Raksha Bandhan Traditions: राखी की यह पतली डोर, मजबूत रिश्ते की नींव

Raksha Bandhan Traditions: रक्षाबंधन सिर्फ राखी बांधने और उपहार देने का त्योहार नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और भावनात्मक रिश्ते को मजबूत करने का अवसर है। जानिए राखी की पतली डोर रिश्तों को कैसे जोड़ती है।

Update:2026-08-23 18:22 IST

Raksha Bandhan Traditions Explained in Hindi

Raksha Bandhan Traditions: सावन का महीना है , पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन आने वाला है। हर बहन को अपने दूर रहने वाले भाई को राखी भेजनी है। माध्यमों की अब कमी नहीं है। पहले सिर्फ भारतीय डाक सेवा की सामान्य डाक द्वारा राखी भेजी जाती थी और अब स्पीड पोस्ट, कोरियर या ऑनलाइन डिलीवरी के माध्यम भी साथ में जुड़ गएं हैं। अधिकांश समय कम आवाजाही वाले ये पोस्ट ऑफिस अचानक राखी आने के समय लंबी-लंबी कतारों और लोगों की आवाजाही से गुलजार हैं। लोग आज भी राखी बंधवाने या राखी बांधने के लिए घरों से निकलते हैं, शहरों से निकलते हैं, बसों और ट्रेनों का सफर करते हैं। और जो नहीं कर पाते हैं वे अपनी राखी भेज कर या राखी पाकर उस एहसास को जीवित कर लेते हैं। पहले राखी वाकई सिर्फ एक इमोशन, भाई के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम होती थी। राखी आज भी वही माध्यम है पर उसमें आकांक्षित मंगल की भावना ने अब सबसे सुंदर, सबसे अलग दिखने वाली और बड़ी-महंगी सी राखी होनी चाहिए, का भाव भी समाहित कर लिया है। बचपन में जिन भाइयों के साथ खेले, जिनके साथ अपने जीवन का सबसे सुंदर समय बिताया, जिनके साथ बदमाशियां कीं तो साथ में डांट भी खाई या उनसे झगड़ा भी किया और रिश्ते के कुछ भाइयों को कई-कई वर्षों में कभी-कभी मिलते रहें , तब राखी का वर्ष भर में एक ऐसा दिन चला आता है जब मिलने, न मिलने की वह दूरी खत्म होकर उस पतले से धागे में सिमट जाती है और अगले एक वर्ष के लिए वह नए बंधन में जुड़ जाती है।

"राखी को है त्यौहार,सांवल बीरा आजा र।

बहना खड़ी उडीकै,तुं राखी बँधाजा र ।।"

राखी भेजना सिर्फ राखी भेजना ही नहीं होता बल्कि बहुत आत्मीय सा कुछ याद आ जाना होता है। स्मृति को उन मुलाकातों से दो-चार होना होता है, जब एक दूसरे की याद आ जाती है। बहिन के लिए यह अपने मायके के शहर में लौटने जैसी अचानक आ गई याद होती है, जिसमें अतीत भी होता है, वर्तमान भी होता है और भविष्य की मंगलकामनाएं भी होतीं हैं। वह जगह, वह संबंध, वह रिश्ता जो भले ही उम्र में बढ़ता जा रहा है पर उसमें बदलते समय की आहट भी होती है। शायद हम इसका लेखा-जोखा न दे पाते हैं पर इतना है कि एक बहिन जब अपने भाई को राखी भेजती है, तब वह उसके साथ अतीत में बिताए गए अपने समय का बंद दरवाजा खोलती है, जहां उसकी अपनी दुनिया होती है। भाई-बहिन के रिश्ते की इस दुनिया की अपनी मिट्टी, अपना आसमान होता है। वह उस राखी में उतर अपने भाई की कलाई पर न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है बल्कि वह यह भी कहती है कि उसकी राखी कोई सजावट की वस्तु नहीं, न कोरी भावुकता है। बल्कि इस अधिक भौतिक होती दुनिया में वह एहसास है जो इस रिश्ते को अधिक अपना बनाती है। पता नहीं क्यों राखी जैसे पवित्र त्योहार का इतना सामान्यीकरण कर दिया गया है, इतना बाजारवाद का हिस्सा बना दिया गया है?

