बहुरेंगे JPNIC के दिन! 9 साल से धूल फाँक रही 1000 करोड़ी इमारत को संवारने में खर्च होंगे ₹100 करोड़, जानें पूरा राजनीतिक विवाद

Lucknow News: लखनऊ के जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) के जीर्णोद्धार की तैयारी तेज हो गई है। 100 करोड़ रुपये से अधिक के बजट से अधूरे काम पूरे कर इस विश्वस्तरीय सेंटर को फिर से विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।

Update:2026-07-31 15:04 IST

Jayaprakash Narayan International Centre

Lucknow News: लखनऊ के गोमतीनगर में समाजवादी सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा जयप्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (JPNIC) पिछले करीब नौ सालों से राजनीतिक रस्साकशी, प्रशासनिक उपेक्षा और बजट के अभाव में सफेद हाथी बना खड़ा था। अब खबर है कि करोड़ों की लागत से बनी इस बदहाल इमारत की किस्मत फिर बदलने वाली है। 100 करोड़ रुपये से अधिक का बजट खर्च कर इस सेंटर का जीर्णोद्धार और फिनिशिंग का काम पूरा करने की योजना है। हाल ही में आवास सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद इसे लेकर हलचल तेज हो गई है।

जयप्रकाश जयंती, सील हुआ गेट और अखिलेश का 'दीवार फांदना'

JPNIC केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सियासत का एक बड़ा केंद्र बिंदु रहा है। इसे लेकर भाजपा सरकार और समाजवादी पार्टी के बीच लंबे समय से ज़ुबानी जंग और सियासी शह-मात का खेल चलता रहा है:

जयंती पर हाई-वोल्टेज ड्रामा: हर साल 11 अक्तूबर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर JPNIC सुर्खियों में आ जाता है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव जब भी यहाँ लोकनायक की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुँचते हैं, तो प्रशासन सुरक्षा या निर्माण कार्य का हवाला देकर परिसर को सील कर देता है।

गेट लांघकर माल्यार्पण: अक्टूबर 2023 में जब पुलिस प्रशासन ने JPNIC के मुख्य गेट को टीन के शेड और बैरिकेड्स लगाकर बंद कर दिया था, तब अखिलेश यादव ने टीन शेड की ऊंची दीवार लांघकर भीतर प्रवेश किया था और जेपी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाए थे। इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं और सियासी हलचल मच गई थी।

भ्रष्टाचार के आरोप बनाम श्रेय की राजनीति: सत्ता पक्ष का आरोप रहा है कि सपा सरकार के दौरान इस प्रोजेक्ट के निर्माण में भारी वित्तीय अनियमितता और फिजूलखर्ची हुई, जिसकी वजह से इसकी जांच बैठाई गई। वहीं, समाजवादी पार्टी का तर्क है कि वर्तमान सरकार बदलाखोरी की राजनीति के तहत उनके कार्यकाल की इस विश्वस्तरीय इमारत को जानबूझकर बर्बाद होने दे रही है ताकि इसका श्रेय सपा को न मिले।

2013 में शुरुआत, 2017 से बंद: आखिर क्यों अटकी रही परियोजना?

20 एकड़ में फैले JPNIC का निर्माण साल 2013 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में शुरू हुआ था।

अधूरा काम और अटका बजट: 2017 में सत्ता परिवर्तन के समय इसका निर्माण कार्य अंतिम चरण में था और फिनिशिंग के लिए करीब 50 करोड़ रुपये के काम बाकी थे। लेकिन सरकार बदलने के बाद बजट रुक गया और काम ठप हो गया।

'जहाँ है, जैसा है' का फ्लॉप प्लान: एलडीए ने इसे 'जहाँ है, जैसा है' (As is where is) की तर्ज पर निजी कंपनियों को सौंपकर संचालित करने का मन बनाया, पर कोई निजी डेवलपर आगे नहीं आया।

एलडीए को कमान: पहले शासन की एक उच्चस्तरीय समिति इसका संचालन देख रही थी, लेकिन बीते साल जुलाई में शासन ने इसे पूरी तरह लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) को सौंप दिया। अब सचिव आवास बलकार सिंह और एलडीए वीसी की बैठक के बाद इसके पुनरुद्धार की कवायद शुरू हुई है।

रखे-रखे जर्जर हुई संपत्ति: अब क्या-क्या सुधारना पड़ेगा?

नौ साल तक बंद रहने के कारण इस बहुमंजिला और आधुनिक इमारत को भारी नुकसान हुआ है:

सड़ गए उपकरण: लिफ्ट, जनरेटर और बिजली के तार बंद पड़े-पड़े पूरी तरह खराब हो चुके हैं।

टूट-फूट और गंदगी: खिड़कियों के शीशे, दीवारों पर लगे महंगे पत्थर और टाइल्स टूटकर गिर रहे हैं। फर्श धूल और गंदगी से काला पड़ चुका है।

स्पोर्ट्स और ऑटोमेशन खराब: स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के डिजिटल स्क्रीन बोर्ड, कुर्सियाँ और सोफे बर्बाद हो चुके हैं। अब मुख्य द्वार, बाउंड्री वॉल और आंतरिक फिनिशिंग पर दोबारा भारी-भरकम राशि खर्च होगी।

विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस है JPNIC

राजनीतिक गतिरोध से इतर यदि इस कॉम्प्लेक्स की खूबियों को देखें, तो यह देश के बेहतरीन सेंटर्स में से एक है:

विशाल परिसर: 20 एकड़ में फैला हुआ।

हेलीपैड: इमारत की 18वीं मंजिल पर आधुनिक हेलीपैड बना है।

ऑडिटोरियम: 1,000 और 2,000 क्षमता वाले दो भव्य सभागार।

स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स: ऑल-वेदर (हर मौसम के अनुकूल) स्विमिंग पूल, डाइविंग पूल और लॉन टेनिस कोर्ट।

पार्किंग व कैफे: 700 गाड़ियों की क्षमता वाली 3 मंजिला मल्टीस्टोरी पार्किंग (जिसका इस्तेमाल पिछले 4 महीनों से शुरू किया गया है) और रूफटॉप कैफेटेरिया।

JPNIC को लेकर अधिकारी अभी खुलकर बोलने से कतरा रहे हैं, क्योंकि मामला सीधे तौर पर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी और सत्तापक्ष की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। बहरहाल, यदि 100 करोड़ रुपये के नए बजट से इस इमारत का काम पूरा होता है, तो यह लखनऊ वासियों के लिए एक बेहतरीन सौगात साबित होगी और जनता के टैक्स का करोड़ों रुपया बर्बाद होने से बच जाएगा।

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