पलामू में रामनवमी अखाड़ा का इतिहास बहुत पुराना है। यहां 8 दशक पूर्व से जुलूस निकाला जा रहा है। इसकी शुरुआत 1932 में हरिजन मुहल्ला से हुई थी। ये इलाका अब आदर्शनगर के नाम से जाना जाता है। सारे धर्म के लोग संगठित होकर रामनवमी का त्योहार मनाते है। जो देखने में अनोखा और दर्शनीय होता है।ये भी पढ़ें...इसी दिन शुरू हुआ था रामचरित मानस, आदर्श-मर्यादा का संगम हैं श्रीराम
इस दौरान रांची में मांस-मदिरा पर रोक
रांची में रामनवमी का पर्व यहां की परंपरा की वजह से धार्मिक के साथ सांप्रदायिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत की भी मिसाल है। अकेले रांची में रामनवमी पर लाखों लोग महावीरी पताकाएं लिए जुलूस के रूप में सड़कों पर निकलते हैं। जुलूस का जगह-जगह स्वागत किया जाता है। स्वागत करनेवालों में मुस्लिम और ईसाई भी शामिल होते हैं। इस दौरान शहर में शराब की दुकानें प्रतिबंधित रहती है। मटन -चिकन की भी बिक्री नहीं होती।
मुस्लिम बनाते है पताकाएं
हनुमान जी के चित्रों वाली पताकाओं को बनाने वाले कारीगर मुस्लिम होते है। दो-तीन महीने से लगभग 100 से ज्यादा मुसलमान कारीगर कई महीने इन झंडों को बनाने में ही लगा देते हैं। उनकी बनाई पताकाओं को रामभक्त बड़े उत्साह से लहराते हैं। यहां 250 से 300 फुट तक की पताकाएं बनाई जाती हैं। जुलूस में पताका बड़े से बड़े निकालने की होड़ भी रहती है।
ये भी पढ़ें...अंधकार का विनाश और काल की रक्षा करने वाली है मां कालरात्रि
महावीरी पताकाएं पांच रुपए से लेकर लाखों तक की मिलती हैं। यहां पताकाओं का 20 लाख रुपए से अधिक का बाजार है। शहर में 1929 से महारामनवमी का आयोजन किया जा रहा है। महावीरी झंडा विक्रेता असद बताते हैं कि इस बार सबसे छोटी पताका 30 रुपए में बिक रही है। रांची के हिंदपीढ़ी का ये परिवार हर साल दो-तीन लाख रुपए के झंडे बनाता हैं।