Newstrack Special: कौन थे ‘द लिबरेटर’ साइमन बोलिवर, कैसे उन्होंने दक्षिण अमेरिका का इतिहास बदला?
Simon Bolivar Biography in Hindi: साइमन बोलिवर कौन थे? जानिए कैसे ‘द लिबरेटर’ ने स्पेनी साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष कर दक्षिण अमेरिका की आजादी में निर्णायक भूमिका निभाई और ग्रान कोलम्बिया का सपना देखा।
Simon Bolivar Biography in Hindi
Simon Bolivar Biography in Hindi: साइमन बोलिवर का नाम दक्षिण अमेरिका के इतिहास में लगभग उसी तरह लिया जाता है, जैसे किसी ऐसे सेनानायक का, जिसने सिर्फ युद्ध नहीं जीते बल्कि पूरे महाद्वीप की राजनीतिक दिशा बदल दी। बोलिवर वेनेजुएला में जन्मे, स्पेनी साम्राज्य के विरुद्ध लड़े, अनेक अभियानों का नेतृत्व किया और उन प्रक्रियाओं में केंद्रीय भूमिका निभाई जिनसे आज के वेनेजुएला, कोलम्बिया, इक्वाडोर, पनामा, पेरू और बोलिविया स्पेनी सत्ता से मुक्त हुए। इसी कारण उन्हें स्पेनी भाषा में ‘एल लिबेरतादोर’ यानी मुक्तिदाता कहा गया। बोलिवर सिर्फ तलवार के आदमी नहीं थे. वे एक राजनीतिक विचारक भी थे। उनका सपना था कि स्पेन से मुक्त हुए दक्षिण अमेरिकी प्रदेश छोटे-छोटे परस्पर लड़ते राज्यों में न टूटें, बल्कि एक बड़े और शक्तिशाली संघ के रूप में उभरें। यही सपना आगे चलकर ‘ग्रान कोलम्बिया’ में दिखाई दिया। हालांकि उनके जीवनकाल में ही वह बिखरने लगा।
अमीर परिवार में जन्मे
साइमन जोसे अंतोनियो दे ला संतिसिमा त्रिनिदाद बोलिवर का जन्म 24 जुलाई, 1783 को कराकस में हुआ, जो उस समय स्पेनी साम्राज्य के अधीन वेनेजुएला के कैप्टेंसी जनरल का हिस्सा था। वे एक समृद्ध क्रियोल परिवार से थे, अर्थात यूरोपीय स्पेनी वंश के ऐसे लोग जो अमेरिका में पैदा हुए थे। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो गई। धन-संपत्ति की कमी नहीं थी, लेकिन पारिवारिक जीवन स्थिर नहीं रहा। उनकी शिक्षा में सिमोन रोड्रीगेज़ का गहरा प्रभाव माना जाता है, जिन्होंने उन्हें यूरोपीय प्रबोधन, स्वतंत्रता और गणतांत्रिक विचारों से परिचित कराया। बाद में बोलिवर यूरोप गए, मैड्रिड में रहे और यूरोपीय राजनीति तथा दर्शन को करीब से देखा।
मैड्रिड में उन्होंने मारिया तेरेसा रोड्रीगेज़ देल तोरो से विवाह किया। विवाह के बाद दोनों वेनेजुएला लौटे, लेकिन 1803 में उनकी पत्नी की येलो फीवर से मृत्यु हो गई। यह घटना बोलिवर के जीवन में निर्णायक साबित हुई। वे केवल 19-20 वर्ष के थे और गहरे आघात में चले गए। उन्होंने फिर विवाह नहीं किया। इसके बाद उन्होंने यूरोप की लंबी यात्रा की और फ्रांस तथा इटली में नेपोलियन के उदय को देखा। बोलिवर स्वयं ने बाद के संस्मरणों में रोम के निकट मोंटे साक्रो पर प्रतिज्ञा करने की कथा कही कि वे अपने देश को स्पेनी शासन से मुक्त किए बिना चैन नहीं लेंगे। इस प्रसंग के विवरण बाद के स्रोतों में अलग-अलग रूपों में मिलते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इसी काल तक बोलिवर स्पेनी अमेरिका की स्वतंत्रता को अपना जीवन-लक्ष्य मान चुके थे।
दक्षिण अमेरिका स्पेन के खिलाफ क्यों भड़क रहा था?
