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देश के नए यूथ आइकन मैथिली ठाकुर-आरके श्रीवास्तव, ठुकरा दिये करोड़ों के ऑफर

गायिका मैथिली ठाकुर और शिक्षाविद आरके श्रीवास्तव  करोड़ो का ऑफर ठूकरा कर यह साबित कर दिया की वे सही में  देश के नये यूथ आइकन है। मैथिली ठाकुर ने बॉलीवुड के लिए गाने से इंकार करके यह साबित कर दिया है कि मनोरंजन इंडस्ट्री पर कलंकित चरित्र वाले कथित सितारों का एकाधिकार नहीं है।

Monika

MonikaBy Monika

Published on 13 Dec 2020 1:20 PM GMT

देश के नए यूथ आइकन मैथिली ठाकुर-आरके श्रीवास्तव, ठुकरा दिये करोड़ों के ऑफर
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करोड़ो का ऑफर ठुकरा चुके है ,देश के नये यूथ आइकन
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बिहार: गायिका मैथिली ठाकुर और शिक्षाविद आरके श्रीवास्तव करोड़ो का ऑफर ठूकरा कर यह साबित कर दिया की वे सही में देश के नये यूथ आइकन है। मैथिली ठाकुर ने बॉलीवुड के लिए गाने से इंकार करके यह साबित कर दिया है कि मनोरंजन इंडस्ट्री पर कलंकित चरित्र वाले कथित सितारों का एकाधिकार नहीं है। वही कोचिंग इन्स्टीट्यूट के करोड़ो के ऑफर को आरके श्रीवास्तव ने ठूकरा दिया। वे सिर्फ 1 रूपया गुरू दक्षिणा लेकर सैकङो निर्धन परिवार के स्टूडेंट्स को आईआईटी,एनआईटी, बीसीईसीई सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानो में दाखिला दिलाकर उनके सपने को पंख लगा चुके है। मैथिली ठाकुर और आरके श्रीवास्तव दोनो बिहार के रहने वाले है।

मैथिली ठाकुर

छोटी सी मैथिली ने बॉलीवुड की मायावी दुनिया के प्रलोभनों को ठुकरा दिया है। वह देश की सच्ची राष्ट्रवादी यूथ आइकन बनने की हकदार हैं।सुशांत सिंह राजपूत (Sushant singh Rajput) की मौत के बाद के घटनाक्रम से बॉलीवुड (Bollywood) के चेहरे पर चढ़ा चमकता नकाब उतर गया।

जिसके नीचे से निकली नशे में डूबी, तमाम स्याह कारनामों में लिप्त गंदी सूरत. बॉलीवुड के ड्रग्स कनेक्शन (Bollywood drugs case) और बड़े-बड़े नामचीन सितारों की करतूतें उजागर हो गईं।

ऐसे निराशा भरे माहौल में मैथिली ठाकुर (Maithili Thakur) के मुस्कुराते हुए मासूम, लेकिन साहसी चेहरे ने उम्मीद की किरण जगाई है। कोई भी माता पिता ये नहीं चाहेंगे कि उनकी बेटी दीपिका पादुकोण या सनी लियोनी बने।लेकिन वही अभिभावक यह चाहेंगे कि उनकी बेटी मैथिली ठाकुर जैसी जरुर बने।

मैथिली का साहस सराहनीय

बॉलीवुड का ऑफर ठुकरा कर मैथिली ठाकुर ने बड़ा काम किया है। फिल्म इंडस्ट्री की घटिया हरकतें सामने आने के बाद मनोरंजन इंडस्ट्री (Entertainment Industry) को फॉलो करने वाली और उनसे प्रेरणा हासिल करने वाले युवा ठगा सा महसूस करने लगे। जिन सितारों के हेयर स्टाइल, कपड़े, बोलने और चलने के तरीकों की नकल करना युवाओं को अपने जीवन का उद्देश्य लगता था. उन युवाओं के आदर्श ध्वस्त होने लगे थे।

