ग्रामीण क्षेत्र में रात्रि विश्राम: प्रशासन, गांव और मानवीय रिश्तों की यादें
Indian Village Story: 1990 के दशक में राजस्व अधिकारियों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में किए गए रात्रि-प्रवास पर आधारित एक संस्मरण-शैली का हिंदी लेख, जो ग्रामीण जीवन, प्रशासनिक अनुशासन और शासन-प्रशासन में मानवीय संबंधों को दर्शाता है।
Indian Village: बात बहुत पुरानी है। संभवतः वर्ष 1992 या 1993 की होगी। उस समय एम. के. राउत साहब सतना के कलेक्टर थे और मेरी पदस्थापना अमरपाटन तहसील में थी। राउत साहब का स्पष्ट और सख्त निर्देश था कि सभी राजस्व अधिकारी प्रत्येक माह अपने प्रभार क्षेत्र के गांवों में कम से कम तीन रात्रि विश्राम अनिवार्य रूप से करेंगे।
आज के समय में चलदूरभाष (मोबाइल) से वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणाली (जीपीएस) स्थान भेजना, तत्काल तस्वीर भेजना या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से अपनी उपस्थिति प्रमाणित करना सरल है, लेकिन उस समय ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। तब अनुशासन, वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश और प्रशासनिक निष्ठा ही सबसे बड़ा प्रमाण होते थे। सभी राजस्व अधिकारी अपने प्रभार क्षेत्र में भ्रमण और रात्रि विश्राम की सूचना कलेक्टर कार्यालय को भेजते थे और वास्तव में गांवों में रुकते भी थे।
कलेक्टर के स्पष्ट निर्देश थे कि रात्रि विश्राम किसी निजी घर में नहीं, बल्कि शासकीय भवन, विद्यालय, पंचायत भवन या किसी सार्वजनिक स्थान पर ही किया जाए। यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि अधिकारी की निष्पक्षता और प्रशासनिक गरिमा बनी रहे।
इसी क्रम में मैं अमरपाटन तहसील के मौहारी-कटरा वृत्त के ग्राम लामी करही में भ्रमण और रात्रि विश्राम के लिए गया। वहां रुकने के लिए एक माध्यमिक शाला भवन था। भवन में कुछ कमरे थे और चारों ओर आम के पेड़ लगे हुए थे। दिनभर राजस्व संबंधी काम निपटाने, शिकायतें सुनने और उनका निराकरण करने में समय बीत गया। शाम को भोजन के बाद लगभग सात बजे अंधेरा हो गया और सोने की तैयारी होने लगी।
गर्मी का मौसम था, लेकिन आम के बाग में ठंडी हवा चल रही थी। जिस स्थान पर रात्रि विश्राम करना था, वहां बिजली और पंखे की व्यवस्था नहीं थी। उस समय अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में रात में बिजली नहीं आती थी। ऐसे में स्कूल के कमरे के भीतर सोने के बजाय खुले में पेड़ के नीचे सोना अधिक अच्छा लगा। बिस्तर लगा दिया गया। ग्राम कोटवार ने बिस्तर के आसपास पानी का छिड़काव कर दिया, जिससे मिट्टी की सोंधी महक और वातावरण की ठंडक मन को सुख देने लगी।
रात में गांव के कई किसान आसपास बैठे थे। वे अलग-अलग विषयों पर चर्चा कर रहे थे। उन्हीं में एक किसान मेरे पास बैठा बड़े ध्यान से सारी बातें सुन रहा था। मैंने देखा कि सभी ग्रामीणों के चले जाने के बाद वह सबसे अंत में उठा। जाते-जाते उसने कहा कि वह सुबह साढ़े पांच बजे, उजाला होने से पहले, फिर आ जाएगा। सचमुच, अगली सुबह साढ़े पांच बजे वह सज्जन एक लोटा पानी लेकर मेरे उठने से पहले ही शाला भवन में उपस्थित थे।
मैंने उनसे कहा, “आपने क्यों कष्ट किया? मैं तैयार होकर लगभग आठ बजे आपको बुला लेता।”
वे बोले, “नहीं साहब, आप तो मेरे मेहमान हैं। मेरे साथ चलिए।”
इसके बाद वे गांव के एक छोर पर स्थित नदी की ओर लोटा लेकर आगे-आगे चलने लगे। उनके पीछे मैं था और मेरे पीछे कोटवार। कुछ दूर जाकर उन्होंने हाथ से इशारा किया और बताया कि उस ओर जंगल है और नदी किनारे आड़ भी है। उन्होंने कहा कि मैं लोटा लेकर उधर चला जाऊं। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और आगे चला गया।
जब मैं लौटा, तो उन्होंने मेरे हाथ से लोटा फिर ले लिया और फिर आगे-आगे चलने लगे। मुश्किल से दो सौ कदम चलने के बाद उन्होंने कहा, “हुजूर, यह मेरा खेत है। खेत पर आने का रास्ता ऐसा है और सामने वाला किसान रास्ता नहीं दे रहा है। मौका-मुआयना कर लिया जाए।”
मैंने पूछा, “क्या आपने आवेदन दिया है?”