भाई-बहन के रिश्ता का चुनाव हमने अपनी मर्जी से नहीं किया। भाई-बहन एक-दूसरे से अलग एक इकाई होते हैं। हो सकता है उनकी सोच अलग हो, उनके विचार नहीं मिलते हों, उनकी प्रकृति अलग हो पर फिर भी दोनों उस रिश्ते की व्यवस्था में बंधे हैं जहां रिश्तों की बनावट या कृत्रिमता कभी स्वीकार नहीं होती। अब सब अपनी -अपनी गृहस्थी में पूरी तरह से व्यस्त हैं और भागती-दौड़ती इस दुनिया में अब पहले जैसा समय भी कहां मिल पाता है। साथ खेला, पला, बड़ा हुआ यह रिश्ता, पता नहीं क्यों एक उम्र के बाद, या यूं कहें अधिकांश संबंधों में उनकी शादी के बाद अहम् का संबंध बन जाता है। कितने ही संबंधों में देखने में आता है कि भाई अपनी पत्नी के दबाव में या पत्नी अपने पति या ससुराल वालों के अहम् को संतुष्ट करने का दर्द सहते हुए एक-दूसरे से राखी का संबंध रखना तो दूर, बात तक करना बंद कर देते हैं। दो-तीन दशक पहले तक शादी से पहले लड़कियां जहां अपने ममेरे-फुफेरे, चाचा-ताऊ के बेटों या मुंह बोले भाइयों के राखी बांधती थीं, वहीं शादी के बाद राखी भेजने-बांधने के लिए भी ससुराल वालों का उलाहना सुनना होता था।

एक पति के लिए अपनी पत्नी पर अपना अधिकार दिखाने का,अपनी बात मनवाने का सबसे अच्छा तरीका उसके भाई व परिवार जनों के विरुद्ध अपमानजनक शब्द कहकर उसे दबाना होता है। हर पति जानता है कि कोई भी स्त्री अपने अंदर बहते उस रक्त संबंध के विरुद्ध कुछ भी सुनना पसंद नहीं करेगी और अंदर तक धंसे असंवेदनशील व्यवहार के दर्द को बर्दाश्त कर, उसके लिए अपने परिजनों को परेशान नहीं करेगी, क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं। वह अपने परिवार जनों को कोई परेशानी न हो उसके लिए उनसे बात करना भी बंद कर देती है। वही स्थिति एक भाई की भी होती है। अपने पति या पत्नी के अहम् के कारण भाई- बहनों के संबंध में इतनी दूरी आ जाती है कि वे एक-दूसरे से राखी का संबंध भी नहीं रखते हैं और एक-दूसरे के घर आना-जाना भी नहीं करते। कहीं गलती से आमने-सामने आ भी जाएं तो भी कन्नी काटकर निकल जाते हैं।

मतभेद हर रिश्ते में होते हैं। भाई-बहन का रिश्ता भी इससे अलग नहीं होता। कहीं संपत्ति विवाद तो कहीं माता-पिता की जिम्मेदारी को लेकर विवाद तो कहीं विवाह के बाद बदली हुई प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद होते हैं। समस्या मतभेद में नहीं है; समस्या तब पैदा होती है जब मतभेद बातचीत को समाप्त कर देता है। ऐसे में भाई -बहन के उस प्रेम को बनाए-बचाए रखने वाला रक्षा बंधन का धागा हमें यह याद दिलाता है कि पुरानी शिकायतों को छोड़ दिया जाए क्योंकि रिश्तें केवल अधिकार से नहीं बल्कि कर्तव्य और संवेदना से टिकते हैं। अब हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जब परिवार सिकुड़ते-सिमटते जा रहे हैं। संयुक्त परिवार धीरे-धीरे करके कम होते जा रहे हैं और जो एकल परिवार भी है उनमें भी एक बेटा या एक बेटी रह गए हैं। परिवार में सिर्फ एक बच्चे के होने से यह भाई-बहन के संबंध आगे कैसे बढ़ेंगे यह एक शोचनीय विषय है।