बोलिवर को समझने के लिए उस समय का स्पेनी अमेरिका समझना जरूरी है। स्पेन ने सदियों तक अमेरिका के विशाल भाग पर शासन किया था। ऊँचे प्रशासनिक पदों पर प्रायः स्पेन में जन्मे लोग बैठते थे, जबकि अमेरिका में जन्मे यूरोपीय मूल के क्रियोल लोग संपन्न होने के बावजूद सत्ता में बराबरी महसूस नहीं करते थे। व्यापार पर साम्राज्यवादी नियंत्रण, भारी टैक्स और राजनीतिक अधिकारों की कमी से असंतोष था। साथ ही अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, फ्रांसीसी क्रांति और प्रबोधन के विचारों ने नई राजनीतिक कल्पना पैदा की।
फिर 1808 में नेपोलियन ने स्पेन पर आक्रमण किया और राजा फर्डिनांड सप्तम को सत्ता से हटाकर अपने भाई जोसेफ बोनापार्ट को स्पेनी सिंहासन पर बैठाया। इससे पूरे स्पेनी साम्राज्य में वैधता का संकट पैदा हो गया कि अगर असली राजा कैद में है तो अमेरिका पर किसका अधिकार है? इसी संकट ने स्वतंत्रता आंदोलनों के लिए दरवाजा खोल दिया।
वेनेजुएला में 1810 में राजधानी कराकस की स्थानीय सत्ता ने स्पेनी अधिकारियों को चुनौती दी और 1811 में स्वतंत्रता की घोषणा हुई। बोलिवर इस आंदोलन में शामिल थे। लेकिन पहली वेनेजुएलाई गणतांत्रिक व्यवस्था ज्यादा समय नहीं टिक सकी। राजभक्त सेनाओं, आंतरिक विभाजन और अन्य संकटों के कारण 1812 में गणराज्य गिर गया। यहीं से बोलिवर की जिंदगी लगभग लगातार युद्ध में बदल गई।
‘अदम्य अभियान’ और दूसरी गणतंत्र की स्थापना
1813 में बोलिवर ने न्यू ग्रेनाडा (आज के मुख्यतः कोलम्बिया) से वेनेजुएला की ओर एक तेज सैन्य अभियान चलाया। इतिहास में इसे ‘कैम्पान्या अदमिराब्ले’- अदम्य या प्रशंसनीय अभियान कहा जाता है। उन्होंने कई शहर जीतते हुए कराकस में प्रवेश किया और उन्हें ‘एल लिबेरतादोर’ की उपाधि दी गई। इसी दौर में दूसरी वेनेजुएलाई गणतंत्र स्थापित हुआ।
लेकिन दूसरी गणतंत्र भी ज्यादा समय नहीं चली। स्वतंत्रता युद्ध केवल स्पेन बनाम उपनिवेश नहीं रह गया था; उसके भीतर वर्ग, नस्ल और क्षेत्रीय विभाजन भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक नेतृत्व में अधिकतर संपन्न क्रियोल थे, जबकि मिश्रित नस्ल, ग्रामीण और गरीब वर्गों का एक हिस्सा राजभक्त सेनाओं के साथ भी गया। जोसे तोमास बोवेस जैसे राजभक्त नेता ने ल्लानेरो यानी मैदानी घुड़सवारों को स्वतंत्रतावादियों के खिलाफ संगठित किया। 1814 तक बोलिवर को फिर वेनेजुएला छोड़ना पड़ा। यानी जिस व्यक्ति को बाद में लगभग अजेय मुक्तिदाता समझा गया, उसने अपने शुरुआती वर्षों में लगातार हार, निर्वासन और विफल गणराज्य देखे।
पराजित सेनानायक से महाद्वीपीय विचारक तक
1815 में बोलिवर जमैका पहुँचे। यहीं उन्होंने अपना प्रसिद्ध ‘जमैका लेटर’ लिखा। यह केवल राजनीतिक पत्र नहीं था; इसमें उन्होंने स्पेनी अमेरिका के भविष्य की व्यापक कल्पना रखी। उन्होंने अलग-अलग उपनिवेशों की परिस्थितियों का विश्लेषण किया और भविष्यवाणी करने की कोशिश की कि स्वतंत्रता के बाद कौन से राज्य किस रूप में उभर सकते हैं। यूनेस्को इसे बोलिवर की उस समय की अमेरिकी राजनीतिक स्थिति और भविष्य की दृष्टि को व्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज मानता है।
बोलिवर की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि स्पेनी शासन से स्वतंत्रता तो मिल जाए लेकिन कहीं उसके बाद पूरा क्षेत्र आपसी संघर्ष, स्थानीय महत्वाकांक्षा और कमजोर गणराज्यों में न बँट जाए। वे चाहते थे कि स्पेनी अमेरिका के नए देश आपसी सहयोग करें और बड़ी राजनीतिक इकाइयाँ बनाएँ। यही उनका सबसे बड़ा सपना भी था और अंततः सबसे बड़ी विफलता भी।
हैती ने बोलिवर की मदद क्यों की?
