने वाला ISBN आम तौर पर बारकोड के रूप में भी छपा होता है। इससे पुस्तक की पहचान मानव पाठक के साथ-साथ मशीन और स्कैनर भी तुरंत कर सकते हैं।

आधुनिक ISBN पाँच अलग तत्वों में विभाजित होता है और प्रत्येक तत्व का अपना कार्य है। पहला तत्व Prefix Element होता है, जो वर्तमान में 978 या 979 हो सकता है। यह तीन अंकों का निश्चित भाग है। दूसरा Registration Group Element उस देश, भौगोलिक क्षेत्र या भाषा समूह की पहचान करता है जिसके अंतर्गत ISBN आवंटित हुआ है। तीसरा Registrant Element संबंधित प्रकाशक या इम्प्रिंट की पहचान करता है। चौथा Publication Element उस विशेष शीर्षक, संस्करण और प्रारूप की पहचान करता है। पाँचवाँ और अंतिम अंक Check Digit होता है, जो गणितीय रूप से यह जाँचता है कि बाकी संख्या सही लिखी गई है या नहीं। दूसरे, तीसरे और चौथे तत्व की लंबाई स्थिर नहीं होती। वह इस बात पर निर्भर करती है कि किसी देश, भाषा क्षेत्र या प्रकाशक से कितने प्रकाशनों की अपेक्षा है। बड़े प्रकाशक को अपेक्षाकृत छोटा रजिस्ट्रेंट कोड मिल सकता है ताकि उसके लिए बड़ी संख्या में प्रकाशन पहचान उपलब्ध रह सकें, जबकि छोटे प्रकाशक के कोड की लंबाई अधिक हो सकती है।

अक्सर कहा जाता है कि ISBN का कोई विशेष हिस्सा हमेशा केवल किसी देश को बताता है, जैसे ‘81 भारत है’ या ‘93 भारत है’। लेकिन वास्तविक प्रणाली थोड़ी अधिक सूक्ष्म है। Registration Group किसी देश के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्र या भाषा क्षेत्र को भी दर्शा सकता है। उदाहरण के लिए कुछ समूह पूरे अंग्रेजी भाषी क्षेत्र को दर्शाते हैं, जबकि अन्य किसी खास देश या क्षेत्र के लिए होते हैं। अंतरराष्ट्रीय ISBN एजेंसी स्वयं बताती है कि दूसरा भाग किसी देश, भौगोलिक क्षेत्र या भाषा क्षेत्र की पहचान कर सकता है और इसकी लंबाई एक से पाँच अंकों तक हो सकती है। इसलिए ISBN के अंकों को सामान्य मोबाइल नंबर की तरह स्थिर देश-कोड मान लेना उचित नहीं है।

चेक डिजिट का गणित

ISBN के अंतिम Check Digit के पीछे अत्यंत व्यावहारिक गणित है। आधुनिक 13-अंकीय ISBN में पहले 12 अंकों को क्रमशः 1 और 3 से गुणा किया जाता है, उनके परिणाम जोड़े जाते हैं और उस योग को अगले दस के गुणज तक पहुँचाने के लिए जितना अंक चाहिए। वही अंतिम चेक डिजिट बनता है। इसका उद्देश्य पुस्तक के बारे में कोई नई सूचना देना नहीं। बल्कि ISBN टाइप करते या डेटा प्रणाली में दर्ज करते समय हुई कई सामान्य गलतियों को पकड़ना है। यदि किसी कर्मचारी ने संख्या का एक अंक गलत लिख दिया, तो गणितीय सत्यापन यह संकेत दे सकता है कि ISBN वैध नहीं है। यह छोटा-सा अंतिम अंक इस पूरी वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुराने दस-अंकीय ISBN में अलग गणितीय पद्धति थी और अंतिम चेक डिजिट कभी-कभी “X” भी हो सकता था, जहाँ X दस का प्रतिनिधित्व करता था। 13-अंकीय प्रणाली में अंतिम अंक हमेशा 0 से 9 के बीच रहता है।

कॉपीराइट से अलग है

ISBN और कॉपीराइट को भी अक्सर एक ही चीज समझ लिया जाता है, जबकि दोनों पूरी तरह अलग अवधारणाएँ हैं। ISBN प्राप्त करने से लेखक को अपने लेखन पर कॉपीराइट नहीं मिलता और ISBN के बिना पुस्तक का कॉपीराइट समाप्त नहीं हो जाता। कॉपीराइट लेखक या अधिकारधारक के बौद्धिक संपदा अधिकार से जुड़ा है; ISBN पुस्तक की पहचान और वितरण से जुड़ा है। कोई व्यक्ति स्वयं प्रकाशित पुस्तक को ISBN दिला सकता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पुस्तक में प्रयुक्त हर सामग्री पर उसका कानूनी कॉपीराइट है। उसी प्रकार किसी पुस्तक का ISBN होना उसकी गुणवत्ता, मौलिकता, तथ्यात्मक शुद्धता या साहित्यिक श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। ISBN यह नहीं कहता कि पुस्तक अच्छी है; वह केवल यह कहता है कि यह एक विशिष्ट प्रकाशन है जिसकी पहचान इस संख्या से की जा रही है।

बारकोड और ISBN का संबंध भी इसी तरह समझना चाहिए। ISBN स्वयं संख्या है, जबकि बारकोड उस संख्या का मशीन से पढ़ा जा सकने वाला दृश्य रूप है। किसी पुस्तक के पीछे दिखाई देने वाली काली-सफेद लंबवत रेखाएँ स्कैनर को ISBN तथा संबंधित उत्पाद विवरण पढ़ने में सहायता करती हैं। एक बड़े पुस्तक भंडार में कर्मचारी को प्रत्येक पुस्तक का नाम और प्रकाशक कंप्यूटर में टाइप करने की आवश्यकता नहीं होती; वह बारकोड स्कैन करता है और कंप्यूटर संबंधित पुस्तक का रिकॉर्ड खोल देता है। बिक्री होने पर वही ISBN स्टॉक से एक प्रति घटा सकता है, बिक्री आँकड़ों में जुड़ सकता है और आवश्यकता पड़ने पर नई प्रतियाँ ऑर्डर करने का संकेत दे सकता है। इस तरह ISBN केवल पहचान संख्या नहीं रहा, बल्कि आधुनिक पुस्तक आपूर्ति शृंखला के डेटा तंत्र का केंद्रीय आधार बन गया।

अंतर्राष्ट्रीय संचालन की व्यवस्था

ISBN का अंतरराष्ट्रीय संचालन भी एक बहुस्तरीय व्यवस्था से होता है। ISO ने ISBN को अंतरराष्ट्रीय मानक के रूप में मान्यता दी है और International ISBN Agency को वैश्विक Registration Authority के रूप में नियुक्त किया गया है। वैश्विक एजेंसी पूरे सिस्टम की संरचना और राष्ट्रीय या क्षेत्रीय एजेंसियों के समन्वय का कार्य करती है। विभिन्न देशों में राष्ट्रीय ISBN एजेंसियाँ प्रकाशकों और अन्य पात्र आवेदकों को ISBN ब्लॉक या अलग ISBN आवंटित करती हैं...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

Tags:    

Similar News