Lucknow News: लखनऊ में साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क, 3,707 म्यूल खाते और 2,222 संदिग्ध मोबाइल नंबर रडार पर
Lucknow News: लखनऊ में साइबर ठगी के खिलाफ पुलिस की बड़ी कार्रवाई सामने आई है। 3,707 म्यूल खाते, 2,222 संदिग्ध मोबाइल नंबर और 678 IMEI रडार पर हैं। जानें कैसे चलता है साइबर ठगों का मनी ट्रेल नेटवर्क।
Lucknow News (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच पुलिस के सामने अब केवल ठगों को पकड़ना ही चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि उन हजारों बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और मोबाइल उपकरणों की पूरी श्रृंखला तोड़ना भी बड़ी परीक्षा बन गई है जिनका इस्तेमाल ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में किया जा रहा है। राजधानी लखनऊ में बीते कुछ महीनों में 3,707 संदिग्ध ‘म्यूल बैंक खातों’ की पहचान की गई है। इनमें से 3,364 खातों को फ्रीज कराया जा चुका है, जबकि 343 खातों पर कार्रवाई बाकी है। इसी अवधि में 2,222 संदिग्ध मोबाइल नंबर और 678 IMEI नंबर भी चिह्नित किए गए हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध अब किसी एक मोबाइल या बैंक खाते से संचालित होने वाला अपराध नहीं रह गया है, बल्कि इसके पीछे बैंक खाते उपलब्ध कराने वालों, सिम जुटाने वालों, रकम आगे भेजने वालों और अंतिम लाभार्थियों की कई परतों वाला नेटवर्क विकसित हो रहा है।
लखनऊ पुलिस के अनुसार शहर के पूर्वी जोन में म्यूल खातों की संख्या सबसे अधिक मिली है। गोमतीनगर, गुडंबा और बख्शी का तालाब सहित पूर्वी क्षेत्र से 1,425 म्यूल खाते सामने आए हैं। दूसरी ओर संदिग्ध मोबाइल कनेक्शनों के मामले में दक्षिणी जोन सबसे आगे है, जहां 722 नंबर चिह्नित किए गए। एक जनवरी से 21 जून 2026 के बीच राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल से जुड़े रिकॉर्ड में लखनऊ के 2,222 संदिग्ध मोबाइल नंबर अपलोड किए गए, जिनमें 1,710 को ब्लॉक कराया गया। इसी अवधि में सामने आए 678 संदिग्ध IMEI नंबरों में से 599 पर ब्लॉकिंग की कार्रवाई की जा चुकी है।
म्यूल अकाउंट क्या है और साइबर ठग इसे क्यों इस्तेमाल करते हैं?
साइबर अपराध की दुनिया में ‘म्यूल अकाउंट’ उस बैंक खाते को कहा जाता है जिसका इस्तेमाल अपराध से प्राप्त रकम लेने, कुछ समय रखने या दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है। यह खाता जरूरी नहीं कि मुख्य साइबर ठग के नाम पर हो। अक्सर किसी सामान्य व्यक्ति, बेरोजगार युवक, ग्रामीण, मजदूर, छात्र या आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति का खाता कमीशन का लालच देकर इस्तेमाल कराया जाता है।
कई बार खाताधारक को बताया जाता है कि उसके खाते में किसी कारोबारी भुगतान की रकम आएगी और बदले में उसे एक निश्चित प्रतिशत दिया जाएगा। कुछ मामलों में उससे ATM कार्ड, चेकबुक, पासबुक, मोबाइल सिम और इंटरनेट बैंकिंग का नियंत्रण तक ले लिया जाता है। दूसरे मामलों में खाताधारक की जानकारी या दस्तावेजों का दुरुपयोग करके खाता खोल दिया जाता है।
अपर पुलिस उपायुक्त अपराध किरण यादव के अनुसार साइबर अपराधी सीधे अपने बैंक खाते में ठगी की रकम मंगाने से बचते हैं। पीड़ित द्वारा भेजी गई रकम पहले किसी म्यूल खाते में जाती है और फिर उसे तेजी से दूसरे, तीसरे और चौथे खाते में भेजा जाता है। कई मामलों में एक बड़ी रकम को छोटी-छोटी राशियों में बांटकर अलग-अलग खातों में भेज दिया जाता है।इसे ही पुलिस की भाषा में अपराध की ‘मनी ट्रेल’ को जटिल बनाना कहा जा सकता है।