बोलिवर की कहानी में हैती की भूमिका अक्सर कम बताई जाती है। फ्रांसीसी दास उपनिवेश से सफल क्रांति द्वारा स्वतंत्र हुआ हैती उस समय दुनिया का पहला स्वतंत्र अश्वेत गणराज्य था। बोलिवर को हैती के राष्ट्रपति अलेक्ज़ांद्र पेतियों से सहायता मिली - हथियार, जहाज, सैनिक और राजनीतिक शरण के रूप में। बदले में पेतियों ने उनसे गुलामी खत्म करने की दिशा में कदम उठाने की अपेक्षा की।
बोलिवर ने बाद में गुलामी मुक्ति की घोषणाएँ कीं, हालांकि स्पेनी अमेरिका में गुलामी की समाप्ति एक लंबी और असमान प्रक्रिया रही। यह पहलू महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती स्वतंत्रता आंदोलन अक्सर संपन्न क्रियोल नेतृत्व के हाथ में था; व्यापक सामाजिक समर्थन पाने के लिए आंदोलन को दासों, मुक्त अश्वेतों, मिश्रित नस्लों और गरीब किसानों को भी साथ लेना पड़ा।
ओरिनोको से एंडीज पार करने तक: वह अभियान जिसने युद्ध पलट दिया
1817 के बाद बोलिवर ने वेनेजुएला के पूर्वी और ओरिनोको क्षेत्र में मजबूत आधार बनाया। फिर 1819 में उन्होंने एक ऐसा सैन्य अभियान चलाया जिसने उन्हें इतिहास के महान साहसिक सेनानायकों में स्थान दिया। उनकी सेना ने बरसाती मैदानों और फिर एंडीज पर्वतमाला को पार कर न्यू ग्रेनाडा पर अप्रत्याशित हमला किया। सैनिक भूखे थे, ठंड से जूझ रहे थे और ऊँचाई पर अनेक लोग मारे गए। लेकिन स्पेनी सेना को यह अंदेशा कम था कि बोलिवर ऐसी परिस्थितियों में पहाड़ पार करेंगे।
7 अगस्त, 1819 की बोयाका की लड़ाई निर्णायक साबित हुई। इसके बाद बोगोटा पर स्वतंत्रतावादियों का नियंत्रण स्थापित हुआ और न्यू ग्रेनाडा में स्पेनी सत्ता को भारी झटका लगा।यह विजय केवल एक युद्ध नहीं थी। इससे बोलिवर को सैनिक, धन और राजनीतिक आधार मिला जिससे पूरे उत्तरी दक्षिण अमेरिका की मुक्ति संभव हुई।
ग्रान कोलम्बिया: बोलिवर का महान सपना
1819 में अंगोस्तुरा कांग्रेस के दौरान रिपब्लिक ऑफ कोलम्बिया बनाने का निर्णय लिया गया, जिसे इतिहासकार बाद में ‘ग्रान कोलम्बिया’ कहते हैं ताकि उसे आज के कोलम्बिया देश से अलग पहचाना जा सके। इसमें आज के वेनेजुएला, कोलम्बिया, पनामा और इक्वाडोर के विशाल क्षेत्र शामिल होने थे। अंगोस्तुरा की मूल व्यवस्था में वेनेजुएला, कुन्दिनामार्का और क्विटो तीन बड़े विभागों की कल्पना की गई और बोलिवर राष्ट्रपति चुने गए। बाद में 1821 की कुकूता कांग्रेस ने इसे अधिक औपचारिक संवैधानिक रूप दिया। बोलिवर का तर्क था कि छोटे-छोटे गणराज्य यूरोपीय शक्तियों और भविष्य की बाहरी महाशक्तियों के सामने कमजोर पड़ेंगे। यदि उत्तरी दक्षिण अमेरिका एक विशाल गणराज्य बन जाए तो आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक शक्ति बढ़ेगी। आज के संदर्भ में इसे किसी हद तक यूरोपीय संघ जैसी क्षेत्रीय एकता की कल्पना से तुलना की जा सकती है, लेकिन बोलिवर का सपना उससे अधिक राजनीतिक रूप से एकीकृत था - वे एक वास्तविक संयुक्त गणराज्य चाहते थे।
अंगोस्तुरा भाषण में लोकतंत्र संबंधी दुविधा