ऐसे में मैथिली ठाकुर जैसी महज 20 साल की बच्ची सामने आती है. जो कि गर्ल नेक्स्ट डोर (Girl next door) जैसी छवि रखती है. यानी हमारे आस पास रहने वाली एक भोली भाली बच्ची। लेकिन मैथिली ठाकुर सामान्य नहीं है। उसने अपनी गायन प्रतिभा से संगीत के दिग्गजों के बीच अपना स्थान बनाया है. मैथिली की उम्र महज 20 साल है।

लेकिन समझदारी इतनी कि इसी उम्र में उसे मायावी बॉलीवुड से ऑफर आता है और वह उसे ठुकरा देती है. करोड़ों रुपए की अंधाधुंध कमाई और मुंबई की आलीशान जिंदगी जैसे लालच उसको भटका नहीं पाते हैं।

मैथिली ने कड़ा संघर्ष किया

आपको बता दें कि मैथिली ठाकुर ने पहली बार वर्ष 2011 में लिटिल चैंप्स (Little champs) का ऑडिशन दिया. लेकिन वह रिजेक्ट हो गईं. जिसके बाद उन्होंने और भी कई म्यूजिक शो के लिए ऑडिशन दिए. लेकिन टॉप 20 तक आकर रिजेक्ट हो जाती थी. यहां तक कि मैथिली को 6 बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

-आखिरकार साल 2015 में उन्हें 'आई जीनियस यंग सिंगिंग स्टार सीजन 2' में शिरकत का मौका मिला. जहां उन्होंने खिताब जीतने में कामयाबी हासिल की।

- इसके बाद इन्होने इंडियन आइडल (Indian Idol) जूनियर 2 में भी टॉप 20 में जगह बनाई.

- साल 2017 में मैथिली ने राइजिंग स्टार नामक रियलिटी सिंगिंग शो में चयन हुआ था. जहां अपनी शानदार प्रस्तुति के लिए मैथिली को 94 प्रतिशत रिकॉर्ड स्कोर प्राप्त हुए.

- मैथिली ठाकुर 5 बार की दिल्ली राज्य की शास्त्रीय संगीत प्रतियोगिता की विजेता रह चुकी हैं. मैथिली ठाकुर ने 2016 में 11वीं की पढ़ाई के साथ 'थारपा' नामक एलबम से अपने संगीत करियर की शुरुआत की.

मैथिली का परिवार

वहीं मैथिली एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं. उनका जन्म 25 जुलाई 2000 को बिहार के मधुबनी जिले में स्थित बेनीपट्टी नामक एक छोटे से शहर में हुआ था।

मैथिली के पिता रमेश ठाकुर अपने क्षेत्र के लोकप्रिय संगीतकार हैं जबकि माता भारती ठाकुर पूरा परिवार संभालती हैं. उसका नाम उसकी मां के नाम पर रखा गया था। उसके दो छोटे भाई हैं, जिनका नाम रिषव और अयाची है. जो अपनी बड़ी बहन यानी मैथिली की संगीत यात्रा में तबला और हारमोनियम जैसे वाद्य बजाने का साथ गायन में भी सहयोग करते हैं।

शुरुआत में मैथिली ने अपने अपने पिता से ही संगीत सीखा, अपनी बेटी की गायन प्रतिभा का एहसास होने के बाद उनके पिता ने मैथिली पर विशेष ध्यान देना शुरु किया।

मैथिली को अधिक अवसर प्रदान करने के लिए उनके पिता रमेश ठाकुर ने दिल्ली के द्वारका में अपना ठिकाना बनाया. यहीं पर मैथिली और उनके दो भाइयों की शिक्षा बाल भवन इंटरनेशनल स्कूल में हुई है। स्कूली पढ़ाई के दौरान रमेश ठाकुर ने अपने तीनो बच्चों को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, हारमोनियम और रिषव को विशेष तौर पर तबला बजाने का प्रशिक्षण दिया।

मैथिली के बलिदान को कम मत आंकिए

बॉलीवुड मैथिली ठाकुर को भौतिक संपदा के रूप में बहुत कुछ दे सकता था. लेकिन शायद वह अपने परिवार से दूर जाकर और स्वाभिमान को दरकिनार करके बॉलीवुड की चकाचौंध में गुम नहीं होना चाहती।