एक पीड़ित, लेकिन रकम गुजर सकती है दर्जनों खातों से
मान लीजिए किसी व्यक्ति से साइबर ठग ने पांच लाख रुपये ठगे। अपराधी इन पांच लाख रुपये को अपने खाते में लेने के बजाय पहले पांच या दस अलग-अलग खातों में भेज सकता है। वहां से रकम फिर दूसरे खातों में जाती है। कुछ पैसा नकद निकाला जा सकता है, कुछ UPI के जरिए स्थानांतरित हो सकता है और कुछ को डिजिटल संपत्ति अथवा दूसरे माध्यम में बदला जा सकता है।इस पूरे खेल का उद्देश्य यह है कि जब पुलिस पीड़ित के बैंक खाते से रकम का रास्ता खोजना शुरू करे तो उसके सामने एक लंबी श्रृंखला मिले।
लेकिन यही म्यूल खाते पुलिस के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुराग भी बनते हैं। यदि शुरुआती खाते को समय रहते फ्रीज करा दिया जाए तो चोरी की रकम का कुछ हिस्सा बचाया जा सकता है और बैंक KYC, मोबाइल नंबर, IP लॉग तथा लेनदेन के जरिए अगले खाते तक पहुंचा जा सकता है।इसी कारण साइबर फ्रॉड की शिकायत में समय सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सरकार का राष्ट्रीय साइबर अपराध तंत्र वित्तीय साइबर ठगी की शिकायत के लिए 1930 हेल्पलाइन और National Cyber Crime Reporting Portal उपलब्ध कराता है।
3,364 खाते फ्रीज करने का मतलब पैसा जब्त होना नहीं
म्यूल बैंक खाते फ्रीज कराए जाने को यह नहीं समझना चाहिए कि उस खाते में मौजूद पूरी रकम स्वतः सरकार या पीड़ित को मिल जाती है। खाता फ्रीज होने का मतलब सामान्यतः यह है कि संदिग्ध रकम को आगे निकालने या ट्रांसफर करने पर रोक लगाई गई है।इसके बाद पुलिस और बैंक यह देखते हैं कि खाते में आई रकम किस शिकायत से जुड़ी है, कितनी रकम अपराध की है और किस हिस्से पर वैधानिक दावा बनता है। पीड़ित को रकम वापस मिलने की प्रक्रिया पुलिस जांच, बैंक रिकॉर्ड और आवश्यक न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर कर सकती है।इसीलिए साइबर ठगी की सूचना जितनी जल्दी दी जाती है, रकम को आगे जाने से रोकने की संभावना उतनी बढ़ सकती है।
मोबाइल नंबर के बाद IMEI भी क्यों ब्लॉक किया जा रहा?
साइबर ठगों की पहचान केवल बैंक खातों से नहीं होती। उनके लिए मोबाइल फोन और सिम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। फर्जी कॉल, OTP हासिल करना, बैंक खाते चलाना, WhatsApp या Telegram पर संपर्क करना और पीड़ितों से बातचीत—इन सबके लिए मोबाइल कनेक्शन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसीलिए पुलिस संदिग्ध मोबाइल नंबरों के साथ IMEI नंबर भी ट्रैक कर रही है।
IMEI यानी International Mobile Equipment Identity मोबाइल हैंडसेट की पहचान संख्या होती है। सिम कार्ड बदल देने पर मोबाइल नंबर तो बदल सकता है, लेकिन उसी हैंडसेट का IMEI सामान्यतः वही रहता है। इसलिए किसी संदिग्ध फोन का IMEI चिह्नित होने पर केवल सिम बदलना अपराधी को पूरी तरह नई पहचान नहीं देता।लखनऊ में 678 संदिग्ध IMEI चिह्नित होने और इनमें से 599 को ब्लॉक कराने की कार्रवाई इसी रणनीति का हिस्सा है।
संदिग्ध नंबरों का राष्ट्रीय डेटाबेस भी तैयार हो रहा
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी I4C ने एक Suspect Repository विकसित किया है, जहां साइबर अपराध शिकायतों के आधार पर सामने आए संदिग्ध मोबाइल नंबर, ई-मेल, बैंक खाते, UPI ID और सोशल मीडिया पहचान की जांच की जा सकती है। हालांकि स्वयं I4C स्पष्ट करता है कि यह डेटाबेस नागरिक शिकायतों पर आधारित है और इसमें दर्ज किसी पहचान को अपने आप अपराध सिद्ध होना नहीं माना जा सकता।