15 फरवरी 1819 को अंगोस्तुरा कांग्रेस के सामने बोलिवर ने अपना प्रसिद्ध भाषण दिया। वे गणतंत्र और स्वतंत्रता के समर्थक थे, लेकिन उन्हें यह भी डर था कि अत्यधिक कमजोर सरकार नए देशों को अराजकता में धकेल सकती है। उन्होंने मजबूत कार्यपालिका और स्थिर संस्थाओं की वकालत की। उनके कुछ प्रस्तावों में आजीवन राष्ट्रपति और वंशानुगत सीनेट जैसे विचार भी थे, जिन्हें कांग्रेस ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। यहीं बोलिवर के राजनीतिक व्यक्तित्व का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। वे स्पेनी राजशाही के खिलाफ स्वतंत्रता के योद्धा थे, लेकिन पूर्ण बहुमतवादी लोकतंत्र के प्रति भी आशंकित थे। उनका विश्वास था कि सदियों की औपनिवेशिक व्यवस्था से निकले समाज में मजबूत केंद्रीय सत्ता आवश्यक होगी।
इसलिए उन्हें आधुनिक अर्थों में केवल ‘उदार लोकतंत्रवादी’ कहना सही नहीं है। वे गणतंत्रवादी और औपनिवेशिक शासन-विरोधी थे, लेकिन साथ ही एक मजबूत केंद्रीकृत राज्य के समर्थक भी थे।
वेनेजुएला की निर्णायक मुक्ति
1821 में काराबोबो की लड़ाई ने वेनेजुएला में स्पेनी शक्ति को निर्णायक रूप से तोड़ दिया। इसके बाद कराकस और देश का अधिकांश हिस्सा स्वतंत्रता पक्ष के नियंत्रण में आ गया।इसके बाद बोलिवर ने ध्यान दक्षिण की ओर मोड़ा। उनके सबसे भरोसेमंद सेनानायकों में अंतोनियो जोसे दे सूक्रे का नाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सूक्रे ने 1822 में पिचिंचा की लड़ाई में विजय हासिल की, जिसके बाद क्विटो (आज का इक्वाडोर) स्पेनी शासन से मुक्त हुआ और ग्रान कोलम्बिया में शामिल हुआ।
यहाँ एक और ऐतिहासिक दृश्य सामने आता है। जुलाई, 1822 में गुआयाकिल में बोलिवर की मुलाकात दक्षिणी दक्षिण अमेरिका के महान मुक्तिदाता जोसे दे सैन मार्टिन से हुई। सैन मार्टिन अर्जेंटीना और चिली की स्वतंत्रता में केंद्रीय भूमिका निभाने के बाद पेरू पहुँचे थे। दोनों की बंद कमरे में हुई बातचीत का पूरा विवरण आज भी रहस्य है। इसके बाद सैन मार्टिन राजनीतिक-सैन्य मंच से हटते गए और पेरू की अंतिम मुक्ति का भार बोलिवर तथा उनके सेनानायकों पर आ गया।
पेरू और आखिरी निर्णायक लड़ाइयाँ
स्पेनी साम्राज्य की दक्षिण अमेरिकी शक्ति का सबसे मजबूत गढ़ पेरू था। 1823 में पेरू की राजनीतिक नेतृत्व व्यवस्था ने बोलिवर को बुलाया। वे वहाँ पहुँचे और स्वतंत्रता सेनाओं को पुनर्गठित किया।6 अगस्त,1824 की जुनिन की लड़ाई में स्वतंत्रता सेनाओं ने महत्वपूर्ण विजय हासिल की। इसके बाद बोलिवर ने सैन्य संचालन का बड़ा हिस्सा सूक्रे को सौंपा।
9 दिसंबर, 1824 को अयाकूचो की लड़ाई हुई। सूक्रे के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेना ने स्पेनी वाइसरॉय की मुख्य सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। अयाकूचो को सामान्यतः दक्षिण अमेरिका में स्पेन की महाद्वीपीय सैन्य सत्ता के निर्णायक अंत के रूप में देखा जाता है।इस विजय के बाद ऊपरी पेरू का क्षेत्र भी स्वतंत्र हुआ।
बोलिविया का नाम बोलिवर पर क्यों पड़ा?
