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खून के आंसू रुला रहीं गन्ना समितियां, खुद मालामाल तो किसान बदहाल

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Published on 25 Aug 2017 8:03 AM GMT

खून के आंसू रुला रहीं गन्ना समितियां, खुद मालामाल तो किसान बदहाल
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सुशील कुमार

मेरठ: उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को शुगर इंडस्ट्री ही नहीं बल्कि गन्ना समितियां भी खून के आंसू रूला रही हैं। हालत यह है कि अकेले मेरठ परिक्षेत्र में किसानों का एक करोड़ से अधिक रुपया गन्ना समितियां पिछले 12-13 साल से दबाए बैठी हैं। समितियां 2016-17 वित्तीय वर्ष का अभी तक हिसाब तक नहीं दे सकी हैं।

अगर इस वित्तीय वर्ष का हिसाब जोड़ लिया जाए तो किसानों का गन्ना समितियों पर करीब दो करोड़ रुपया बकाया है। यही नहीं, इस दौरान अनपेड भुगतान का ब्याज भी समितियां खा रही हैं। प्रदेश की सभी समितियों में यही कहानी होने की आशंका है। यानी अगर पूरे प्रदेश की समितियों की जांच कराई जाए तो घपला कहां तक पहुंचेगा इसे आसानी से समझा जा सकता है।

दबाए बैठी हैं किसानों का करोड़ों रुपया

गन्ना समितियां किसानों का करोंड़ों रुपये दबाए बैठी हैं। इसका खुलासा पिछले दिनों तब हुआ, जब मेरठ परिक्षेत्र के उप गन्ना आयुक्त हरपाल सिंह ने मेरठ गन्ना समिति में छापा मारकर अनपेड की स्थिति चेक की। इसमें वर्ष 2005-06 से लेकर 2015-16 तक का करीब एक करोड़ 6 लाख रुपया अनपेड मिला।

हरपाल सिंह कहते हैं कि समिति अभी तक 2016-17 का हिसाब नहीं दे सकी है। अगर इस वित्तीय सत्र को भी शामिल कर लिया जाए तो अनपेड राशि करीब दो करोड़ होगी। बकौल हरपाल सिंह गन्ना विकास समितियों ने पिछले करीब 12-13 साल से अनपेड गन्ना मूल्य किसानों के खातों तक नहीं पहुंचाया।

आगे की स्लाइड में जानिए कैसे ब्याज चट कर रहीं समितियां

ब्याज भी चट कर रही हैं गन्ना समितियां

सूत्रों के अनुसार यह स्थिति अकेले मेरठ मंडल की ही नहीं है। हकीकत तो यह है कि समूचे प्रदेश की गन्ना समितियां किसानों का गन्ना भुगतान दबाकर उस पर मिलने वाले ब्याज को भी चट कर रही हैं। यहां बता दें कि शुगर इंडस्ट्री व किसानों के बीच गन्ना विभाग व उसकी गन्ना विकास समितियां व परिषद सेतु का काम करती है। गन्ना समितियों के माध्यम से ही गन्ना किसान शुगर मिलों पर अपने गन्ने की आपूर्ति करते हैं।

इसके लिए बकायदा एक अनुबंध होता है, जिसकी शर्तों के मुताबिक खरीदे गए गन्ने का भुगतान शुगर मिल गन्ना समितियों को देती हैं। अब यह जिम्मेदारी गन्ना समितियों की होती है कि वह शुगर मिलों द्वारा किए गए भुगतान को सदस्य किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर करे।

साफ है कि मेरठ मंडल में काम कर रही 16 गन्ना समितियों ने यह जिम्मेदारी नहीं निभाई। दूसरे शब्दों में कहें तो इन समितियों ने अमानत में खयानत की। समितियों द्वारा करीब 12-13 साल से अनपेड गन्ना मूल्य किसानों के खाते में जमा नहीं कराए जाने पर समितियों की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं।

राष्ट्रीय लोकदल के पश्चिमी उत्तर प्रदेश संगठन प्रभारी डॉ. राजकुमार सांगवान कहते हैं कि यह तो सीधे-सीधे अमानत में खयानत का मामला बनता है। सरकार को चाहिए कि वह प्रदेश भर की समितियों की जांच कर मामले में दोषी लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजे।

आगे की स्लाइड में जानिए कर्मचारियों की लापरवाही

गन्ना समितियों के कर्मचारी लापरवाह

भाकियू के किसान नेता चौधरी जगवीर सिंह इसे गन्ना समितियों के कर्मियों की लापरवाही से भी जोड़ते हैं। बकौल जगवीर सिंह गन्ना सुपरवाइजरों के समिति सदस्यों का बैंक खाता अपडेड न कराने की स्थिति में इस तरह का मामला सामने आता है। जगवीर सिंह के अनुसार पेराई सत्र के बीच में शुगर मिल बदलने या गांव में दो मिलों के केंद्र होने पर किसान दूसरे मिल के केंद्र पर गन्ना डाल देता है। इस हालत में उस मिल पर किसान का बैंक खाता नहीं होने पर उसका भुगतान समिति के नॉन अकाउंट में रखा रह जाता है।

मेरठ मंडल समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुख्य फसल और आर्थिक रीढ़ गन्ना है। कई दशकों से शुगर मिलों व गन्ना समितियों ने भुगतान के मामले में किसानों को रुलाया है। गन्ना विभाग के आंकड़ों पर ही गौर करें तो वर्तमान में किसानों का 263.59 करोड़ रुपया शुगर मिलों पर बकाया है। यानी एक तरफ गन्ना समितियां और शुगर मिलें किसानों के जरिए मालामाल हो रही हैं, वहीं गन्ना किसान आर्थिक संकट में फंसकर खून के आंसू रोने पर मजबूर है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भी किसानों को राहत मिलती नहीं दिख रही है।

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