मजदूर-किसानों के मुद्दों पर सड़कों पर उतरे केंद्रीय श्रम संगठन और संयुक्त किसान मोर्चा, पुलिस ने रोका मार्च
Lucknow News: लखनऊ में मजदूरों और किसानों ने श्रम कानूनों में बदलाव, निजीकरण, महंगाई और बढ़ती कृषि लागत के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। पुलिस ने केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास मार्च रोक दिया।
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Lucknow News: मजदूरों, किसानों और महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्रीय श्रम संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर सोमवार को राजधानी में जोरदार प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर श्रमिक विरोधी नीतियां अपनाने, निजीकरण को बढ़ावा देने, महंगाई बढ़ाने और किसानों की समस्याओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में मजदूर और किसान परिवर्तन चौक पर जुटे और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
प्रदर्शनकारियों की योजना परिवर्तन चौक से पैदल मार्च निकालकर जनभवन पहुंचने और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने की थी। हालांकि, पुलिस ने केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास बैरिकेडिंग कर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया। इससे मौके पर काफी देर तक नोकझोंक और विरोध की स्थिति बनी रही। प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेडिंग के सामने ही सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए अपनी मांगें उठाईं।
वक्ताओं ने कहा कि कोरोना काल में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर श्रम कानूनों में बदलाव किए गए। मजदूरों का आरोप है कि लंबे संघर्ष के बाद हासिल किए गए आठ घंटे के कार्यदिवस के अधिकार को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। काम के घंटे बढ़ाकर 12 घंटे किए जाने की संभावित व्यवस्था को उन्होंने मजदूर विरोधी बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने निजीकरण के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। उनका कहना था कि सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण का सीधा असर मजदूरों और आम जनता पर पड़ रहा है। निजीकरण से रोजगार की सुरक्षा और श्रमिकों के अधिकार कमजोर होने का आरोप लगाया गया।
संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े नेताओं ने किसानों की समस्याओं को उठाते हुए कहा कि महंगी बिजली, डीजल-पेट्रोल, खाद, बीज और अन्य कृषि संसाधनों के कारण खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। किसानों को समय पर बीज और जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने बिजली व्यवस्था के निजीकरण की कोशिशों पर भी सवाल उठाए। वक्ताओं ने किसानों के आंदोलनों के दौरान सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग रखने वाले किसानों और मजदूरों की आवाज दबाने के बजाय सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
प्रदर्शनकारियों ने बड़े उद्योगपतियों को कथित तौर पर दिए जा रहे लाभ और मजदूर-किसानों की बदहाल स्थिति के बीच अंतर का मुद्दा उठाते हुए सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग की। उन्होंने कहा कि आंदोलन मजदूरों, किसानों और आम जनता के अधिकारों की लड़ाई है और मांगें पूरी होने तक संघर्ष जारी रहेगा।