ऊपरी पेरू ने 1825 में स्वतंत्र राष्ट्र बनने का फैसला किया। नए देश ने अपने महान मुक्तिदाता के सम्मान में पहले स्वयं को ‘रिपब्लिक ऑफ बोलिवर’ और बाद में बोलिविया कहा। दुनिया में बहुत कम लोगों के नाम पर पूरे देश का नाम पड़ा है। बोलिवर उन्हीं में से एक हैं। बोलिवर ने नए देश के लिए एक संविधान का मसौदा भी तैयार किया। उसमें आजीवन राष्ट्रपति जैसी व्यवस्था थी, जिससे उनके राजनीतिक विचारों पर आलोचना और बढ़ी।
यहीं उनके जीवन का दूसरा बड़ा विरोधाभास उभरता है - जिस व्यक्ति ने राजाओं को हटाने के लिए युद्ध किया, वह स्वयं ऐसे मजबूत राष्ट्रपति की कल्पना करने लगा जो लगभग जीवन भर सत्ता में रहे। उनका तर्क था कि अस्थिर और विखंडित समाजों को मजबूत नेतृत्व चाहिए। आलोचकों को इसमें गणतंत्र के भीतर छिपी नई निरंकुशता दिखाई देती थी।
क्या साइमन बोलिवर तानाशाह बन गए थे?
इस प्रश्न का उत्तर सीधा हाँ या नहीं में देना इतिहास को बहुत सरल कर देगा। उन्होंने चुनावी और संवैधानिक संस्थाओं का समर्थन किया, अनेक बार सत्ता कांग्रेस को सौंपने की बात की और व्यक्तिगत राजशाही स्वीकार नहीं की। लेकिन अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे थे कि अत्यधिक संघवाद और क्षेत्रीय स्वायत्तता ग्रान कोलम्बिया को तोड़ देगी।
1828 में ग्रान कोलम्बिया में गंभीर राजनीतिक संकट के बाद बोलिवर ने तानाशाही शक्तियाँ ग्रहण कीं। उसी वर्ष उनके खिलाफ हत्या का प्रयास भी हुआ, जिससे वे बाल-बाल बचे। उनकी साथी मानुएला साएंज ने उन्हें बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में उन्हें ‘मुक्तिदाता की मुक्तिदाता’ जैसी उपाधि मिली।
इस दौर में बोलिवर की छवि गंभीर रूप से विभाजित हो गई। समर्थकों के लिए वे देश को टूटने से बचाने वाले नेता थे; विरोधियों के लिए वे स्वतंत्रता के आदर्श से हटकर निरंकुशता की ओर बढ़ रहे थे।
इसलिए बोलिवर को केवल लोकतंत्र का नायक या केवल तानाशाह, दोनों में से किसी एक खांचे में बंद करना ठीक नहीं। वे स्वतंत्रता और व्यवस्था के बीच झूलता हुआ एक जटिल गणतंत्रवादी नेता थे।
ग्रान कोलम्बिया क्यों टूट गया?
यह बोलिवर की सबसे बड़ी राजनीतिक हार थी।वेनेजुएला, न्यू ग्रेनाडा और इक्वाडोर भौगोलिक रूप से विशाल और कठिन भूभाग वाले क्षेत्र थे। उस समय रेल, टेलीग्राफ या आधुनिक सड़कें नहीं थीं। कराकस से बोगोटा या क्विटो तक शासन चलाना बेहद कठिन था। इसके ऊपर स्थानीय अभिजात वर्ग अपनी-अपनी सत्ता चाहता था। वेनेजुएला के नेता जोसे अंतोनियो पाऐज़ मजबूत केंद्रीय शासन से असंतुष्ट थे। न्यू ग्रेनाडा में फ्रांसिस्को दे पाउला सांतांदेर और बोलिवर के बीच संविधान, संघवाद तथा केंद्रीकरण को लेकर गंभीर मतभेद बढ़े।
बोलिवर चाहते थे एक मजबूत केंद्र। उनके कई विरोधी चाहते थे राज्यों या प्रांतों को अधिक स्वायत्तता। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक मतभेद और राजनीतिक विचारधारा सब साथ जुड़ गए।1830 तक वेनेजुएला और इक्वाडोर अलग होने लगे। जिस विशाल राज्य के सहारे बोलिवर पूरे दक्षिण अमेरिका को शक्ति बनाना चाहते थे, वह उनके सामने टूट रहा था। ग्रान कोलम्बिया का औपचारिक जीवन बहुत छोटा रहा और अंततः उसके अवशेषों से अलग-अलग राष्ट्र बने।
बोलिवर का अंतिम समय इतना दुखद क्यों था?