भारत के युवाओं के सामने यह अनोखा उदाहरण है. मैथिली ठाकुर द्वारा करोड़ों की इंडस्ट्री को ठुकरा कर लोक-गायन के वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत करने का संकल्प सचमुच अचंभित करने वाला है।

ऐसे में भारतीय कला के प्रशंसकों और राष्ट्र तथा संस्कृति से प्रेम करने वालों का यह कर्तव्य नहीं बनता है कि वो मैथिली को सिर आंखों पर बिठाएं? उन्हें वह सम्मान और प्रसिद्धि प्रदान करें जिस पर बॉलीवुड के भांड अपना एकाधिकार समझते हैं।

वास्तव में मैथिली ने हमें राह दिखाई है. जिस तरह 20 साल की एक बच्ची इतना साहसिक फैसला ले सकती है तो मनोरंजन के दीवाने हम भारतीय मैथिली जैसे साहसी बच्चों का प्रोत्साहन जरुर कर सकते हैं. मैथिली की आंखों में उम्मीद की जो चमक है, वह देश के हर बच्चे की आंखों में उतरनी चाहिए।

आरके श्रीवास्तव

आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली और पाठशाला “सुपर थर्टी” से कम सुपर नहीं है। सिर्फ 1 रू गुरू दक्षिणा लेकर सैकड़ों गरीबों को आईआईटी, एनआईटी, बीसीईसीई, एनडीए सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानो में दाखिला दिलाकर उनके सपने को पंख लगाया है।

संसाधन की कमी के बाबजूद आर के श्रीवास्तव ने पढाना आरंभ कर आज जो मुकाम हासिल किया है और जिस तेजी से उस पथ पर अग्रसर होते हुए, गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर बना रहे है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्यशैली से काफ़ी प्रभावित हो, प्रशंसा कर चुके हैं।

1 रुपये गुरु दक्षिणा

वहीं आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक आंगन से सिर्फ 1रू गुरू दक्षिणा में छात्र शिक्षा ग्रहण कर इंजीनियर तो बन ही रहे है, वहीं कई छात्र NDA में सफल हो भारतीय सेना के विभिन्न अंगों में सेवा देने के लिये भी सफल हो रहे हैं, इसके अलावा श्रीवास्तव अपने माँ के हाथों प्रत्येक वर्ष 50 गरीब स्टूडेंट्स को निःशुल्क किताबे बंटवाने के पुनीत कार्य भी करते हैं।

साथ ही जाङे के दिनों में अपनी क्षमता के अनुसार कम-से-कम 100 जरूरतमंदो को खुद घर-घर पहुँचकर एवं सङक किनारे ठंड से कांपते लोगो को कंबल बाँटने का पुनीत कार्य भी करते हैं। ऐसे कई सारे सामाजिक कार्यो के लिए भी आर के श्रीवास्तव मशहूर हुए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इनके द्वारा चलाया जा “Wonder Kids Program” और “Night Classes” अद्भुत है। Google boy “Kautilya Pandit” के गुरू के रूप में भी देश इन्हें जानता है।

मशहूर शिक्षक मैथमेटिक्स

मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव यानी गणित पढ़ाने का दीवाना, पूरी रात लगातार 12 घण्टे छात्रों को गणित का गुर सिखाते, वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव जादुई तरीके से खेल-खेल में गणित का गुर सिखाने के लिए मशहूर हैं। चुटकले सुनाकर खेल-खेल में पढ़ाते हैं।

गणित के मशहूर शिक्षक मैथमेटिक्स गुरु फेम आरके श्रीवास्तव जादुई तरीके से गणित पढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी पढ़ाई की खासियत है कि वह बहुत ही स्पष्ट और सरल तरीके से समझाते हैं। सामाजिक सरोकार से गणित को जोड़कर, चुटकुले बनाकर सवाल हल करना आरके श्रीवास्तव की पहचान है। कचरे से खिलौने बनाकर सैकड़ों स्टूडेंट्स को गणित सिखा चुके हैं।

