Youth Anger in India: युवा आक्रोश और सोशल मीडिया की भूमिका
Youth Anger in India: युवा आक्रोश, सोशल मीडिया और बदलते आंदोलन के स्वरूप पर वरिष्ठ पत्रकार योगेश मोहन का विश्लेषण। लेख में युवाओं की नाराजगी, भ्रष्टाचार और व्यवस्था से जुड़े सवालों पर चर्चा है।
Youth Anger in India (Image Credit-Social Media)
Youth Anger in India: स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इतना वृहद आन्दोलन युवा आक्रोश के रूप में पहली बार देखने को मिल रहा है। ये आक्रोश मात्र जंतर-मंतर तक ही सीमित नहीं है अपितु देश के विभिन्न राज्यों में दिखाई दे रहा है। झारखंड में भी दीर्घ समय तक विरोध प्रदर्शन चला। ये कहीं सीजेपी के बैनर तले तो कहीं क्षेत्रीय स्तर पर सतत् रूप से चलते हुए अपना रूप बदलता रहा, परन्तु आक्रोश, प्रत्येक स्थान पर समान रूप में दिखाई दिया।
जब भी किसी व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश उत्पन्न होता है तो वह चिंगारी एकाएक प्रस्फुटित नहीं होती अपितु वह धीरे-धीरे सुलगकर अपना विकराल रूप लेती है। युवावर्ग में व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश सम्भवतया एक दीर्घ अवधि से उत्पन्न हो रहा था, चुंकि युवा किसी भी राजनैतिक व्यक्ति या दल को अपने आक्रोश का सिरमौर बनाना नहीं चाहते थे, इसीलिए यह आक्रोश पूर्व में इतना तीव्र रूप में दिखाई नहीं पड़ रहा था। जैसे ही एक युवा ने इसका नेतृत्व किया, वैसे ही अन्य युवा उसका अनुगमन करने लगे और आन्दोलन स्वयं ही प्रारम्भ हो गया। परन्तु उनके द्वारा राजनेताओं को इस आन्दोलन से दूर रखा गया।
आज युवाओं ने सत्तापक्ष के विरुद्ध सोशल मीडिया की सहायता से सम्पूर्ण देश में आन्दोलन उत्पन्न कर दिया है। जब युवा मस्तिष्क अपनी मांग की पूर्ति हेतु बालहट्ट करने लगता है तो नेतागण कितना भी झुककर अपनी बात मनवाने की कोशिश करें अथवा क्षमा याचना कर ले, परन्तु युवा अपने मार्ग से विचलित नहीं होते। वर्तमान आन्दोलन से यह तथ्य स्पष्ट हो गया है कि तकनीकि कितनी अधिक प्रगतिशील हो चुकी है। भारत में समाचार पत्र व दूरदर्शन की भूमिका को सोशल मीडिया ने नगण्य कर दिया है। यही कारण है कि आन्दोलनकारी युवा, समाचार पत्रों व दूरदर्शन पर सत्तापक्ष के नेताओं के फोटो तथा विज्ञापन को देखकर अत्यधिक विचलित हो जाता है और अहसास करता है कि ये फोटो और विज्ञापन पर व्यय, उनके माता-पिता की मेहनत की आय से कर के रूप में दिए गए धन का दुरुपयोग है। वर्तमान समय में इस तथ्य की गहनता को समझना नितान्त आवश्यक है कि जो विज्ञापन समाचार पत्र अथवा या दूरदर्शन पर प्रसारित होते हैं, उनका युवा मस्तिष्क पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि आज सोशल मीडिया ने सम्पूर्ण तथ्यों को इतनी तीव्र गति से उनके लिए सुगम बनाया है जिससे ये परम्परागत स्रोत बहुत पीछे रह गए हैं। अब ये भी प्रमाणित हो गया है कि सोशल मीडिया की सहायता से राई का पहाड़ भी बनाया जा सकता है, क्योंकि यह युवा आन्दोलन सोशल मीडिया का ही चमत्कार है।