यह सावधानी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोई बैंक खाता या मोबाइल नंबर कई कारणों से जांच के दायरे में आ सकता है। अंतिम आपराधिक जिम्मेदारी पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही निर्धारित होती है।
खाते उपलब्ध कराने के लिए अलग गिरोह सक्रिय
पुलिस के लिए चिंता का बड़ा कारण यह भी है कि म्यूल खाते अब केवल संयोग से उपलब्ध नहीं हो रहे, बल्कि कथित तौर पर इन्हें जुटाने के लिए अलग नेटवर्क तैयार हो रहे हैं।ऐसे गिरोह ग्रामीण क्षेत्रों, छात्रों और बेरोजगार युवाओं को निशाना बनाते हैं। कहा जाता है—“खाते में केवल पैसा आएगा और आगे भेजना है, बदले में कमीशन मिलेगा।” किसी व्यक्ति को प्रति लेनदेन कुछ हजार रुपये या रकम का प्रतिशत देने का लालच दिया जाता है।
कभी-कभी बैंक खाता खोलने के बदले ही रकम देने की पेशकश होती है। इसके बाद खाताधारक से ATM कार्ड, रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर और इंटरनेट बैंकिंग तक ले ली जाती है।यही वह बिंदु है जहां एक सामान्य व्यक्ति कुछ हजार रुपये के लालच में गंभीर कानूनी परेशानी में फंस सकता है।
‘मुझे पता नहीं था’ हमेशा नहीं बचाएगा
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर अपना बैंक खाता किसी अन्य व्यक्ति को पैसे मंगाने और आगे भेजने के लिए देता है तो साइबर अपराध की जांच उसके दरवाजे तक पहुंच सकती है।पुलिस बैंक KYC से खाताधारक की पहचान कर सकती है। इसके बाद सवाल उठेगा कि उसके खाते में इतनी रकम क्यों आई, किसके कहने पर आगे भेजी गई, ATM किसके पास था और कमीशन किसे मिला।
हर म्यूल खाताधारक आवश्यक रूप से मुख्य साइबर अपराधी नहीं होता—कुछ लोग स्वयं धोखे का शिकार भी हो सकते हैं—लेकिन कमीशन लेकर जानबूझकर खाता उपलब्ध कराना जोखिम भरा और संभावित रूप से आपराधिक कृत्य हो सकता है।
इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति को अपना बैंक खाता, ATM कार्ड, UPI या नेट बैंकिंग इस्तेमाल करने देना सामान्य आर्थिक व्यवहार नहीं माना जाना चाहिए।
बिना OTP बताए क्रेडिट कार्ड से 2.27 लाख रुपये निकले
इसी बीच लखनऊ में दो नए साइबर ठगी के मामलों ने यह भी दिखाया है कि हर फ्रॉड OTP पूछकर ही नहीं किया जाता।पीजीआई क्षेत्र के तेलीबाग स्थित बलदेव विहार कॉलोनी निवासी राहुल सिंह दोहरे ने पुलिस को बताया कि उन्होंने किसी व्यक्ति को OTP या क्रेडिट कार्ड नंबर नहीं दिया था। इसके बावजूद 6 अगस्त को उनके क्रेडिट कार्ड से कई लेनदेन में करीब 2.27 लाख रुपये कट गए।
उन्होंने पीजीआई थाने में मुकदमा दर्ज कराया है। अब जांच में यह देखा जाएगा कि कार्ड डिटेल किस तरह इस्तेमाल हुई, लेनदेन किस माध्यम से किया गया और क्या किसी डिजिटल खाते या डिवाइस से कार्ड की जानकारी पहले ही समझौता हो चुकी थी।यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर सुरक्षा में केवल OTP नहीं बताना पर्याप्त सुरक्षा नहीं है। कार्ड की जानकारी फिशिंग वेबसाइट, संक्रमित डिवाइस, पहले हुए डेटा उल्लंघन या किसी अन्य माध्यम से भी अपराधियों के हाथ लग सकती है।
फोन बंद हुआ, ऑन किया तो 1.76 लाख गायब
दूसरा मामला हसनगंज के बादशाहबाग निवासी श्वेता कश्यप का है। उनके अनुसार 5 अगस्त को उनका फोन अचानक बंद हो गया। जब फोन दोबारा चालू किया तो उन्हें ई-मेल से पता चला कि बैंक खाते से 1.76 लाख रुपये निकल चुके हैं।उन्होंने तत्काल 1930 पर शिकायत दर्ज कराने के बाद हसनगंज थाने में मुकदमा कराया।
