गौतमबुद्ध नगर जिला अस्पताल में नियम विरुद्ध भर्ती: 17 नर्स-लैब टेक्नीशियन का वेतन रोका
Gautam Buddha Nagar: गौतमबुद्ध नगर जिला अस्पताल में 17 स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्तियां जांच के घेरे में हैं। मई 2023 में भर्ती अधिकार बदलने के बावजूद 15 स्टाफ नर्स और दो लैब टेक्नीशियन की स्थानीय नियुक्ति हुई।
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Gautam Buddha Nagar: गौतमबुद्ध नगर के जिला अस्पताल में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत की गई 17 स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्तियां जांच के घेरे में आ गई हैं। इनमें 15 स्टाफ नर्स और दो लैब टेक्नीशियन शामिल हैं। आरोप है कि इन पदों पर स्थानीय स्तर से भर्ती उस समय की गई जब मई 2023 से ही स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन जैसे पदों की भर्ती का अधिकार जिला स्तर से हटाकर उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लखनऊ मुख्यालय को दिया जा चुका था। मामला सामने आने के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने सभी 17 कर्मचारियों का वेतन रोक दिया है। जिला अस्पताल प्रशासन ने भी भर्ती से जुड़े नियम और अभिलेख दोबारा खंगालने शुरू कर दिए हैं।
मामले की गंभीरता केवल यह नहीं है कि कथित तौर पर नियम विरुद्ध नियुक्तियां हुईं। बड़ा सवाल यह है कि इनमें से आठ कर्मचारी अगस्त 2023 से अस्पताल में काम करते रहे और उन्हें लगभग तीन वर्ष तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के बजट से वेतन मिलता रहा। उपलब्ध विवरण के अनुसार अगस्त 2023 में छह स्टाफ नर्स और दो लैब टेक्नीशियन नियुक्त हुए थे। इन आठ कर्मचारियों को अगस्त 2023 से जून 2026 तक लगभग ₹58 लाख का भुगतान किया गया। इसके बाद 2025 के अलग-अलग महीनों में नौ और स्टाफ नर्स भर्ती की गईं और उन पर लगभग ₹21 लाख वेतन खर्च हुआ। इस तरह विवादित नियुक्तियों पर अब तक करीब ₹79 लाख का भुगतान हो चुका है।
मई 2023 में बदल गए थे नियम, अगस्त में फिर कैसे हुई भर्ती?
इस मामले की पूरी समयरेखा ही सबसे महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2023 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मानव संसाधन संबंधी भर्ती नियमों में बदलाव किया गया था। नई व्यवस्था के बाद स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन की नियुक्ति जिला अस्पताल अपने स्तर से नहीं कर सकता था। भर्ती केंद्रीकृत तरीके से लखनऊ स्थित NHM मुख्यालय से होनी थी।
यदि यह नियम मई 2023 से लागू था, तो उसके करीब तीन महीने बाद अगस्त में छह नर्स और दो लैब टेक्नीशियन की स्थानीय नियुक्ति कैसे हुई यही पहला प्रशासनिक प्रश्न है। उससे भी बड़ा सवाल यह कि 2025 में, यानी नियम लागू होने के करीब दो वर्ष बाद, नौ और स्टाफ नर्स किस आधार पर भर्ती कर ली गईं।
सीएमओ डॉ. मदन मोहन मणि त्रिपाठी ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि 2023 में मानव संसाधन भर्ती नियमों में बदलाव के बाद स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन की भर्ती जिला अस्पताल स्तर से नहीं हो सकती थी और जानकारी सामने आने के बाद संबंधित कर्मियों का वेतन रोक दिया गया।
सीधी भर्ती नहीं, आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए हुई नियुक्तियां
उपलब्ध जानकारी के अनुसार ये कर्मचारी सीधे स्थायी सरकारी कर्मचारी के रूप में नियुक्त नहीं किए गए थे। जिला अस्पताल प्रबंधन ने एक एजेंसी के माध्यम से उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत तैनात किया था।यहीं जांच का दूसरा बड़ा बिंदु बनता है।
एजेंसी किस आधार पर चुनी गई? उसे किन पदों पर कर्मचारी उपलब्ध कराने का कार्यादेश दिया गया था? क्या कार्यादेश में स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन शामिल थे? यदि भर्ती अधिकार जिला स्तर से समाप्त हो चुका था तो क्या एजेंसी का पुराना अनुबंध इस्तेमाल कर नियुक्तियां की गईं या नया आदेश जारी किया गया? और अंतिम अनुमोदन किस अधिकारी ने दिया?