युवा आन्दोलन को सैन्यबल से नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, क्योंकि सैन्यबलों में युवाओं के रिश्तेदार, दोस्त और बहुत से बच्चों के माता-पिता, भाई-बहन कार्यरत् होते हैं और वे अपने ही निर्दोष खून पर शस्त्र का प्रयोग करना नहीं चाहेगें। यदि उनके आवेश का, बलपूर्वक दमन करने का प्रयास किया जाता है तो किसी बड़ी दुर्घटना की भी सम्भावना हो सकती है।
इस समय युवाओं का आक्रोश न्यापालिका एवं चुनाव आयोग के विरुद्ध भी अत्यधिक है। वो समझते हैं कि भारत का चुनाव आयेाग निष्पक्षता के साथ निर्णय नहीं लेता अपितु वह सत्तापक्ष के अनुसार कार्यो का निष्पादन कर रहा है। इस तथ्य में कितनी सत्यता है यह तो बिना आधार प्रमाणित नहीं किया जा सकता, परन्तु युवा मन में यह धारणा स्थापित हो चुकी है। इसी प्रकार भारत के मुख्य
न्यायाधीश की निष्पक्षता पर पूर्ण विश्वास है , वे भारत के प्रथम मुख्य न्यायधीश हैं, जिनको अभी तक अत्यधिक अपमान का सामना करना पड़ रहा है। उनको भी अपनी व न्यायधीशों की निष्पक्षता को सिद्ध करने की आवश्यकता है, वरना स्थिति इतनी विकट हो जायेगी कि ईश्वर के पश्चात न्याय का दूसरा स्थान न्यायपालिक भी अस्तित्वहीन हो जायेगी। किसी भी देश की न्यायपालिका का अपमान होना, उस देश के लिए अत्यधिक लज्जाजनक है।
भारत में इस समय सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार, चरम सीमा पर व्याप्त हो चुका है, जिससे युवावर्ग का आक्रोशित व पीड़ित होना स्वाभाविक है। भ्रष्टाचार पर यदि अतिशीघ्र अंकुश नहीं लगाया गया तो स्थिति इतनी अधिक भयावह हो जाएगी कि उसे नियन्त्रित करना शासन व प्रशासन के लिए भी अत्यधिक कठिन होगा।
आज का युवा अत्यधिक जागरुक है। इसलिए वो किसी भी उच्च स्तर पर घटित घटना के दोषी को त्वरित पहचान लेता है। हमारे अधिकांश नेतागण का अशिक्षित अथवा निम्न शिक्षित होने से वे अपने मंत्रालयों के कार्यो को तद्नुरूप निर्वहन करने में सक्षम नहीं है, जिस कारण उनके मंत्रालय, जनता की सेवा आशानुरूप नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे अकर्मण्य मंत्रियों को भावी युवा तनिक भी सहन नहीं करेगा।
सत्तासीन नेतृत्व किसी भी दल का हो, उसको उपरोक्त विषय पर अत्यधिक गम्भीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है और पूर्व में की गई त्रुटियों को स्वीकार करके उन्हें सहर्ष सुधारने के लिए तत्पर रहना होगा।
आन्दोलनकारी युवाओं को प्रेम, सहानुभूति तथा उन्मुक्त हृदय से सुनने की आवश्यकता है। यदि उनकी समस्याओं को समझकर उनसे वार्ता की जाए तो ऐसी आशा की जा सकती है कि अधिकांश समस्या का समाधान तो स्वयं ही हो जाएगा। साथ ही आन्दोलनकारी युवाओं के माता-पिता के द्वारा, अपने बच्चों को ऐसे संस्कार देने चाहिए कि उनके बच्चे किसी भी विकट परिस्थिति का सामना करें तो अपने नैतिक मूल्यों, बड़ो के प्रति आदर व सम्मान की भावना को विस्मृत न करें।
योगेश मोहन
( वरिष्ठ पत्रकार और आईआईएमटी यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति )