दुनिया के सामने मेलोनी ने ट्रंप को किया बेइज्जत! NATO समिट में इटली ने पलटा Trump का प्लान, Meloni के जवाब से कांप उठा अमेरिका
NATO Summit 2025: इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने मीडिया के सामने आकर बताया कि उन्होंने और स्पेन ने "एक ही दस्तावेज़ पर साइन किया है," और यह कि कोई असहमति नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि “बैठक में सब एकमत थे, हर कोई जयकार कर रहा था, ‘शाबाश’ बोल रहा था।
NATO Summit 2025: नीदरलैंड के शांत शहर हैग में जब यूरोप के दिग्गज नेता इकट्ठा हुए, तो माहौल कूटनीतिक गर्मी से भर गया। नाटो शिखर सम्मेलन की इस ऐतिहासिक बैठक में जहां एक ओर रूस के बढ़ते सैन्य प्रभाव और यूक्रेन में जारी संघर्ष पर गंभीर चर्चा हुई, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा आर्थिक ‘बम’ गिराया, जिसने यूरोप की राजनीति को भीतर तक हिला दिया। ट्रंप ने एक सधे हुए लेकिन कड़े लहजे में मांग रखी कि नाटो के सदस्य देश अपने डिफेंस बजट को GDP के 5% तक बढ़ाएं। यह मांग जितनी आक्रामक थी, उतनी ही अप्रत्याशित भी — क्योंकि अब तक यह आंकड़ा अधिकतम 2% माना जाता था।
नाटो की एकजुटता के पीछे खिंची गई बजट की लक्ष्मण रेखा
बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में भले ही एकजुटता की बात कही गई — कि सभी सदस्य देश यूरो-अटलांटिक सुरक्षा के लिए एकमत हैं और रूस जैसे दीर्घकालिक खतरों के खिलाफ एक साथ खड़े हैं — लेकिन असल तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल निकली। स्पेन और इटली, दो बड़े यूरोपीय देश, इस समझौते पर हां तो कह रहे हैं, लेकिन उनकी आंखों में असहजता साफ झलक रही है।
जियोर्जिया मेलोनी का 'साफ-साफ पर साफ नहीं' बयान
इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने मीडिया के सामने आकर बताया कि उन्होंने और स्पेन ने "एक ही दस्तावेज़ पर साइन किया है," और यह कि कोई असहमति नहीं थी। उन्होंने दावा किया कि “बैठक में सब एकमत थे, हर कोई जयकार कर रहा था, ‘शाबाश’ बोल रहा था।” लेकिन कूटनीतिक भाषा में यह ‘एकमतता’ सिर्फ कागज पर थी, दिलों में नहीं। मेलोनी की मुस्कुराहट के पीछे दबा डर साफ था — आखिर GDP का 5% डिफेंस में झोंकना कोई छोटा फैसला नहीं।
स्पेन का ‘2.1% लक्ष्य’ और ट्रंप की खामोशी
स्पेन के अर्थव्यवस्था मंत्री कार्लोस क्यूरपो ने बयान दिया कि उनका देश अभी GDP का 2.1% डिफेंस पर खर्च करने की कोशिश कर रहा है, और उनके अनुसार "सटीक प्रतिशत पर ध्यान देना उचित नहीं है।" यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो स्पेन अभी ट्रंप की मांग से काफी दूर है, और वहां तक जाने की कोई जल्दी में नहीं है। अद्भुत बात यह रही कि ट्रंप, जो आम तौर पर हर विरोधी टिप्पणी पर आग उगलते हैं, उन्होंने इस बार मेलोनी या स्पेन के रुख पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। क्या यह चुप्पी रणनीति थी या आने वाले ‘सियासी विस्फोट’ की भूमिका? यह आने वाला समय बताएगा।
रूस के साये में यूरोप, लेकिन जेब की कीमत पर?
नाटो शिखर सम्मेलन का असली एजेंडा रूस के खतरे से निपटना था। यूक्रेन के समर्थन में और अधिक हथियार, संसाधन और रणनीतिक समर्थन की बात की गई। लेकिन ट्रंप ने इसे एक आर्थिक कसौटी में बदल दिया — अब जो जितना पैसा लगाएगा, वही असली भागीदार माना जाएगा। इस 5% लक्ष्य को लेकर कई यूरोपीय देशों में अंदरूनी राजनैतिक अस्थिरता का खतरा है। कई देश जहां आर्थिक सुस्ती से जूझ रहे हैं, वहीं इतनी बड़ी धनराशि को सेना पर खर्च करने का मतलब होगा — स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक योजनाओं पर सीधा असर।
ट्रंप की ‘बिजनेस डील’ वाली विदेश नीति फिर चर्चा में
डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति हमेशा से व्यापारिक सोच से प्रेरित रही है। नाटो के उनके पुराने बयानों में भी ये झलकता है — "अमेरिका पैसे देता है, बाकी सिर्फ सुरक्षा लेते हैं।" इस सोच का ही विस्तार अब 5% GDP की मांग के रूप में दिख रहा है।
क्या यूरोप मानेगा या टूटेगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या सभी नाटो देश ट्रंप की इस कठोर मांग के आगे झुकेंगे, या फिर भीतर ही भीतर कोई नया गठजोड़ पनपने लगेगा? क्या स्पेन और इटली जैसे देश अमेरिका के दबाव में आकर आर्थिक बोझ उठाएंगे या अपने-अपने रास्ते तलाशेंगे? शिखर सम्मेलन खत्म हुआ, लेकिन असली जंग अब शुरू होगी — देशों के अंदर, संसदों में, और बजट की बहसों में। क्योंकि जब युद्ध बाहर हो रहा हो और खर्च भीतर से निकाला जाए… तो लोकतंत्र की नींव सबसे पहले हिलती है और ट्रंप ने वही नींव हिलाने की शुरुआत हैग से कर दी है!