1820 के दशक के मध्य में बोलिवर शायद दक्षिण अमेरिका के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति थे। कुछ ही वर्षों बाद वे राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ गए। 1830 में उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया और यूरोप जाने का विचार किया। लेकिन उनका स्वास्थ्य बहुत खराब था। वे उत्तरी कोलम्बिया के सांता मार्ता पहुँचे और 17 दिसंबर 1830 को केवल 47 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु का पारंपरिक कारण तपेदिक माना गया है। वे उस समय न तो किसी विजय समारोह में थे, न विशाल संयुक्त अमेरिका के राष्ट्रपति बल्कि अपने सबसे बड़े राजनीतिक सपने को टूटते देख चुके एक बीमार और निराश नेता थे।
उनकी मृत्यु के आसपास इतिहास में एक प्रसिद्ध निराशावादी वाक्य उनसे जोड़ा जाता है कि अमेरिका में काम करना ‘समुद्र को जोतने’ जैसा था। उनके अंतिम विचारों के कई उद्धरणों की प्रामाणिकता पर इतिहासकार सावधानी रखते हैं, लेकिन यह निर्विवाद है कि अंतिम समय तक वे स्पेनी अमेरिका के राजनीतिक विखंडन से अत्यंत निराश थे।
फिर भी उन्हें ‘द लिबरेटर’ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि बोलिवर की सैन्य उपलब्धि असाधारण थी। उन्होंने वर्षों तक ऐसे भूभाग में अभियान चलाए जहाँ आधुनिक सेना चलाना भी मुश्किल होता जहाँ उष्णकटिबंधीय जंगल, दलदली मैदान, विशाल नदियाँ और हजारों मीटर ऊँचे एंडीज पर्वत थे। वे बार-बार पराजित हुए, निर्वासन में गए और फिर सेना बनाकर लौटे। सबसे महत्वपूर्ण यह कि उनका अभियान केवल अपने जन्मस्थान वेनेजुएला तक सीमित नहीं रहा।
उनकी राजनीतिक-सैन्य भूमिका वेनेजुएला से न्यू ग्रेनाडा, क्विटो, पेरू और ऊपरी पेरू तक फैली। उनके सेनानायक सूक्रे सहित अनेक सहयोगियों ने निर्णायक युद्ध लड़े। इसलिए यह कहना गलत होगा कि बोलिवर ने ‘अकेले छह देश मुक्त कर दिए’।स्वतंत्रता एक विशाल सामूहिक संघर्ष था जिसमें हजारों स्थानीय सैनिक, महिलाएँ, आदिवासी, अश्वेत और मिश्रित नस्लों के लोग, क्षेत्रीय नेता तथा अन्य सेनापति शामिल थे। लेकिन उस पूरे उत्तरी-दक्षिण अमेरिकी स्वतंत्रता अभियान को एक महाद्वीपीय रणनीतिक दिशा देने वाला प्रमुख व्यक्ति बोलिवर था।
क्या वे दक्षिण अमेरिका के जॉर्ज वॉशिंगटन थे?
उनकी तुलना अक्सर जॉर्ज वॉशिंगटन से की जाती है, लेकिन दोनों का संदर्भ अलग था। वॉशिंगटन ने तेरह उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका बनाने में भूमिका निभाई और आठ वर्ष राष्ट्रपति रहकर स्वेच्छा से सत्ता छोड़ी। अमेरिकी संघ बच गया।बोलिवर का भूभाग कहीं अधिक बड़ा, भौगोलिक रूप से कठिन और सामाजिक रूप से विभाजित था। उन्होंने भी संयुक्त महाद्वीपीय गणराज्य बनाने की कोशिश की, लेकिन वह टूट गया। इस दृष्टि से बोलिवर की कहानी वॉशिंगटन की विजय और एक अपूर्ण नेपोलियन-जैसी त्रासदी दोनों का मिश्रण दिखाई देती है, असाधारण सैन्य सफलता, विशाल राजनीतिक सपना और अंत में उसका विघटन।
क्या वे नेपोलियन से प्रभावित थे?
निश्चित रूप से उन्होंने नेपोलियन को देखा और उससे प्रभावित भी हुए, लेकिन उनका संबंध जटिल था। युवा बोलिवर ने नेपोलियन की प्रतिभा की प्रशंसा की, लेकिन जब नेपोलियन ने स्वयं को सम्राट बनाया तो बोलिवर को उसमें गणतांत्रिक आदर्श से विश्वासघात भी दिखाई दिया। फिर भी उनके अपने जीवन में विडंबना यह रही कि बाद में उनके विरोधी उन्हीं पर आरोप लगाने लगे कि वे दक्षिण अमेरिका के नेपोलियन बनना चाहते हैं। बोलिवर ने राजमुकुट नहीं पहना और औपचारिक राजशाही स्थापित नहीं की, लेकिन उनका मजबूत केंद्रीय राष्ट्रपति का मॉडल विरोधियों को भयभीत करता था।
दासता और नस्ल के प्रश्न पर बोलिवर कितने प्रगतिशील थे?