फोन का अचानक नेटवर्क या सेवा खो देना कुछ मामलों में SIM swap अथवा मोबाइल कनेक्शन से छेड़छाड़ का संभावित संकेत भी हो सकता है, हालांकि इस मामले में जांच पूरी होने से पहले यह नहीं कहा जा सकता कि यही कारण था।
यदि किसी व्यक्ति का मोबाइल अचानक लंबे समय के लिए नेटवर्क खो दे और उसी समय बैंकिंग संदेश आना बंद हो जाएं, तो उसे मोबाइल ऑपरेटर और बैंक दोनों से तत्काल संपर्क करना चाहिए।
4.03 लाख या 4.53 लाख? मूल आंकड़े में गणित भी जांचने की जरूरत
दोनों मामलों में दी गई रकम 2.27 लाख रुपये और 1.76 लाख रुपये है। इनका योग 4.03 लाख रुपये होता है, 4.53 लाख रुपये नहीं। इसलिए मूल सूचना में “कुल 4.53 लाख” वाला आंकड़ा गणितीय रूप से मेल नहीं खाता। उपलब्ध विवरण के आधार पर दोनों मामलों की कुल रकम करीब 4.03 लाख रुपये ही बनती है।
साइबर अपराध में पहला घंटा क्यों महत्वपूर्ण
साइबर वित्तीय अपराध में पैसे को म्यूल खातों की लंबी श्रृंखला में घुमाने का सबसे बड़ा हथियार गति है। पीड़ित के खाते से रकम निकलते ही अपराधी उसे अगले खाते में भेजने की कोशिश करता है।इसीलिए जैसे ही अनधिकृत बैंकिंग लेनदेन दिखाई दे—
तुरंत बैंक को सूचित करें, कार्ड/UPI/नेट बैंकिंग ब्लॉक कराएं और 1930 पर शिकायत करें।
इसके बाद राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर संबंधित थाना या साइबर पुलिस से संपर्क किया जाना चाहिए। 1930 राष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की शिकायत के लिए निर्धारित हेल्पलाइन है। (I4C)
इन सात गलतियों से बचना सबसे जरूरी
अनजान व्यक्ति को OTP, PIN, CVV या नेट बैंकिंग पासवर्ड कभी न दें। किसी के भेजे लिंक से बैंकिंग एप, APK फाइल या रिमोट एक्सेस एप इंस्टॉल न करें। पुलिस, बैंक, CBI, ED या कोई अन्य सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर धमकाकर किसी “सुरक्षित खाते” में पैसा भेजने को नहीं कहती।कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए न दें। खाते में अनजान स्रोत से पैसा आए तो उसे दूसरे खाते में भेजने के बजाय बैंक को सूचना दें। SIM अचानक बंद हो जाए तो उसे केवल नेटवर्क की समस्या मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज न करें। और संदिग्ध नंबर, UPI ID, बैंक खाता, वेबसाइट या चैट के स्क्रीनशॉट मिटाने के बजाय सुरक्षित रखें, क्योंकि वही आगे पुलिस की जांच में महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बन सकते हैं।
असली लड़ाई ठग से ज्यादा उसके पूरे नेटवर्क से
लखनऊ में सामने आए 3,707 म्यूल खाते, 2,222 संदिग्ध मोबाइल नंबर और 678 IMEI साइबर अपराध की बदलती संरचना का संकेत हैं। ठगी करने वाला व्यक्ति देश या विदेश में कहीं भी बैठा हो सकता है, लेकिन पैसे को बैंकिंग प्रणाली से निकालने के लिए उसे वास्तविक खातों, सिम कार्ड और लोगों के नेटवर्क की जरूरत पड़ती है।
इसीलिए पुलिस की रणनीति भी अब केवल कॉल करने वाले ठग को खोजने तक सीमित नहीं रह सकती। म्यूल अकाउंट फ्रीज करना, मोबाइल नंबर और IMEI ब्लॉक करना, बैंक KYC की कड़ी जोड़ना और रकम के अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना—साइबर अपराध के खिलाफ लड़ाई का नया केंद्र यही है।और आम लोगों के लिए सबसे बड़ा संदेश भी साफ है—कुछ हजार रुपये के कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता देना केवल आर्थिक जोखिम नहीं, किसी बड़े साइबर अपराध की ‘मनी ट्रेल’ का हिस्सा बन जाने का खतरा भी है।