जब तक ये दस्तावेज सामने नहीं आते, जिम्मेदारी केवल एजेंसी पर डाल देना पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि आउटसोर्सिंग एजेंसी अपने आप किसी सरकारी अस्पताल में 17 लोगों को तैनात नहीं कर सकती; इसके लिए विभागीय मांग, स्वीकृति, उपस्थिति प्रमाणन और भुगतान आदेश की पूरी श्रृंखला होती है।
तीन साल तक वेतन मिला, किसी ने नियुक्ति आदेश क्यों नहीं देखा?
इस प्रकरण का सबसे असहज प्रश्न भुगतान प्रक्रिया से जुड़ा है।सरकारी या NHM व्यवस्था में कर्मचारी का वेतन जारी होने से पहले उसकी तैनाती, पद, स्वीकृत मानव संसाधन संख्या, उपस्थिति और संविदात्मक स्थिति से जुड़े रिकॉर्ड होने चाहिए। यदि नियुक्ति ही उस स्तर से हुई थी जिसे भर्ती का अधिकार नहीं था, तो लगभग तीन साल तक भुगतान कैसे जारी रहा?
क्या जिला स्तर पर वेतन बिल बनते समय यह जांच नहीं हुई कि कर्मचारियों का नियुक्ति आदेश किस प्राधिकारी ने जारी किया है? क्या NHM को केवल संख्या और पद भेजकर भुगतान लिया जाता रहा? क्या नियुक्ति तिथि केंद्रीय डेटाबेस में दर्ज ही नहीं थी?
मौजूदा खुलासे से यही संकेत मिलता है कि पुरानी व्यवस्था में जिला स्तर से केवल पदवार कर्मचारी संख्या और वेतन संबंधी विवरण भेजा जाता था। जब नई प्रणाली में प्रत्येक कर्मचारी की पदभार ग्रहण करने की तिथि और नियुक्ति संबंधी व्यक्तिगत विवरण मांगा गया, तभी विसंगति सामने आई।यानी तकनीकी रूप से एक अतिरिक्त डेटा कॉलम ने वह गड़बड़ी पकड़ ली जिसे सामान्य भुगतान व्यवस्था वर्षों तक नहीं पकड़ सकी।
नई डेटा व्यवस्था ने खोला मामला
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ओर से जब जिलों से कार्यरत कर्मचारियों का विस्तृत ब्यौरा मांगा गया तो गौतमबुद्ध नगर ने भी सभी कर्मियों का डेटा लखनऊ भेजा। इसमें नियुक्ति और ज्वाइनिंग की तारीखें भी शामिल थीं।रिकॉर्ड की जांच में 17 कर्मचारी ऐसे मिले जिनकी तैनाती लखनऊ मुख्यालय से जारी प्रक्रिया के तहत नहीं बल्कि स्थानीय जिला अस्पताल स्तर से हुई थी।
इसके बाद राज्य मुख्यालय ने सीएमओ कार्यालय से स्पष्टीकरण मांगा। स्थानीय स्तर पर अभिलेख देखने के बाद इन नियुक्तियों को नियमों के विपरीत माना गया और भुगतान रोकने की कार्रवाई की गई। यह उदाहरण सरकारी मानव संसाधन प्रबंधन में केंद्रीकृत डिजिटल रिकॉर्ड के महत्व को भी दिखाता है। यदि नियुक्ति, ज्वाइनिंग, स्वीकृत पद और भुगतान एक ही डेटाबेस से जुड़े हों तो ऐसी विसंगति वर्षों बाद नहीं बल्कि पहले वेतन बिल पर ही पकड़ी जा सकती है।
17 कर्मचारी दोषी हैं या व्यवस्था की गलती के शिकार?
