Mothers Day Special: अतीत से जुड़कर भविष्य की ओर देखने का दिन
Mothers Day Special: कोई कहेगा कि मां ने तो हमें जीवन दिया है तो मां के लिए सिर्फ एक दिन ही क्यों? कोई कहेगा कम से कम इस बहाने ही सही हमें अपनी मां की याद तो आती है
Mothers Day Special
Mothers Day Special: आज मदर्स डे है। यूं तो यह एक ऐसा विषय है कि जब भी उसकी बात चले तो सबकी अपनी-अपनी राय होगी। कोई कहेगा कि मां ने तो हमें जीवन दिया है तो मां के लिए सिर्फ एक दिन ही क्यों? कोई कहेगा कम से कम इस बहाने ही सही हमें अपनी मां की याद तो आती है, औपचारिकता के लिए ही सही। आज सोशल मीडिया मां से संबंधित पोस्ट से भरा होगा। हर बेटा -बेटी अपनी-अपनी मां के साथ अपनी फोटो लगा रहा होगा। कोई उससे जुड़ी अपनी भावनात्मक पोस्ट लिख रहा होगा। मैं एक मां भी हूं और खुद एक बेटी भी हूं। जब इन दोनों के बीच एक तरफ बेटी होने का और एक तरफ मां होने का लेखा-जोखा देखती हूं तो लगता है कि वाकई बच्चे बहुत कुछ अपनी मां जैसे हो जाते हैं, भले ही उस समय न हो लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनमें बहुत सी आदतें, बर्ताव अपनी मां के समान आने लग जाता है। हो सकता है जिन बातों पर हम कभी अपनी मां से असहमत होते थे लेकिन जब खुद मां बनते हैं तब स्वयं भी वही सब करने लग जाते हैं जिन विषयों पर मां से असहमत हुआ करते थे। जब पीछे की ओर मुड़कर देखते हैं तो कुछ स्मृतियां चमकने लगती हैं, आंखों के सामने और उस अतीत से जुड़कर जब बच्चों की तरफ देखते हैं तो भविष्य की ओर नजरें चली जाती हैं।
जिंदगी कभी भी किसी को एक साथ नहीं मिलती है, हमेशा छोटे-छोटे टुकड़ों में ही मिलती है और यह जिंदगी एक पूरे म्यूजियम के जैसे होती है, जहां पर रखी हर चीज की अपनी कहानी होती है, इसी तरह से जिंदगी के हर दिन की अपनी एक कहानी होती है, कुछ हम भूल जाते हैं तो कुछ हमारे जेहन में अंदर तक बैठ जाती है। हमारी अपनी मां हमारे अंदर खामोशी से चल रही होती है। एक मां के अपने प्रतिरोध, अपने नकारात्मक- सकारात्मक भाव, किसी काम को करने के अपने गुण, किसी विशेष विषय या काम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता, अपनी सोच का बच्चे पर वाकई बहुत प्रभाव पड़ता है। अब जबकि परिवार सीमित होते जा रहें हैं तो उसके ऊपर उसके परिवार की अन्य महिला रिश्तेदार , अगर हैं तो, का क्या प्रभाव पड़ेगा या पड़ता है यह अब आगे आने वाली पीढ़ियों में हमें ज्यादा मुखर होकर दिखाई देगा। पर हमारी वाली पीढ़ी तक हमारे अपने स्वभाव, संस्कृति और चेतना पर अपनी- अपनी मां के साथ कहीं दादी, कहीं नानी, कहीं मामी, कहीं मौसी, कहीं चाची, कहीं ताई, कहीं बुआ या बड़ी बहन- भाभी के साथ-साथ अपनी सीनियर रहीं या साथ पढ़ी लड़कियों का भी कुछ प्रभाव जरूर पड़ा है। दरअसल अपने अंदर उस प्रभाव को ढूंढना ही और उसको उचित सम्मान देना ही मदर्स डे का सही औचित्य हो सकता है।
मन जब -जब पीछे की ओर मुड़ता है तब लगता है कि खुद को समझना कितना मुश्किल होता है तो हम अपनी मां को कैसे समझ सकते हैं। कभी-कभी लगता है कि मां को अधिक देवत्व भाव प्रदान कर देना उसको, उसकी देह को, उसकी भावनाओं को अधिक बंधन में बांध देना होता है। आज भी यह सुनना एक बहुत ही सामान्य सी बात है कि एक मां होने के कारण किसी भी मां की पहली प्राथमिकता उसके बच्चे होने चाहिए। पर फिर यह सोचने को भी तैयार हो जाती है कि इस दिमाग के कोने में कहीं बैठा एक और दिमाग कहता है कि नहीं। आखिर यह खुली आंखों से सपना देखने वाली महिलाओं को ही सपने न देख पाने वाला चश्मा क्यों पहना दिया जाता है?