यह भी सीधी कहानी नहीं है। वे स्वयं एक संपन्न दास-मालिक क्रियोल परिवार से आए थे। बाद में स्वतंत्रता संघर्ष की दिशा और हैती के प्रभाव ने उन्हें दास मुक्ति के अधिक स्पष्ट समर्थन की ओर धकेला। उन्होंने 1816 से दासों की मुक्ति संबंधी घोषणाएँ कीं और दासता समाप्त करने का समर्थन किया। फिर भी उनके जीवनकाल में उनके द्वारा नियंत्रित सभी क्षेत्रों में तत्काल और पूर्ण दासता समाप्त नहीं हुई। अलग-अलग नए राष्ट्रों ने इसे अलग समय पर खत्म किया। इसलिए उन्हें आधुनिक अर्थ में शुरू से ही दासता-विरोधी सामाजिक क्रांतिकारी कहना गलत होगा। वे अपने समय और संघर्ष के साथ बदले, और अंततः दासता को स्वतंत्र गणराज्य के साथ असंगत मानने की दिशा में गए।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
स्वतंत्रता में वे असाधारण रूप से सफल रहे; एकीकृत राष्ट्र निर्माण में असफल।स्पेनी सैन्य सत्ता लगभग पूरे उत्तरी और पश्चिमी दक्षिण अमेरिका से समाप्त हो गई। यह उपलब्धि स्थायी रही।लेकिन उनका दूसरा सपना, स्पेनी अमेरिका को बड़े स्थिर संघों में बाँधकर अमेरिकी और यूरोपीय महाशक्तियों के बराबर करना कभी पूरा नहीं हुआ। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक त्रासदी है।उन्होंने साम्राज्य तोड़ दिया। लेकिन साम्राज्य की जगह जिस राजनीतिक एकता की कल्पना की थी वह नहीं बना सके।
यदि ग्रान कोलम्बिया बच जाता तो क्या होता?
यह इतिहास का आकर्षक काल्पनिक प्रश्न है। यदि आज का कोलम्बिया, वेनेजुएला, इक्वाडोर और पनामा एक देश बने रहते तो उसका क्षेत्रफल बहुत बड़ा होता, कैरेबियन और प्रशांत दोनों महासागरों तक पहुँच होती और तेल, खनिज, कृषि तथा सामरिक भूगोल के कारण वह आधुनिक विश्व की बड़ी शक्तियों में शामिल हो सकता था।लेकिन यह केवल संभावना है। उस समय संचार की कठिनाई, क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय सत्ता इतनी मजबूत थी कि इस विशाल संघ को बनाए रखना अत्यंत कठिन था। बोलिवर ने समस्या सही पहचानी थी कि छोटे राज्यों का विखंडन बाहरी शक्तियों के सामने कमजोरी पैदा करेगा लेकिन उसका समाधान, अत्यधिक केंद्रीकृत सत्ता, अपने भीतर दूसरी समस्याएँ पैदा कर रहा था।
आज उनके नाम पर क्या-क्या है?
उनकी विरासत आज भी पूरे लैटिन अमेरिका में दिखाई देती है। बोलिविया देश का नाम उन्हीं से है। वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवार कहलाती रही है। अनगिनत शहरों में उनके नाम पर चौक, सड़कें और स्मारक हैं। कई देशों में वे राष्ट्रीय नायक माने जाते हैं। वेनेजुएला का आधिकारिक नाम भी Bolivarian Republic of Venezuela है। आधुनिक वेनेजुएलाई राजनीति में ह्यूगो चावेज़ ने बोलिवर की विरासत को अपनी ‘बोलिवेरियन क्रांति’ की वैचारिक पहचान बनाया। लेकिन यह समझना चाहिए कि उन्नीसवीं सदी के बोलिवर को सीधे किसी आधुनिक वाम या दक्षिणपंथी विचारधारा में रखना कठिन है; अलग-अलग राजनीतिक धाराओं ने समय-समय पर उन्हें अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।यही उनकी ऐतिहासिक शक्ति का संकेत भी है, बोलिवर केवल एक व्यक्ति नहीं रहे, वे राजनीतिक प्रतीक बन गए।
क्या वास्तव में छह देशों की आज़ादी का श्रेय उन्हें दिया जा सकता है?