इस मामले में कर्मचारियों की स्थिति भी अलग से समझना जरूरी है।यदि किसी नर्स या लैब टेक्नीशियन ने वैध दिखने वाली चयन प्रक्रिया में आवेदन किया, एजेंसी या अस्पताल से नियुक्ति पत्र पाया, काम किया और हर महीने वेतन लिया तो केवल भर्ती प्रक्रिया नियम विरुद्ध निकलने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि कर्मचारी स्वयं किसी षड्यंत्र या धोखाधड़ी में शामिल था।
जांच को यह देखना होगा कि चयन किस प्रकार हुआ, अभ्यर्थियों को क्या बताया गया और क्या किसी ने नियुक्ति पाने के लिए फर्जी दस्तावेज, रिश्वत या मिलीभगत का सहारा लिया।यदि कर्मचारियों ने वास्तविक सेवा दी है और भर्ती की प्रशासनिक गलती अधिकारियों या एजेंसी की है, तो उनसे तीन वर्षों का पूरा वेतन वापस लेने का प्रश्न कानूनी रूप से जटिल होगा। उन्होंने अस्पताल में वास्तविक काम किया है यह तथ्य किसी संभावित वसूली या सेवा समाप्ति संबंधी निर्णय में महत्वपूर्ण हो सकता है।इसलिए अभी इन 17 लोगों को “फर्जी कर्मचारी” कहना उचित नहीं होगा।
₹79 लाख ‘सरकारी नुकसान’ है या वास्तविक सेवा का भुगतान जांच से तय होगा
कुल करीब ₹79 लाख का भुगतान बड़ा आंकड़ा है, लेकिन इसे अभी सीधे सरकारी खजाने का ₹79 लाख नुकसान कहना भी जल्दबाजी होगी।यदि कर्मचारी अस्पताल में नियमित ड्यूटी करते रहे और मरीजों को सेवा दी, तो सरकार को उसके बदले श्रम प्राप्त हुआ। कानूनी प्रश्न यह है कि नियुक्ति प्रक्रिया वैध थी या नहीं।सरकारी वित्तीय नुकसान तब अलग रूप लेता है जब बिना काम भुगतान हुआ हो, फर्जी नाम पर वेतन निकला हो, आवश्यकता से अधिक कर्मचारी रखे गए हों या पद ही स्वीकृत न हो।मौजूदा सामग्री से इतना ही स्थापित है कि भर्ती के प्राधिकारी और प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। धन के नुकसान की वास्तविक मात्रा विस्तृत जांच के बाद ही निर्धारित की जा सकती है।
अस्पताल प्रशासन ने कहा-नियम देख रहे, जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होगी
जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अशोक कुमार झा ने कहा है कि सीएमओ कार्यालय से 17 कर्मचारियों का वेतन रोकने का पत्र मिला है। संबंधित कर्मचारियों को मामले की जानकारी लेने के लिए सीएमओ कार्यालय भेजा गया और भर्ती से जुड़े नियमों का परीक्षण किया जा रहा है। उनके अनुसार जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।
इस बयान का अर्थ महत्वपूर्ण है जिला अस्पताल प्रशासन फिलहाल यह स्वीकार नहीं कर रहा कि पूरी भर्ती जानबूझकर अवैध तरीके से की गई थी; वह नियमों और नियुक्ति दस्तावेजों की दोबारा जांच कर रहा है।इसीलिए वर्तमान अवस्था को “नियम विरुद्ध पाई गई नियुक्तियां, जांच जारी” कहना अधिक सटीक है।
सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल-नौ लोगों की भर्ती 2025 में किसने मंजूर की?
अगस्त 2023 की नियुक्तियों के बारे में यह तर्क संभव है कि नियम उसी वर्ष बदले थे और स्थानीय स्तर पर पुराने नियम को लेकर भ्रम रहा हो। वह भी यदि हुआ तो प्रशासनिक चूक ही होगी।लेकिन 2025 में नौ स्टाफ नर्स की भर्ती उससे कहीं ज्यादा गंभीर सवाल उठाती है।तब तक केंद्रीकृत भर्ती व्यवस्था को लागू हुए लगभग दो वर्ष हो चुके थे। ऐसे में यह कहना कठिन होगा कि अधिकारियों को नियम की जानकारी नहीं थी।जांच में इसलिए 2025 की प्रत्येक नियुक्ति के लिए अलग-अलग पूछा जाना चाहिए, किसने पद की मांग भेजी, किसने एजेंसी को कर्मचारी देने का निर्देश दिया, किसने ज्वाइनिंग स्वीकार की और किस अधिकारी ने पहले वेतन बिल को प्रमाणित किया।यही दस्तावेज वास्तविक जवाबदेही तय करेंगे।
एजेंसी का नाम और अनुबंध सार्वजनिक होना चाहिए
अभी उपलब्ध खबर में एजेंसी का नाम नहीं दिया गया है। जबकि पूरे मामले की तह तक पहुंचने के लिए यह विवरण जरूरी है।एजेंसी कब से जिला अस्पताल को मानव संसाधन उपलब्ध करा रही थी, उसका अनुबंध कितने समय का था, किन श्रेणियों में कर्मचारी उपलब्ध कराने की अनुमति थी, प्रति कर्मचारी उसे कितना प्रशासनिक शुल्क मिलता था और क्या 17 नियुक्तियों से एजेंसी को भी अतिरिक्त भुगतान हुआ-इन प्रश्नों के उत्तर होने चाहिए।यदि भर्ती नियम बदलने के बावजूद पुराना आउटसोर्सिंग अनुबंध चलता रहा तो शासन ने उसे संशोधित क्यों नहीं किया?इस मामले में केवल 17 कर्मचारियों का वेतन रोक देने से प्रणालीगत जिम्मेदारी तय नहीं होगी।
NHM में संविदा और आउटसोर्स भर्ती का अंतर भी महत्वपूर्ण
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत बड़ी संख्या में कर्मचारी नियमित सरकारी सेवा के बजाय संविदा या आउटसोर्स व्यवस्था से काम करते हैं। इन दोनों में अंतर होता है।संविदात्मक पद पर चयन NHM की निर्धारित प्रक्रिया से हो सकता है और व्यक्ति सीधे मिशन के अनुबंध पर होता है। आउटसोर्सिंग में सरकार किसी एजेंसी से सेवा खरीदती है और कर्मचारी का नियोक्ता तकनीकी रूप से एजेंसी हो सकती है।इस मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि ये 17 पद मूल रूप से किस श्रेणी के स्वीकृत पद थे और मई 2023 का आदेश किस-किस नियुक्ति पद्धति पर लागू था।
यदि आदेश केवल एक प्रकार की भर्ती पर रोक लगाता था और आउटसोर्सिंग के लिए अलग नियम थे तो पूरी तस्वीर बदल सकती है। फिलहाल सीएमओ का स्पष्ट रुख यही है कि इन पदों की स्थानीय भर्ती नियमों के खिलाफ थी।
क्या दूसरी जिलों में भी ऐसी नियुक्तियां हुईं?
यदि वर्ष 2023 में पूरे उत्तर प्रदेश के लिए मानव संसाधन भर्ती व्यवस्था बदली गई थी, तो जांच केवल नोएडा तक सीमित रखने के बजाय यह भी देखा जाना चाहिए कि दूसरे जिलों में मई 2023 के बाद स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन स्थानीय स्तर से नियुक्त तो नहीं किए गए।केंद्रीकृत NHM डेटाबेस में पदभार ग्रहण तिथि और नियुक्ति प्राधिकारी का मिलान करके यह जांच तकनीकी रूप से संभव है।
यदि नोएडा अकेला मामला है तो स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी अधिक स्पष्ट होगी। यदि दूसरे जिलों में भी ऐसा हुआ तो समस्या नियमों के संचार या राज्यव्यापी संक्रमण व्यवस्था में हो सकती है।
वेतन रोकने से अस्पताल की सेवा पर असर भी संभव
