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RTI एक्टिविस्ट नरेश की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, प्रदेश की जेलें बनी कैदियों की कब्रगाह

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Published on 12 Oct 2017 4:12 AM GMT

RTI एक्टिविस्ट नरेश की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, प्रदेश की जेलें बनी कैदियों की कब्रगाह
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आगरा: जहां एक और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार लगातार जेलों के सुधार की बात कर रही है, जेलों में गौशाला खोले जाने की बात की जा रही है और यहां तक की जेलों को हाईटेक करने की योजनाएं बना रही है, वहीं उत्तर प्रदेश की जेलें कैदियों की कब्रगाह बनती जा रही हैं।

यह खुलासा आगरा की आरटीआई एक्टिविस्ट नरेश पारस द्वारा मांगी गई पूरे प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों की मौत के बारे में जानकारी जुटाने पर हुआ। पिछले पांच साल में जेल की चहारदीवारी के भीतर दो हजार से अधिक कैदियों-बंदियों की जिंदगी का सूर्यास्त हो गया। प्रदेश में 62 जिला जेल, पांच सेंट्रल जेल और तीन विशेष कारागार हैं।

जेलों में मरने वालों में नवजात बच्चे भी शामिल हैं। सीतापुर जेल में कुंदना पत्नी सुरजाना के एक साल के बेटे अनमोल ने इस साल दम तोड़ दिया। हरदोई जिला जेल में 24 मई, 2013 को वंदना के छह महीने के पुत्र प्रिंस की मौत हुई। मथुरा जिला जेल में वर्ष 18 अक्टूबर, 2014 को जुमराती के नवजात बच्चे एवं कानपुर देहात जेल में 18 सिंतबर, 2014 को रामकली के नवजात पुत्र की मौत हुई, जबकि वाराणसी जेल में रेखा के डेढ़ महीने के बेटे ने दम तोड़ दिया।

बुलंदशहर जिला में निरुद्ध 106 साल की रामकेली पत्नी स्वरूप की 10 मई, 2013 को मौत हो गई। बस्ती जिला जेल में 100 साल के बंदी वासुदेव ने दो दिसंबर, 2016 को दम तोड़ा। मरने वालों में आधी संख्या विचाराधीन बंदियों की है। इनकी उम्र 25 से 45 साल के बीच थी। सबसे ज्यादा मौतें क्षय रोग और सांस की बीमारी के चलते होना बताई गई हैं।

जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का होना भी इतनी मौतों का प्रमुख कारण है। आगरा जिला जेल की क्षमता 1015 कैदियों की है, लेकिन यहां 2600 से ज्यादा कैदी निरुद्ध हैं। इसी तरह 1110 कैदियों की क्षमता वाले केंद्रीय कारागार में 1900 से ज्यादा बंदी हैं। जेलों में कैदियों की होने वाली मौतों में बड़ी संख्या बुजुर्गो की हैं।

इनमें ज्यादातर टीबी, दमा और उच्च रक्तचाप से पीड़ित थे। बैरकों में क्षमता से अधिक कैदियों के चलते टीबी जैसी बीमारी तेजी से फैलती है। खुले में न रहने के कारण कैदियों की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है।

जेलों में सुधार के लिए गठित मुल्ला कमेटी की सिफारिशें 25 साल बाद भी धूल फांक रही हैं। इसमें जेल नियमावली में संशोधन के साथ ही कैदियों के पुर्नवास से संबंधित सिफारिशें की गई थीं, जिन्हें आज तक लागू नहीं किया गया।

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