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Mehdi Hassan Death Anniversary: मेहदी हसन जिसने गजल गायकी को किया अमर, जानें इनके बारे में

Mehdi Hassan Death Anniversary: गजल के शहंशाह मेहदी हसन ने 13 जून को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।

Shreya

ShreyaBy Shreya

Published on 12 Jun 2021 5:26 PM GMT

Mehdi Hassan Death Anniversary: मेहदी हसन जिसने गजल गायकी को किया अमर, जानें इनके बारे में
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 मेहदी हसन (फाइल फोटो साभार- सोशल मीडिया)

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Mehdi Hassan Death Anniversary-

"मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,

तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।"

ये गजल है मेहदी हसन (Mehdi Hassan) की, जो आज भी लोगों के दिलों में ठीक वैसे ही जिंदा है, जैसे कि मेहदी हसन खुद। पाकिस्तानी गजल गायक की रुहानी आवाज ने पूरी दुनिया को उनका दीवाना बनाने का काम किया। उनका नाम न केवल पाकिस्तान बल्कि भारत में भी बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है। उन्हें शानदार गायकी के लिए शहंशाह-ए-गजल (Shahenshah-e-Ghazal) तमगा दिया गया है।

मेहदी हसन की आवाज इतनी रुहानी थी कि जो भी सुनता उसे सुकुन के पल मिल जाते। उनकी तारीफ में कहा जाता कि गजल और मेहदी हसन एक दूसरे के पर्याय हैं। हालांकि उनके निधन के साथ ही गजल गायकी की दुनिया में खालीपन सा आ गया। 13 जून, 2012 वो दिन जब मेहदी हसन अपने चाहने वालों को रोता छोड़ इस दुनिया को अलविदा (Mehdi Hassan Death Anniversary) कह गए।

मेहदी हसन की एक बेहद ही मशहूर गजल है-

'रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ'

ये गजल आज भी आशिकों के लिए अमर प्रेम की तरह है। आज हम आपको मेहदी हसन के पुण्यतिथि के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातें और उनकी कुछ बेहद मशहूर गजलों से रुबरु करवाने जा रहे हैं।

मेहदी हसन (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

राजस्थान में जन्मे थे मेहदी हसन

मेहदी हसन का जन्म 18, जुलाई 1927 को राजस्थान में झुंझुनू जिले के लूणा गांव में अजीम खान मिरासी के घर हुआ था। मेहदी हसन का परिवार संगीतकारों का परिवार रहा है। मेहदी हसन बताते थे कि कलावंत घराने में उनसे पहले की 15 पीढ़ियां भी संगीत से ही जुड़ी हुई थीं। उन्होंने संगीत की की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद ईस्माइल खान से ली।

भारत में 20 साल रहने के बाद वो समय आया जब मेहदी हसन को हिंदुस्तान को अलविदा कह पाकिस्तान जाना पड़ा। दरअसल, आजादी के बाद जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो मेहदी हसन का परिवार पाकिस्तान चला गया। पाकिस्तान जाकर उन्होंने कुछ दिनों तक एक साइकिल दुकान में काम किया और उसके बाद मोटर मेकैनिक का। हालांकि संगीत के प्रति उनका जुनून कभी कम न हुआ।

1957 में मिला गायकी का पहला मौका

साल 1957 में मेहदी हसन को रेडियो पाकिस्तान में बतौर ठुमरी गायक पहचान मिली। इस शुरुआत के बाद कभी भी मेहदी हसन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और यहीं से वो अपनी सफलता की कहानी रचते गए। फिल्मी गीतों से लेकर गजलों को अपनी रुहानी आवाज से उन्होंने अमर कर दिया और देखते ही देखते पूरी दुनिया में छा गए।

भारत के प्रति लगाव कभी कम न हुआ

हालांकि बड़ा नाम कमाने के बाद भी भारत के प्रति उनका प्यार व लगाव कम न हुआ। उन्हें जब भी मौका मिलता वो भारत दौड़े चले आते थे। राजस्थान में शेखावाटी की धरती से उन्हें एक अलग तरह का लगाव था और शायद यही वजह है कि आज भी पाकिस्तान में उनका परिवार शेखावाटी की मारवाड़ी भाषा में बातचीत करतें हैं। मेहदी हसन ने भारत और पाकिस्तान को जोड़े रखने का काम भी किया। उन्होंने हमेशा ही दोनों देशों के बीच एक एक सांस्कृतिक दूत की भूमिका निभायी।

12 सालों तक संगीत से बनाई दूरी

अपनी गजलों से सभी के मन को सुकुन पहुंचाने वाले मेहदी हसन की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें 12 सालों तक संगीत से दूरी बनानी पड़ी थी। जी हां, 1957 से 1999 तक सक्रिय रहने के बाद वो करीब 12 सालों तक गानों से दूर रहे और वजह थी उनकी कैंसर की बीमारी। उन्हें गले के कैंसर की परेशानी थी, जिसके बाद उन्होंने गाना लगभग छोड़ दिया था।

गजल गायक मेहदी हसन (फाइल फोटो साभार- सोशल मीडिया)

ये थी आखिरी रिकॉर्डिंग

मेहदी हसन की अंतिम रिकार्डिंग 2010 में "तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है" रही। उन्होंने यह रिकार्डिंग साल 2009 में पाकिस्तान में की और उस ट्रैक को सुनकर 2010 में लता मंगेशकर ने अपनी रिकार्डिंग मुंबई में की। इस तरह यह युगल अलबम तैयार हुआ। फिर 13 जून 2012 को पाकिस्तान के कराची शहर में उनका निधन हो गया। जो गजल गायकी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति रही। भले ही आज वो इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन लोगों के दिलों में वो हमेशा जिंदा रहने वाले हैं।

मेहदी हसन की मशहूर गजलें (Mehdi Hassan Ghazals)


रंजिश ही सही-


अबकी हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें-



बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसे तो ना थी-



मैं खयाल हूं किसी और का-


ये धुआं कहां से उठा-


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