Bulandshahr News: दूध की तरह अब गोमूत्र की भी ‘डेयरी’, बुलंदशहर का मॉडल पूरे यूपी में उतारने की तैयारी

Bulandshahr News: उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के मॉडल की तर्ज पर गोमूत्र संग्रह और खरीद व्यवस्था को विस्तार देने की तैयारी है। एफपीओ ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीद रहा है और करीब 300 ग्रामीण महिलाएं इससे जुड़ी हैं।

Update:2026-08-11 15:20 IST

UP Gomutra Dairy Model (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गाय अब केवल दूध देने तक पशुपालक की आय का जरिया नहीं रहेगी। दूध देना बंद करने के बाद भी गोवंश से नियमित आमदनी हो सके, इसके लिए प्रदेश सरकार ‘गोमूत्र डेयरी’ के एक नए मॉडल को पूरे राज्य में आजमाने की तैयारी कर रही है। बुलंदशहर में किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ के स्तर पर शुरू किए गए प्रयोग में गांवों से बाकायदा गोमूत्र खरीदा जा रहा है। इसके लिए दूध संग्रह केंद्रों की तरह गोमूत्र संग्रह केंद्र बनाए गए हैं और पशुपालकों को अभी ₹10 प्रति लीटर भुगतान किया जा रहा है। प्रयोग सफल रहा तो सरकार इसे प्रदेश के दूसरे जिलों में ले जाएगी और भविष्य में खरीद मूल्य ₹20 प्रति लीटर तक पहुंचाने की कोशिश भी की जा सकती है।

इस योजना का महत्व केवल गोमूत्र की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। सरकार इसे गो-संरक्षण, प्राकृतिक और जैविक खेती, महिला रोजगार, एफपीओ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक साथ जोड़ने वाले मॉडल के रूप में देख रही है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल उस गोवंश का है जो दूध देना बंद करने के बाद पशुपालक के लिए आर्थिक बोझ बन जाता है। यदि दूध के अलावा गोबर और गोमूत्र का भी व्यवस्थित बाजार तैयार हो जाता है तो अनुपयोगी समझे जाने वाले गोवंश को पालना भी आर्थिक गतिविधि में बदला जा सकता है।

बुलंदशहर के 15 गांवों से शुरू हुआ प्रयोग

इस मॉडल की शुरुआत बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव में डॉ. प्रवीण के नेतृत्व में एक एफपीओ ने पायलट परियोजना के रूप में की है। इसके दायरे में आसपास के करीब 15 गांव लाए गए हैं।सामान्य दुग्ध डेयरी की तरह अलग-अलग स्थानों पर गोमूत्र एकत्र करने के केंद्र बनाए गए हैं। प्रत्येक केंद्र पर करीब 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। पशुपालक अथवा योजना से जुड़ी महिलाएं यहां गोमूत्र पहुंचाती हैं और एफपीओ उसे एकत्र कर आगे प्रसंस्करण के लिए ले जाता है।

फिलहाल इन केंद्रों के माध्यम से प्रतिदिन करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किए जाने का दावा है। मौजूदा ₹10 प्रति लीटर खरीद दर के हिसाब से देखें तो प्रतिदिन लगभग ₹5,000 और पूरे वर्ष समान संग्रह बना रहे तो करीब ₹18.25 लाख का गोमूत्र पशुपालकों से खरीदा जा सकता है। मॉडल का विस्तार होने पर यह राशि कई गुना बढ़ सकती है।

300 महिलाओं को बनाया हिस्सेदार

इस प्रयोग का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की भागीदारी है। करीब 300 ग्रामीण महिलाओं को इस व्यवस्था से जोड़ा गया है और उन्हें एफपीओ में अंशधारक बनाया गया है। गांवों में गोमूत्र एकत्र करने में सहयोग करने वाली महिलाओं को ₹2 प्रति लीटर कमीशन भी दिया जा रहा है।यानी योजना को केवल पशुपालकों की अतिरिक्त आय तक सीमित रखने के बजाय गांव में संग्रह, परिवहन, प्रसंस्करण और बिक्री की पूरी शृंखला खड़ी करने की कोशिश की जा रही है।अगर यही व्यवस्था बड़े स्तर पर सफल होती है तो स्वयं सहायता समूहों और महिला समूहों को गोमूत्र संग्रह केंद्र चलाने, उससे कृषि उपयोगी उत्पाद बनाने, पैकेजिंग और विपणन जैसे कामों से भी जोड़ा जा सकता है।

