जलभराव अब बनेगा कमाई का जरिया, पांच जिलों के 500 किसान करेंगे मखाना की वैज्ञानिक खेती
UP News: उत्तर प्रदेश के हरदोई, सीतापुर, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी और बहराइच में 500 किसानों के साथ मखाना की वैज्ञानिक खेती शुरू होगी। जलभराव वाले क्षेत्रों को आय के नए स्रोत में बदलने की तैयारी है।
Makhana Farming
UP News: जिस जलभराव को अब तक खेती की सबसे बड़ी बाधाओं में गिना जाता था, वही अब लखनऊ मंडल और आसपास के जिलों के किसानों के लिए नई आय का माध्यम बनने जा रहा है। हरदोई, सीतापुर, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी और बहराइच के जलभराव वाले इलाकों में मखाना की वैज्ञानिक खेती शुरू कराने की तैयारी की गई है। इसके लिए पांच जिलों से 500 किसानों का चयन किया गया है, जिन्हें आधुनिक तकनीक, गुणवत्तायुक्त बीज, प्रसंस्करण और विपणन से जोड़कर मखाना उत्पादन का नया मॉडल विकसित किया जाएगा।
परियोजना के तहत ऐसे खेतों, तालाबों और निचले इलाकों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां लंबे समय तक पानी जमा रहने के कारण परंपरागत फसलों की खेती मुश्किल होती है। योजना का उद्देश्य ऐसी भूमि को बेकार मानकर छोड़ने के बजाय उसे आर्थिक संपत्ति में बदलना है।
सीतापुर बनेगा परियोजना का केंद्र
मखाना विकास कार्यक्रम के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, कटिया, सीतापुर को नोडल केंद्र बनाया गया है। परियोजना में वैज्ञानिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों का भी सहयोग लिया जा रहा है। किसानों को केवल खेती की तकनीक बताने तक कार्यक्रम सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्पादन से लेकर तैयार मखाने की बिक्री तक पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित करने की तैयारी है।
पहले चरण में पांचों जिलों में प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। किसानों को तालाब की तैयारी, बीज चयन, पौध स्थापना, पोषक तत्व प्रबंधन, जल प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण, बीज संग्रहण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और बाजार तक पहुंच बनाने की तकनीक समझाई जा रही है।
हर जिले से 100 किसान चुने गए
सीतापुर के बिसवां, मिश्रिख, सिधौली और लहरपुर विकास खंडों से 100 प्रगतिशील किसानों का चयन प्रदर्शन कार्यक्रम के लिए किया गया है। इसी तरह हरदोई, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी और बहराइच से भी 100-100 किसानों को योजना में शामिल किया गया है।
परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि चयनित किसानों के खेतों और तालाबों को मॉडल इकाई के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि आसपास के अन्य किसान भी वास्तविक उत्पादन देखकर इस खेती को अपना सकें।
फरवरी-मार्च में शुरुआत, आठ से नौ महीने में फसल तैयार
कृषि वैज्ञानिक डॉ. शुभम सिंह के अनुसार मखाना की खेती सामान्यतः फरवरी-मार्च में शुरू की जाती है और फसल को तैयार होने में लगभग आठ से नौ महीने लगते हैं। अगस्त से अक्टूबर के बीच बीज संग्रहण का प्रमुख समय होता है।
एक हेक्टेयर क्षेत्र में खेती के लिए लगभग 80 से 100 किलोग्राम गुणवत्तायुक्त बीज की जरूरत पड़ सकती है। वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने पर एक हेक्टेयर में औसतन 16 से 20 क्विंटल कच्चे मखाना बीज का उत्पादन संभव है। अनुकूल परिस्थितियों और बेहतर प्रबंधन में यह उत्पादन 30 क्विंटल से अधिक तक पहुंच सकता है।
कच्चे बीज से तैयार मखाने तक बढ़ती है कीमत
मखाना की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसका प्रसंस्करण है। तालाब से निकला कच्चा बीज सीधे उसी कीमत पर नहीं बिकता, जिस कीमत पर बाजार में तैयार मखाना मिलता है। बीज को सुखाने, गर्म करने और फोड़ने की प्रक्रिया के बाद तैयार होने वाले सफेद मखाने का बाजार मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।
गुणवत्ता, आकार, ग्रेड और बाजार के अनुसार तैयार मखाने की कीमत में काफी अंतर होता है। अच्छी गुणवत्ता के मखाने का थोक बाजार मूल्य कई सौ रुपये प्रति किलो से ऊपर जा सकता है, जबकि खुदरा बाजार में प्रीमियम ग्रेड की कीमत और अधिक मिलती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल उत्पादन नहीं बल्कि प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को किसानों की वास्तविक आय बढ़ाने की कुंजी मान रहे हैं।
मखाना के साथ मछली पालन से दोहरी आमदनी की तैयारी
सीतापुर के किसान कमलेश सिंह एक एकड़ के तालाब में मखाना उत्पादन शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। तालाब की सफाई कराई जा चुकी है और उनकी योजना मखाना के साथ मछली पालन को जोड़ने की है।
इस तरह की समेकित खेती से किसान एक ही जल संसाधन से दो अलग-अलग आय स्रोत विकसित कर सकते हैं। यदि मखाना और मत्स्य पालन का वैज्ञानिक तालमेल सफल रहा तो यह जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयोगी कृषि मॉडल बन सकता है।
प्रोसेसिंग यूनिट भी लगेगी
कृषि विज्ञान केंद्र कटिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव के अनुसार परियोजना में मखाना उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण की व्यवस्था विकसित करने का भी प्रावधान है। केंद्र पर प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की योजना है, ताकि किसान केवल कच्चा बीज बेचने के लिए मजबूर न हों।
मार्केटिंग और मूल्य संवर्धन के लिए भी किसानों को अलग से प्रशिक्षित किया जाएगा। प्रत्येक जिले से कुछ किसानों को मॉडल किसान के रूप में विकसित किया जाएगा और उन्हें बीज तथा अन्य तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना है।
एफपीओ खरीदेगा किसानों का मखाना
किसानों की सबसे बड़ी चिंता उत्पादन के बाद बाजार की होती है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को भी परियोजना से जोड़ने की तैयारी है। सीतापुर के सरैया सरनी गांव में संचालित ओजोन एफपीओ के संचालक विकास सिंह तोमर के अनुसार संगठन किसानों से मखाना खरीदने और उन्हें बाजार से जोड़ने में सहयोग करेगा।
यदि उत्पादन, प्रसंस्करण और खरीद की यह पूरी श्रृंखला एक साथ विकसित होती है तो किसानों को स्थानीय बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और बेहतर कीमत हासिल करने में मदद मिल सकती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के जलभराव वाले इलाके बन सकते हैं नया मखाना बेल्ट
मखाना उत्पादन अब तक मुख्य रूप से बिहार से जुड़ा माना जाता रहा है, लेकिन पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी इसके लिए उपयुक्त जलवायु और जलभराव वाले क्षेत्र उपलब्ध हैं। यदि पांच जिलों का यह प्रयोग सफल होता है तो आने वाले वर्षों में इसे दूसरे जिलों तक बढ़ाया जा सकता है।
इससे ऐसे खेत और तालाब, जिन्हें किसान अब तक समस्या मानते थे, नियमित आय का स्रोत बन सकते हैं। खेती के साथ प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन जुड़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
जलभराव को कृषि संकट के बजाय संसाधन में बदलने की यह पहल सफल रही तो मखाना उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए केवल नई फसल नहीं, बल्कि फसल विविधीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया मॉडल बन सकता है।