आम तौर पर कहा जाता है कि बोलिवर ने छह देशों - वेनेजुएला, कोलम्बिया, इक्वाडोर, पनामा, पेरू और बोलिविया - को मुक्त किया। इसमें कुछ सरलीकरण है। पनामा उस समय न्यू ग्रेनाडा/ग्रान कोलम्बिया की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा था; पेरू की स्वतंत्रता में सैन मार्टिन और अन्य नेताओं की भी बड़ी भूमिका थी; इक्वाडोर की निर्णायक पिचिंचा विजय सूक्रे ने हासिल की; बोलिविया की स्वतंत्रता में भी सूक्रे केंद्रीय सेनानायक थे। इसलिए अधिक सटीक बात होगी कि बोलिवर उस विशाल स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोच्च राजनीतिक-सैन्य नेताओं में थे जिसने इन आधुनिक राष्ट्रों के क्षेत्रों से स्पेनी शासन समाप्त किया। यह सामूहिक मुक्ति थी, लेकिन बोलिवर उसका सबसे पहचानने योग्य चेहरा बने।
दक्षिण अमेरिका का इतिहास उन्होंने आखिर बदला कैसे?
सबसे पहले उन्होंने स्पेनी साम्राज्य की उस धारणा को तोड़ा कि उसके दक्षिण अमेरिकी उपनिवेश स्थायी हैं। उनकी सेनाओं की जीत के बाद स्पेन की महाद्वीपीय सत्ता तेजी से सिकुड़ गई। दूसरा, उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को स्थानीय विद्रोह से महाद्वीपीय परियोजना में बदलने की कोशिश की। वे वेनेजुएला की मुक्ति पर नहीं रुके; उनके अभियान दक्षिण की ओर बढ़ते गए। तीसरा, उन्होंने नए राष्ट्रों के सामने यह प्रश्न रखा कि स्वतंत्रता के बाद शासन कैसा होगा - संघीय या केंद्रीकृत? कमजोर राष्ट्रपति या मजबूत कार्यपालिका? पूर्ण लोकतंत्र या नियंत्रित गणराज्य? ये बहसें आज तक लैटिन अमेरिका की राजनीति में बार-बार लौटती हैं।
चौथा, उन्होंने लैटिन अमेरिकी एकता की ऐसी कल्पना छोड़ी जो उनके बाद कभी पूरी तरह गायब नहीं हुई। 1826 में उन्होंने पनामा कांग्रेस बुलाने की कोशिश की, जिसका उद्देश्य नवस्वतंत्र अमेरिकी गणराज्यों के बीच राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग स्थापित करना था। यह प्रयोग सफल नहीं हुआ, लेकिन बाद की पैन-अमेरिकी और लैटिन अमेरिकी एकता की कल्पनाओं का प्रारंभिक पूर्वज माना जाता है।और पाँचवाँ, उनका जीवन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेतावनी भी छोड़ गया - साम्राज्य से स्वतंत्र होना और स्थिर लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाना दो अलग काम हैं।
युद्ध जीतने के बाद उन्हें लगा था कि सबसे कठिन काम पूरा हो गया। अंत में उन्होंने देखा कि असली कठिनाई शायद उसके बाद शुरू हुई - क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा, जातीय और वर्गीय विभाजन, सैन्य नेताओं की प्रतिस्पर्धा, कमजोर संस्थाएँ और सत्ता के केंद्रीकरण की दुविधा।साइमन बोलिवर इसलिए महान हैं कि उन्होंने असंभव दिखने वाले साम्राज्य को चुनौती देकर दक्षिण अमेरिका के विशाल हिस्से की स्वतंत्रता में निर्णायक भूमिका निभाई। और वे इसलिए त्रासद ऐतिहासिक व्यक्तित्व भी हैं कि जिस राजनीतिक एकता को वे स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते थे, वही उनकी आँखों के सामने टूट गई।
उनकी सबसे बड़ी विजय थी स्पेनी साम्राज्य को पीछे हटाना। और उनकी सबसे बड़ी हार थी मुक्त हुए लोगों को एक संयुक्त राजनीतिक राष्ट्र में न बाँध पाना।और शायद इसी विरोधाभास के कारण दो सौ वर्ष बाद भी साइमन बोलिवर केवल इतिहास की किताब का सेनापति नहीं हैं। वे आज भी लैटिन अमेरिका में इस प्रश्न के प्रतीक हैं कि स्वतंत्रता मिल जाने के बाद उसका इस्तेमाल किस तरह का समाज और किस तरह का राज्य बनाने में किया जाए।