15 स्टाफ नर्स और दो लैब टेक्नीशियन किसी जिला अस्पताल के लिए छोटी संख्या नहीं है। यदि वे ड्यूटी से हटते हैं या वेतन रुकने के कारण काम बंद करते हैं तो नर्सिंग और पैथोलॉजी सेवाओं पर दबाव पड़ सकता है।इसलिए प्रशासन को दो काम एक साथ करने होंगे भर्ती की वैधानिकता की जांच और मरीजों की सेवा प्रभावित न होने देना।यदि पद वास्तव में अस्पताल के लिए आवश्यक हैं और राज्य मुख्यालय से स्वीकृत हैं, तो वैध तरीके से नई नियुक्ति या मौजूदा कर्मचारियों की स्थिति नियमित करने की संभावना भी नियमों के अनुसार देखनी पड़ सकती है।मरीज किसी प्रशासनिक भर्ती विवाद की कीमत न चुकाए, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
केवल वेतन रोकना अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकती
यदि जांच में साबित होता है कि नियम स्पष्ट होने के बावजूद अधिकारियों ने जानबूझकर नियुक्तियां कीं, तो जवाबदेही केवल कर्मचारियों पर नहीं बल्कि निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर भी तय होनी चाहिए।विभाग को कम से कम पांच चीजें स्थापित करनी होंगी मई 2023 का मूल शासन/NHM आदेश क्या था, उसके बाद जिला अस्पताल को वह आदेश कब प्राप्त हुआ, प्रत्येक नियुक्ति किस अधिकारी की स्वीकृति पर हुई, एजेंसी को किसने निर्देश दिया और वेतन बिल किस-किस स्तर से प्रमाणित होकर निकला।इन पांच दस्तावेजों की श्रृंखला सामने आते ही यह पता चल सकता है कि मामला साधारण प्रक्रियागत भूल था या जानबूझकर नियमों की अनदेखी।
तीन साल बाद गड़बड़ी पकड़ना नियंत्रण प्रणाली की कमजोरी भी
इस प्रकरण में एक ओर नई डिजिटल व्यवस्था की सफलता दिखाई देती है व्यक्तिगत ज्वाइनिंग तारीख मांगते ही विसंगति पकड़ में आ गई। दूसरी ओर पुरानी निगरानी प्रणाली की कमजोरी भी उजागर होती है।यदि छह नर्स और दो लैब टेक्नीशियन अगस्त 2023 से लगातार वेतन ले रहे थे तो उनके दर्जनों मासिक भुगतान हुए होंगे। हर भुगतान पर व्यवस्था के किसी न किसी अधिकारी ने प्रमाणन किया होगा। फिर भी नियुक्ति प्राधिकारी का मिलान नहीं हुआ।
यही इस मामले का सबसे बड़ा प्रशासनिक सबक है सरकारी भर्ती की जांच केवल नियुक्ति के दिन नहीं, पहले वेतन से ही स्वचालित रूप से होनी चाहिए।
कर्मचारी का नाम, पद, स्वीकृत पद संख्या, भर्ती विज्ञापन, चयन सूची, नियुक्ति आदेश, नियुक्ति करने वाला प्राधिकारी और ज्वाइनिंग तिथि यदि एक डिजिटल मानव संसाधन प्रणाली से जुड़े हों तो कोई नियम विरुद्ध नियुक्ति तीन साल तक वेतन नहीं ले सकती।
17 लोगों से कहीं बड़ा है मामला
ऊपरी तौर पर यह 17 कर्मचारियों और ₹79 लाख का मामला दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में इसकी जांच तीन स्तरों पर होनी चाहिए कर्मचारी की नियुक्ति वैध थी या नहीं, अधिकारियों ने किस अधिकार से नियुक्ति की और भुगतान नियंत्रण व्यवस्था इसे इतने समय तक क्यों नहीं पकड़ सकी।यह भी संभव है कि अंततः जांच में कर्मचारियों की कोई गलती न निकले और पूरी जिम्मेदारी प्रशासनिक निर्णय पर तय हो। इसलिए अभी उन्हें दोषी घोषित करना जल्दबाजी होगी।
सबसे बड़ा प्रश्न वही है जिसका जवाब कागजों में मौजूद होना चाहिए: मई 2023 के बाद यदि नोएडा जिला अस्पताल को स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन भर्ती करने का अधिकार नहीं था, तो अगस्त 2023 में आठ और 2025 में नौ कर्मचारियों को किसने नियुक्त किया? उनके नियुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर किसके हैं? एजेंसी को आदेश किसने दिया? और लगभग ₹79 लाख का भुगतान जारी करने से पहले किसी स्तर पर यह सवाल क्यों नहीं उठा?सइन चार सवालों के जवाब मिल गए तो तय हो जाएगा कि यह महज प्रक्रियागत चूक थी या तीन साल तक नियमों के समानांतर चलती रही एक ऐसी भर्ती व्यवस्था, जिसे किसी ने रोकने की कोशिश ही नहीं की।