यह अभी दो-चार दिन से ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब केरल में कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने जबरदस्ती अपने ही दल की एक नवनिर्वाचित महिला विधायक को गले लगाने की कोशिश की, उसके विरोध करने के बावजूद। हम चाहे किसी भी सभ्यता का इतिहास खंगाल ले, हम चाहे जितने भी विकसित होते जाएं पर महिलाओं को आहत करने वाली घटनाएं हमेशा सामने आती ही रहती हैं । एक महिला पत्रकार ने बिहार के सिवान जिले में आर्केस्ट्रा डांसर्स के पीछे के काले सच को जानने के लिए, उनके बीच जाकर 5 दिन का स्टिंग ऑपरेशन किया। नेपाल और बिहार के गरीब, अशिक्षित क्षेत्रों से लड़कियों को तस्करी करके वहां लाया जाता, उन्हें जल्दी बड़े होने के इंजेक्शन दिए जाते , उन्हें अलग-अलग जगह बेचा जाता और उन्हें यह समझने पर और जानने पर और सीखने पर मजबूर कर दिया जाता कि वह जितना अधिक स्वयं का प्रदर्शन करेंगी उतना ही अधिक वह रुपए कमा सकेंगी । और इस तरह के काम देश में न जाने कितने ही क्षेत्रों में सभी पार्टियों की नाक के नीचे चल रहे होंगे। पता नहीं हमें उन लोगों में मां क्यों नहीं दिखाई देती?
हम अपनी जिंदगी का उत्सव तो मनाना चाहते हैं पर हम कभी भी गहरी पैठ उतरना नहीं चाहते। सिमोन दी बउवार का यह कथन बार-बार मन- मस्तिष्क पर चोट करता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है। इस तरह से एक मां भी बहुत सारी उपाधियों को, विशेष गुणों को देकर बना दी जाती है। एक चिड़िया, एक नन्ही गौरैया अपने छोटे बच्चों को तब तक ही संभालती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख लेता और जब उड़ना सीख लेता है तब उसे उड़ जाने देती है, अपने मातृत्व को समेटे। पुरुष संतान की भी जब इस दुनिया में पहली बार आंख खुलती है तो उसको पहला दर्शन भी स्त्री का ही होता है । और एक स्त्री जब कामकाजी होती है या या उस तरह के कार्यों में संलग्न होती है तो उसको अपने भीतर इस तरह की हीन प्रवृत्तियों को सोचने पर मजबूर कर दिया जाता है कि वह अपने बच्चों का ठीक तरह से ध्यान नहीं रख रही है। हालांकि अब समय बदला है और महिलाएं भी चाहे कार्यरत हों या न हों, अपने बच्चों की इस तरह से ही परवरिश कर रही हैं कि वे अपनी भीतर इस तरह की क्षुद्रता की भावना पैदा ही न होने दे, वे अधिक आत्मविश्वासी और शख्सियत वाली हो गई हैं । दरअसल हमने अपने दिमाग को सक्रिय करना छोड़ दिया है।
जब एक बच्चा अपनी मां की बीमारी की स्थिति में उसको पूछता है , उसके लिए कुछ करता है तो एक मां को संतुष्टि की जो अनुभूति मिलती है, जो दिल को अधिक सुकून मिलता है , वह वैसा ही होता है जैसे कि एक बीज को पौधा बनते देखने में होती है। लेकिन वही बच्चे जब एक मां की खामोश आवाज और न दिख सकते वाली पीड़ा को नहीं सुन पाते हैं तो अफसोस होता है कि मां उसे कुछ और गढ़ना, कुछ बनाना चाहती थी पर वह नहीं बना पाई या वह बीज ही शायद उस उर्वरा भूमि को पाकर भी स्वयं को उस तरह से ढाल नहीं पाया ।
हो सकता है किसी की मां ने अपने बच्चों से बहुत अधिक मीठे शब्दों में कभी बात न की हो या कभी गले न लगाया हो पर यह कहना एकदम गलत होगा कि वह कभी भी उसका भला नहीं चाहती। वह शायद उसे आगे आने वाली चुनौतियों के लिए अधिक परिपक्व कर रही होगी , अधिक सुरक्षित और अधिक मजबूत बना रही होगी। हो सकता है एक मां ने कभी अपने बच्चों को बड़े-बड़े ब्रांडेड कपड़े या खिलौने न ला कर दिए हों पर फिर भी वह उस सपने का पीछा नहीं छोड़ पाई होगी कि कभी वह उसे उस लायक बना दे जहां वह अपनी मां की भांति सिकुड़ना न सीखे बल्कि इस जीवन जगत की अंतरधारा में खुद के सपनों के पंख फैलाना सीख ले। एक मां हो सकता है अपने बच्चों के चारों तरफ वह महक, वह सुरक्षा कवच न बना सके लेकिन उसकी आंखों में सपनों के दीप जलाने की उत्सुकता जरूर जगा देती है।
मां ने भले ही बहुत अधिक महान त्याग न किए हों अपने बच्चों के लिए पर वे खुद को संभाल कर रख सकें, इतना जरूर खड़ा कर दिया होता है। अपने बच्चों को वह भले ही मी, माई, माइसेल्फ की दुनिया में न लें जा रही हो पर बच्चों को कब और किसके प्रति संवेदनशील होना है और सही- गलत की पहचान कैसे करनी है यह जरूर सिखा दिया होगा। एक मां अपने बच्चों को सर्वश्रेष्ठ न बना पाए पर उसे इतना समर्पित और स्वयं पर विश्वास भाव वाला जरूर बना देती कि वह सौंदर्य का अर्थ भी समझे और समर्पण का अर्थ भी जाने और उनकी महत्ता करें। अपने जीवन में आने वाली सभी महिलाओं के प्रति स्वस्थ भावना रखें।