सस्ती सामग्री से खिलौने बनाने के तरीके खोजे

श्रीवास्तव का मानना है कि आज भी ग्रामीण इलाकों में सभी परिवार अपने बच्चों के लिए खिलौने खरीदने में असमर्थ हैं। इसलिए हम बच्चों की जिंदगी में पैसों की वजह से किसी खुशी की कमी न रह जाए, के लिए काम किया। साथ ही खिलौने के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को गणित पढ़ाने का एक मजेदार तरीका सोचा।

इसके लिए उन्होंने सस्ती सामग्री से नए खिलौने बनाने के तरीके खोजे और विकसित किए। 3 जून 1985 को जन्मे, 34 वर्षीय आरके श्रीवास्तव ने बचपन में पिता के गुजरने के बाद गरीबी के कारण अपनी पढाई स्थानीय वीर कुवँर सिंह विश्वविद्यालय से पूरी किया। उन्हें अपने शिक्षा के दौरान यह एहसास हो गया था कि देश में वैसे लाखों-करोड़ों प्रतिभायें होगे जो महंगी शिक्षा, महंगी किताबे इत्यादि के कारण अपने सपने को पूरा नहीं कर पा रहे होंगे।

टीबी के कारण नहीं दे पाए थे परीक्षा

टीबी की बिमारी के कारण नहीं दे पाये थे आईआईटी प्रवेश परीक्षा। टीबी की बिमारी के कारण आईआईटीयन न बनने की टिस ने बना दिया सैकङो गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर। टीबी की बिमारी के दौरान स्थानीय डाॅक्टर ने करीब 9 महीने दवा खाने का सलाह दिये। श्री श्रीवास्तव कहते हैं कि अकेले घर में बैठे-बैठे बोर होने लगा।

फिर विचार आया क्यों न आसपास के छात्र को बुलाकर गणित का गुर सिखाया जाये। पढ़ाने के दौरान वैसे बहुत सारे छात्र थे जो प्रश्न को तो हल कर लेते थे परन्तु उनके काॅन्सेप्ट आजीवन के लिए क्लियर नहीं हो पाता। आजीवन शब्द का इस्तेमाल इसलिये किया गया है कि यदि वे कुछ दिन उस चैप्टर की प्रैक्टिस छोङ दे तो जल्द वे भूल जाते थे।

छात्रों की इन कमियों को दूर करने के लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सस्ती सामग्रियों का इस्तेमाल करके सिंपल खिलौने बनाये और शैक्षणिक प्रयोग विकसित किया।

बच्चों को गणित के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया

इन खिलौनों के साथ उन्होंने स्कूलों में सेमिनार करके भी बच्चों को गणित के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया, उन्होंने मजेदार तरीके से बच्चों को इन खिलौने के जरिए पढ़ाया। खिलौने बच्चों को आकर्षित करते हैं और वह पढ़ने में अपनी रुचि दिखाते हैं।

माचिस की तीलियों और साइकल वाल्व ट्यूब के छोटे-छोटे टुकड़ों से लेकर बेकार कागज का इस्तेमाल खिलौने बनाने में करते हैं। इनसे वह सुंदर खिलौने बनाने समेत बच्चों के बीच ‘best-out-of-waste’ का आईडिया भी डाल रहे हैं। गणित के 3d Shape , ज्यमिती, क्षेत्रमिती, बीजगणित, त्रिकोणमिती सहित अनेकों गणित के कठिन-से-कठिन प्रश्नों को हल कर देते है। इसका मुख्य कारण है खिलौने के सहारे थ्योरी को क्लियर कर चुटकियों मे छात्र-छात्राएँ प्रश्न को हल कर दे रहे।

गांव के बच्चों को पढ़ते थे

उन्होंने छोटे ग्रामीण गांव के स्कूलों से लेकर देश के विभिन्न राज्यो के शैक्षणिक संस्थानों तक के हज़ारों बच्चों को खिलौने बनाकर गणित के प्रश्नो को हल करना सिखाया है। बच्चों को खिलौने बना गणित के काॅन्सेप्ट को सिखाना, बच्चों को बीच गणित विषय को रूचिकर बना रहा है।