गोमूत्र से बनेगा खेतों के लिए कीट नियंत्रक

एकत्र किया गया गोमूत्र सीधे किसानों तक पहुंचाने के बजाय उसका प्रसंस्करण किया जा रहा है। एफपीओ इसमें निर्धारित जड़ी-बूटियों और दूसरी सामग्री का इस्तेमाल कर कृषि उपयोग के कीट नियंत्रक तथा दूसरे जैविक उत्पाद तैयार कर रहा है। इन्हें समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाता है।कृषि के लिहाज से योजना का यही हिस्सा सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है। प्राकृतिक खेती में गोबर और गोमूत्र आधारित विभिन्न मिश्रणों का प्रयोग पहले से किया जाता रहा है। हालांकि अलग-अलग उत्पादों की प्रभावशीलता उनके निर्माण, सांद्रता, फसल, कीट और इस्तेमाल की विधि पर निर्भर करती है। इसलिए बड़े पैमाने पर विस्तार के साथ इनके मानकीकरण, गुणवत्ता परीक्षण और वैज्ञानिक फील्ड ट्रायल की भी आवश्यकता होगी।

यदि गोमूत्र आधारित उत्पाद रासायनिक कीटनाशकों के कुछ उपयोग को व्यावहारिक और सुरक्षित तरीके से कम कर पाते हैं तो इससे खेती की लागत घटाने की संभावना बन सकती है। लेकिन इसके लिए प्रत्येक उत्पाद की प्रभावशीलता को वैज्ञानिक परीक्षण से प्रमाणित करना महत्वपूर्ण होगा।

अगला लक्ष्य ₹20 प्रति लीटर

उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार बुलंदशहर मॉडल से मिले अनुभवों के आधार पर इसे प्रदेश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने की योजना है। इसके लिए एफपीओ को प्रशिक्षित किया जाएगा और गांवों में संग्रह केंद्रों का नेटवर्क विकसित करने की दिशा में काम होगा।आगे चलकर गोमूत्र का खरीद मूल्य ₹20 प्रति लीटर तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। हालांकि इतनी कीमत तभी आर्थिक रूप से टिकाऊ हो सकती है जब गोमूत्र से बनने वाले उत्पादों के लिए पर्याप्त बाजार भी विकसित हो।यही इस मॉडल की असली परीक्षा होगी। केवल संग्रह केंद्र खोल देना पर्याप्त नहीं होगा। संग्रह के बाद भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग और अंततः तैयार उत्पाद की बिक्री की पूरी शृंखला तैयार करनी होगी।

दूध देना बंद तो भी गाय से आय का रास्ता

उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौतियों में एक दूध न देने वाले गोवंश के पालन का खर्च है। जब गाय दूध देती है तो पशुपालक को उससे प्रत्यक्ष आमदनी होती है, लेकिन दूध उत्पादन बंद होने पर चारा, पानी और देखभाल का खर्च जारी रहता है जबकि आमदनी घट जाती है।इसी आर्थिक गणित को बदलने के लिए गोबर और गोमूत्र को मूल्यवान संसाधन बनाने की अवधारणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

यदि किसान को दूध के अलावा गोबर से जैविक खाद, बायोगैस या अन्य उत्पाद और गोमूत्र से अतिरिक्त नकद आय मिलने लगे तो पशुपालन का अर्थशास्त्र बदल सकता है। इससे गोवंश को छोड़ने की प्रवृत्ति कम करने में भी कुछ मदद मिल सकती है, हालांकि इसका वास्तविक असर मॉडल के बड़े स्तर पर लागू होने और किसानों को मिलने वाली वास्तविक आय से ही निर्धारित होगा।

पांच लीटर रोज का दावा, लेकिन पूरी मात्रा संग्रह करना आसान नहीं

एक स्वस्थ वयस्क गाय प्रतिदिन कई लीटर मूत्र उत्सर्जित कर सकती है, लेकिन उसका कितना हिस्सा साफ तरीके से संग्रह किया जा सकता है, यह पशु रखने की व्यवस्था पर निर्भर करता है। खुले में रखे पशुओं से पूरी मात्रा जुटाना आसान नहीं है। इसलिए ₹10 या ₹20 प्रति लीटर के आधार पर सीधे बहुत बड़ी मासिक कमाई का अनुमान लगाना व्यावहारिक नहीं होगा।मॉडल को सफल बनाने के लिए पशुशालाओं की संरचना में भी बदलाव की जरूरत पड़ सकती है ताकि गोमूत्र मिट्टी, गोबर, पानी या दूसरे पदार्थों से मिलकर दूषित होने से पहले अलग से एकत्र हो सके।इसके बाद उसकी गुणवत्ता और भंडारण भी महत्वपूर्ण होगा। कृषि उत्पाद अथवा औषधि निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री के मानक अलग हो सकते हैं।

