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Hindu Nav Varsh-2023 Kab Se Ho Raha Shuru :हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2080 कब से हो रहा शुरू, जानिए इससे जुड़ी खास बातें

Hindu Nav Varsh-2023 Kab Se Ho Raha Shuru : 22 मार्च से हिंदू नववर्ष विक्रम संवता 2080 की शुरुआत हो रही है। इस साल के संवत का नाम, इसके राजा, मंत्री कौन है। इन सबसे जुड़ी जानकारी इस खबर में मिलेगी।

Suman  Mishra
Written By Suman Mishra
Published on: 2 Sept 2023 12:51 PM IST
Hindu Nav Varsh-2023 Kab Se Ho Raha Shuru :हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2080 कब से हो रहा शुरू, जानिए इससे जुड़ी खास बातें
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Hindu Nav Varsh 2023 Kab Se Ho Raha Shuru विक्रम संवत हिंदू नववर्ष 2023

हिंदू नववर्ष का आरंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होता है। संवत्सर का मतलब 12 महीने की काल अवधि है। 22 मार्च बुधवार 2023 को हिन्दू नववर्ष प्रारंभ हो रहा है। फाल्गुन मास समाप्त होने के बाद चैत्र माह इस नववर्ष का पहला माह रहता है। इसे विक्रम संवत या नव संवत्सर भी कहते हैं। इस बार विक्रम संवत का 2080 वर्ष प्रारंभ होगा। इस संवत को महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, कर्नाटक युगादि, आंध्रा और तेलंगाना में उगादी, पंजाब में वैशाखी, कश्मीर में नवरेह, मणिपुर में सजिबु नोंगमा पानबा या मेइतेई चेइराओबा, सिंध में चेती चंड, गोवा और केरल में संवत्सर पड़वो नाम और अन्य राज्यों में विशु, चित्रैय तिरुविजा नाम से जाना जाता है।

जिस तरह प्रत्येक माह के नाम नियुक्त हैं, जैसे चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन, उसी तरह प्रत्येक आने वाले वर्ष का एक नाम होता है। 12 माह के 1 काल को संवत्सर कहते हैं और हर संवत्सर का एक नाम होता है। इस तरह 60 संवत्सर होते हैं। इस साल 2080 के नव संवत्सर को 'पिंगल' नाम से जाना जाएगा। इस संवत के राजा बुध और मंत्री शुक्र होंगे। 60 वर्ष का एक युग माना गया है। इसीलिए युगादि कहते हैं।

विक्रम संवत नव वर्ष का पहला दिन

विक्रम संवत 2080 का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। इस बार चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 22 मार्च को है ऐसे में सूर्योदय के आधार पर तिथि की गणना होती है। इस प्रकार विक्रम संवत 2080 का पहला दिन22 मार्च से शुरू होगा। जो बुधवार से हो रहा है, इसलिए वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार इस नव संवत्सर 2080 का नाम 'पिंगल' होगा । साल के शुरू में 'नल' नाम का संवत्सर रहेगा और पिंगल का प्रभाव 24 अप्रैल से शुरू होगा, लेकिन पूरे साल पूजा के संकल्प में 'नल' संवत्सर का ही प्रयोग किया जाएगा

इस वर्ष के राजा बुध देव और मंत्री शुक्र होंगे। इस साल महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा और उन्हें उनके कई मौलिक अधिकार मिलेंगे। कई अहम पदों पर भी वे आसीन होंगी।

नव संवत्सर की शुरूआत खास योग में

नव संवत्सर 2080 में 21 अप्रैल से 28 अक्टूबर तक गुरु तथा राहु दोनों मेष राशि में रहेंगे। वर्ष के आरंभ में सूर्य, बुध, गुरु तथा चंद्रमा की चतुर्ग्रही युती रहेगी। गुरु का राशि परिवर्तन लगभग 12 वर्ष के बाद 21 अप्रैल को मीन राशि से मेष राशि में होगा।ह भी इस नव संवत्सर को खास बनाता है। बुधादित्य और गजकेसरी योग के साथ नव संवत्सर का शुभारंभ होगा। नए संवत्सर में बुध के राजा होने से किसानों को भी राहत मिलेगी। कला व संस्कृति क्षेत्र के लोगों का भी वर्चस्व बढ़ेगा। कलाकारों को नए अवसर मिलेंगे। इस दौरान कला के क्षेत्र में कुछ अभूतपूर्व कार्य देखने को मिलेंगे।

नववर्ष व विक्रम संवत से जुड़ी खास बातें

ब्रह्म पुराण अनुसार इस दिन ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है। रात में नहीं दिन में ऐसे करें शुरुआत नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है।

नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, विक्रम संवत के दिन प्रभु श्रीराम एवं धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी विक्रम संवत के प्रथम दिन हुआ था।

विक्रम संवत कैसे हुई शुरूआत

विक्रम संवत (vikram-samvat) से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है। सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी। विक्रम सवंत इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे हिंदू धर्म के अनुयायी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवसंवत्सर यानि नववर्ष मनाते हैं। माना जाता है कि इसी दिन सृष्टि का आरंभ हुआ था।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए। मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है। सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है।

Suman Mishra। Astrologer

Suman Mishra। Astrologer

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