वे बोले, “हुजूर, आवेदन दिया है। इसी कारण आपको मौका दिखाने लाया हूं।”
यह सुनकर मुझे हंसी भी आई और उनकी चतुराई देखकर अच्छा भी लगा। उन्होंने मेरी सेवा भी कर दी और अपनी समस्या का मौका-मुआयना भी करा दिया। गांव की सहज बुद्धि और प्रशासन से संवाद का यह तरीका आज भी याद रह जाता है।
एक अन्य ग्राम में रात्रि विश्राम के लगभग पंद्रह दिन बाद कलेक्टर कार्यालय से मेरे विरुद्ध एक लंबी शिकायत जांच के लिए प्राप्त हुई। शिकायत में लिखा था कि अमुक अधिकारी गांव आए और उन्होंने ऐसा-वैसा व्यवहार किया। मैंने हल्का पटवारी को बुलाया और पूछा कि उस दिन तो कोई शिकायत नहीं आई थी, फिर यह शिकायत किसने कर दी।
पटवारी ने शिकायत देखते ही कहा, “हुजूर, गांव के एक प्रभावशाली व्यक्ति शाम को आपको भोजन के लिए बुला रहे थे। आपने मना कर दिया था कि आप उनके यहां भोजन करने नहीं जाएंगे। यही शिकायत उन्होंने कर दी है। वे गांव में प्रभाव रखते हैं। आपके उनके यहां भोजन न करने से उनका दबदबा कम हो गया, इसलिए उन्होंने शिकायत कर दी।”
मैंने पूछा, “अब क्या करना है?”
पटवारी बोले, “हुजूर, कुछ नहीं। पंद्रह दिन बाद एक दौरा और लगा लेंगे। उनके घर चलेंगे और उनके यहां पूरी-सब्जी खा लेंगे। उनका कोई काम नहीं है। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप उनके यहां भोजन कर लें।”
खैर, लगभग एक महीने बाद दोबारा उस गांव जाना हुआ। पटवारी जी ने उन्हें सूचना दे दी कि हम उनके घर भोजन करने आ रहे हैं। हम लोगों ने उनके यहां भोजन किया। उस दिन वे सज्जन इतने प्रसन्न थे कि पूछिए मत। सारे गिले-शिकवे दूर हो गए। अगले दिन वे स्वयं कलेक्टर कार्यालय गए और अपनी शिकायत वापस ले ली।
रात्रि विश्राम से जुड़ा एक और प्रसंग याद आता है। एक गांव में रात्रि विश्राम हुआ। पटवारी साहब आए और बोले, “हुजूर, भोजन तैयार हो गया है, मगर बुरा न मानिएगा, मुर्गा नहीं बन पाया। आपसे पहले जो साहब रहे, उनके कारण आसपास के चार-छह गांवों में मुर्गा-मुर्गी बचे ही नहीं।”
मैंने हंसकर कहा, “पटवारी जी, मैं तो शुद्ध घास-फूस खाने वाला आदमी हूं। आप चिंता मत करिए।”
ग्रामीण क्षेत्र में रात्रि विश्राम केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था। वह गांव को समझने, लोगों की जरूरतें जानने, उनकी चतुराई, आत्मीयता और शिकायतों की प्रकृति को निकट से देखने का अवसर भी था। ऐसे अनुभव बताते हैं कि प्रशासन केवल फाइलों से नहीं चलता। वह गांव की धूल, किसानों की बातों, कोटवार की उपस्थिति, पटवारी की समझ और अधिकारी के व्यवहार से भी बनता है।
बाकी फिर कभी।
(साभार- डॉ. रजनीश श्रीवास्तव का संस्मरण)