राजस्थान में भाई के विवाह, बहन के विवाह, विदाई, राखी, भैया-दूज और पीहर-मायके से जुड़े बहुत से लोकगीत हैं। इन लोकगीतों का महत्वपूर्ण भाव है कि विवाह के बाद भी बहन के लिए भाई उसका अपना संसार बना रहता है और रक्षाबंधन इसी भाव को याद दिलाता है। धीरे-धीरे करके प्रोफेशनल होती जाती इस दुनिया में अब जबकि सामाजिक रिश्ते कम होते जा रहे हैं, ऐसे में भाई-बहन का यह रिश्ता संबंधों की मर्यादाओं की रक्षा का आश्वासन देता है। वह हमें बताता है कि जीवन कितना भी बदल जाए, रिश्तों की जड़ें स्मृतियों और स्नेह में होती हैं। हम भले ही आधुनिक हो जाएं , हम भले ही स्वतंत्र और व्यक्तिगत सोच रखने वालें हों जाएं पर वर्तमान समय सिर्फ भाई द्वारा बहन की रक्षा का नहीं बल्कि एक दूसरे के साथ हर समय, हर परिस्थिति में खड़े रहने का है। देश-दुनिया के किसी भी कोने से बहन द्वारा भाई के लिए की गई मंगलकामना हमेशा उसका रक्षा कवच बनकर खड़ी होती है और भाई द्वारा दिया गए यह आश्वासन भले ही वह साथ में न खड़ा हो पर कठिनाइयों को पार कर जाने की एक आश्वास्ति देता है। माता-पिता के बाद भाई-बहनों का रिश्ता ही जीवन का सबसे करीबी रिश्ता होता है क्योंकि उनके बीच साझा बचपन और पारिवारिक स्मृतियों की एक ऐसी दुनिया होती है जिसे कोई दूसरा नहीं समझ सकता।

हमारे समय में उम्र में थोड़ा भी बड़ा भाई या बहिन सम्मानित बड़े की भूमिका में आ जाता था और हम छोटे की भूमिका में। पर अब भाई-बहनों में उम्र का यह अंतर, वरिष्ठता वाला यह फासला कम हो चला है। अभी वे छोटे-बड़े भाई-बहन या बहन-भाई की जगह बराबर के मित्र हो चले हैं। वे समझदारी से अपनी हर बात एक-दूसरे से शेयर करते हैं, एक दूसरे को स्पेस देते हैं ,उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं, एक-दूसरे की आवश्यकता में मदद करते हैं, सही सलाह देते हैं और अनर्गल बातों का मुद्दा भी नहीं बनाते हैं। दरअसल बराबरी या समानता का यह नजरिया उनके द्वारा बराबर ग्रहण की गई शिक्षा, नौकरी या व्यवसाय में समान रूप से भागीदारी रखने के कारण विकसित हुआ है। वे पहले वाले भाई-बहनों के जितना अगर भावनात्मक लगाव नहीं भी रखते हैं तो उनके जैसे एक-दूसरे से अहंवादी या इज्जत का सवाल जैसी जंग भी नहीं रखतें हैं।

राखी बांधने और गिफ्ट के लेन-देन से इतर रह त्योहार हमें यह सोचने का मौका देता है कि आखिर भाई-बहन के ये संबंध हमारे जीवन में कितने आवश्यक हैं और इन संबंधों को बचाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए। इस रिश्ते की सबसे बड़ी आवश्यकता आर्थिक सहायता से अधिक भावनात्मक उपलब्धता की है। एक-दूसरे से भले ही हम कई किलोमीटर की दूरी पर हों पर वीडियो कॉल हमारी उस दूरी को कम करने की कोशिश करता है, उस एहसास को भी जीवित रखता है कि हम भाई के राखी बांध रहे हैं या बहन से राखी बंधवा रहें हैं। अपनी लोक संस्कृति से जोड़े रखने वाले इस त्योहार ने आज भी अपनी आधुनिक सज-धज में रिश्तों को जोड़े रखा है, बनाए रखा है।

(लेखिका प्रतिष्ठित स्तंभकार हैं।)

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