आयुर्वेद में पुराना उपयोग, लेकिन चिकित्सा दावों में सावधानी जरूरी

गोमूत्र का उल्लेख आयुर्वेदिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में मिलता है और कुछ आयुर्वेदिक औषधियों तथा तैयारियों में इसका उपयोग भी किया जाता है। औषधि निर्माण के लिए मानकीकृत और शुद्ध कच्चे माल की उपलब्धता इसलिए आयुष उद्योग के लिए उपयोगी हो सकती है।लेकिन गोमूत्र को लिवर रोग, त्वचा रोग, संक्रमण या अन्य बीमारियों का अपने आप सिद्ध उपचार मान लेना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। इसके सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने, शरीर के ‘टॉक्सिन’ निकलने अथवा किसी गंभीर बीमारी का इलाज होने जैसे व्यापक दावों के लिए मजबूत आधुनिक क्लिनिकल प्रमाण आवश्यक हैं।

इसलिए कच्चे गोमूत्र का स्वयं सेवन करने के बजाय किसी चिकित्सकीय उपयोग के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह और नियामकीय मानकों के अनुरूप तैयार औषधि पर ही भरोसा किया जाना चाहिए।

सबसे बड़ी चुनौती—गोमूत्र खरीदेगा कौन और उत्पाद बिकेगा कहां?

प्रदेशव्यापी विस्तार से पहले सरकार और एफपीओ के सामने सबसे बड़ा सवाल बाजार का होगा। अगर हजारों गांवों में संग्रह केंद्र खुल गए और प्रतिदिन लाखों लीटर गोमूत्र आने लगा तो उससे बनने वाले उत्पादों की उतनी ही बड़ी मांग भी पैदा करनी होगी।इसके लिए गोमूत्र आधारित कृषि उत्पादों का वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, गुणवत्ता मानक, किसानों के खेतों पर प्रदर्शन, उचित मूल्य और सुनिश्चित विपणन जरूरी होगा। आयुष उद्योग के लिए इस्तेमाल होने वाले गोमूत्र की गुणवत्ता और आपूर्ति के लिए अलग मानक बनाने पड़ सकते हैं। यानी गोमूत्र की कीमत घोषित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके अंतिम उत्पाद का बाजार तैयार करना होगा।

गोशाला के अर्थशास्त्र को बदल सकता है प्रयोग

इस मॉडल का एक संभावित उपयोग प्रदेश की गोशालाओं में भी हो सकता है। बड़ी संख्या में गोवंश रखने वाली गोशालाओं में गोबर और गोमूत्र नियमित रूप से उपलब्ध होता है। अगर संग्रह और प्रसंस्करण की वैज्ञानिक व्यवस्था बनाई जाए तो गोशालाओं में गोबर से खाद और बायोगैस तथा गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे गोशालाओं की सरकारी सहायता पर निर्भरता कुछ हद तक कम करने और उन्हें आंशिक रूप से आय पैदा करने वाली इकाइयों में बदलने की संभावना बन सकती है।

बुलंदशहर का प्रयोग इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि यहां पहली बार इस विचार को दूध की डेयरी जैसी संगठित खरीद व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की गई है। पशुपालक से गोमूत्र खरीदना, महिलाओं को संग्रह से जोड़ना, एफपीओ के माध्यम से प्रसंस्करण करना और फिर तैयार उत्पाद किसान तक पहुंचाना—पूरी शृंखला सफल हुई तो इसे दूसरे जिलों में दोहराया जा सकता है।

प्रदेश सरकार अब इसी प्रयोग को बड़े पैमाने पर आजमाने की तैयारी में है। लेकिन इसकी सफलता का असली पैमाना यह नहीं होगा कि कितने गोमूत्र संग्रह केंद्र खुल गए। असली कसौटी होगी कि पशुपालक की आय वास्तव में कितनी बढ़ी, महिलाओं को कितना रोजगार मिला, गोवंश पालन कितना आर्थिक हुआ और गोमूत्र से बने उत्पाद किसानों के लिए वैज्ञानिक तथा आर्थिक रूप से कितने उपयोगी साबित हुए।

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