गणित के लिये इनके द्वारा चलाया जा रहा निःशुल्क नाईट क्लासेज अभियान पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। पूरे रात लगातार 12 घण्टे छात्रों को गणित का गुर सिखाना कोई चमत्कार से कम नही।

सबसे बड़ी बात है कि वैसे छात्रों जिन्हें गणित के नाम से ही डर लगता है परंतु वे आरके श्रीवास्तव के क्लास में जब शिक्षा ग्रहण करते है तो वे गणित के हौवा को भूल जाते है। छात्र अगले दिन भी यह कहते है कि हमे आरके श्रीवास्तव के नाईट क्लासेज में पूरे रात लगातार 12 घण्टे गणित पढ़ना है। पूरे रात लगातार 12 घण्टे छात्र बिना किसी तनाव के एन्जॉय करते हुए गणित के प्रश्नों को हल करते है।

कई विद्वान इनका इंस्टीटूट देखने आते है

उनके इस क्लास को देखने और उनका शैक्षणिक कार्यशैली को समझने के लिए कई विद्वान इनका इंस्टीटूट देखने आते है। नाईट क्लासेज अभियान हेतु छात्र को सेल्फ स्टडी के प्रति जागरूक करने और गणित को आसान बनाने के लिए यह नाईट क्लासेज अभियान अभिभावकों को खूब भा रहा।

छात्र के अभिभावक इस बात से काफी प्रसन्न दिखे कि मेरा बेटा-बेटी जो ठीक से घर पर पढ़ने हेतु 3-4 घण्टे भी नही बैठ पाते, उसे आरके श्रीवास्तव ने पूरे रात लगातार 12 घण्टे कंसंट्रेशन के साथ गणित का गुर सिखाया। आपको बताते चले कि अभी तक आरके श्रीवास्तव के द्वारा 450 क्लास से अधिक बार पूरे रात लगातार 12 घण्टे स्टूडेंट्स को निःशुल्क गणित की शिक्षा दी जा चुकी है जो अभी भी जारी है।

लेते थे स्पेशल नाईट क्लास

वैसे आरके श्रीवास्तव का प्रतिदिन क्लास में तो छात्र गणित का गुर सीखते ही है, परंतु यह स्पेशल नाईट क्लासेज प्रत्येक शनिवार को लगातार 12 घण्टे बिना रुके चलता है। इसके लिए आरके श्रीवास्तव का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स, एशिया बुक ऑफ रिकार्ड्स, इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो चुका है।

आरके श्रीवास्तव गणित बिरादरी सहित पूरे देश मे उस समय चर्चा में आये जब वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के चैलेंज के दौरान इन्होंने क्लासरूम प्रोग्राम में बिना रुके पाइथागोरस थ्योरम को 50 से ज्यादा अलग-अलग तरीके से सिद्ध कर दिखाया। आरके श्रीवास्तव ने कुल 52 अलग-अलग तरीको से पाइथागोरस थ्योरम को सिद्ध कर दिखाया। जिसके लिए इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन में दर्ज चुका है।

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन

वर्ल्ड बुक ऑफ रिकार्ड्स लंदन के छपी किताब में यह जिक्र भी है कि बिहार के आरके श्रीवास्तव ने बिना रुके 52 विभिन्न तरीकों से पाइथागोरस थ्योरम को सिद्ध कर दिखाया। इसके लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट के सांसद वीरेंद्र शर्मा ने आरके श्रीवास्तव को इनके उज्ज्वल भविष्य के लिए बधाई एवं शुभकामनाये भी दिया। इसके अलावा आरके श्रीवास्तव संख्या 1 क्या है? पर शैक्षणिक सेमिनार में घण्टो भाषण देकर अपने प्रतिभा से बिहार को गौरवान्वित कराया है।

बच्चों के मन से दूर किया डर

आरके श्रीवास्तव गणित को हौवा या डर होने की बात को नकारते हैं। वे कहते हैं कि यह विषय सबसे रुचिकर है। इसमें रुचि जगाने की आवश्यकता है। अगर किसी फॉर्मूला से आप सवाल को हल कर रहे हैं तो उसके पीछे छुपे तथ्यों को जानिए। क्यों यह फॉर्मूला बना और किस तरह आप अपने तरीके से इसे हल कर सकते हैं? वे बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही गणित में बहुत अधिक रुचि थी, जो नौंवी और दसवी तक आते-आते परवान चढ़ी।

आरके श्रीवास्तव अपने छात्रों में एक सवाल को अलग-अलग तरीके से हल करना भी सिखाते हैं। वे सवाल से नया सवाल पैदा करने की क्षमता का भी विकास करते हैं। रामानुजन, वशिष्ठ नारायण सिंह को आदर्श मानने वाले आरके श्रीवास्तव कहते हैं कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के युग में गणित की महत्ता सबसे अधिक है, इसलिए इस विषय को रुचिकर बनाकर पढ़ाने की आवश्यकता है।

वंडर किड्स प्रोग्राम क्लासेज

इनके द्वारा चलाया जा रहा वंडर किड्स प्रोग्राम क्लासेज भी अद्भुत है, इस प्रोग्राम के तहत नन्हे उम्र के बच्चे जो वर्ग 7 और 8 में है परंतु अपने वर्ग से 4 वर्ग आगे के प्रश्नों को हल करने का मद्दा रखते है। वर्ग 7 व 8 के छात्र 11 वी , 12 वी के गणित को चुटकियो में हल करते है।

आरके श्रीवास्तव के वंडर किड्स प्रोग्राम क्लासेज के इन छात्र से मिलने और शैक्षणिक कार्यशैली को समझने के लिये अन्य राज्यो के लोग इनके इंस्टीटूट को देखने आते है। इसी खासियत और इनके गणित पढ़ाने के जादुई तरीके ने उन्हें मैथमेटिक्स गुरु का दर्जा दिला दिया ।

आरके श्रीवास्तव का बचपन अन्य बच्चों जैसा सामान्य नहीं रहा। 5 साल की उम्र में पिता के गुजरने और बड़े होने पर एकलौते बड़े भाई के गुजरने के बाद परिवार को काफी संघर्षो का दिन भी देखना पड़ा। आपको बताते चले कि यह भी मशहूर है कि अपने क्लास में पढ़ाई करने के दौरान अपने सीनियर को गणित भी पढ़ाया करते। वर्ग 12 से पहले ही लोनी द्वारा कृत प्रसिद्द ट्रिग्नोमेट्री और कोआर्डिनेट ज्योमेट्री के प्रश्नों को हल कर दिया।

गणित में करते टॉप, बाकी विषयों में आते कम नम्बर

बचपन से ही आरके श्रीवास्तव गणित इतना अधिक पढ़ाई करते कि अन्य विषयों पर थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं दे पाते। इसका नतीजा एक बार ऐसा हुआ कि 10वी की परीक्षा में गणित में तो टॉप कर लिया जबकि अन्य सभी विषयों में बहुत कम अंक आये। श्रीवास्तव के जीवन के कुछ साल बहुत संघर्ष भरा रहा। बड़े भाई के गुजरने के बाद श्रीवास्तव पर अपने पढ़ाई के अलावा तीन भतीजियों की शादी और भतीजे को पढ़ाना सहित पूरे परिवार की जिमेद्दारी आ गई।

परन्तु श्रीवास्तव ने अपने जीवन में कभी हार नहीं माना और अपने कड़ी मेहनत, ऊंची सोच, पक्का इरादे के साथ आज मैथमेटिक्स गुरु के नाम से मशहूर हैं। वर्तमान में बिहार के आरके श्रीवास्तव को देश के विभिन्न राज्यो के शैक्षणिक संस्थाए गेस्ट फैकल्टी के रूप में शिक्षा देने के लिए भी बुलाते है।

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