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Sardar Ka Grandson Review: न रोमांस, न इमोशन और न ही ऐक्शन, निराश करती है फिल्म

भार-पाकिस्तान पर अब तक जितनी भी फिल्में बनी लगभग सब हिट गईं।

Sardar Ka Grandson
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फोटो— सरदार का ग्रैंडसन (साभार— सोशल मीडिया)

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भारत-पाकिस्तान पर अब तक जितनी भी फिल्में बनी लगभग सब हिट गईं। क्योंकि दोनों देशों के बीच जैसे रिश्ते हैं, उन्हीं पर आधारित अब तक की फिल्में बनीं। दोनों देशों के रिश्तों पर आधारित गदरः एक प्रेमकथा, बजरंगी भाईजान की तरह बनी निर्देशक काशवी नायर की डेब्यू फिल्म सरदार का ग्रैंडसन (Sardar Ka Grandson) को रास नहीं आ रहा। क्योंकि फिल्म की पटकथा ही कमजोर है, जिसके चलते फिल्म को दर्शक जुटा पाने में मुश्किल आएगी। यह फिल्म जितनी बड़ी बात करती है, वैसा इस फिल्म में कुछ नजर नहीं आ रहा है। मतलब फिल्म में न रोमांस है, न इमोशन और न ही ऐक्शन ही है। कुल मिलकार यह सोशल-पॉलीटिकल फिल्म नजर आ रही है।

वहीं इस फिल्म के हीरो अर्जून कपूर के पास सफल फिल्में नाम मात्र की और फलॉप फिल्मों की पूरी लिसट है। इस फिल्म में काशवी उन्हें हीरो बनाने की मोह में फंसी रहीं, जिसके चलते एडिटर ने भी हिम्मत नहीं दिखाई। फिल्म की कहानी एकदम सपाट है, इसमें कहीं ऐसा कोई घुमाव नहीं है, जो दर्शक को बांध सके। न ही ऐसा कुछ है कि लोगों में रोमांच पैदा हो। अर्जुन कपूर, रकुल प्रीत सिंह और नीना गुप्ता के किरदारों में ऐसा कोई तारतम्य नहीं स्थापित हो पाया है, जो स्क्रीन पर धमाल मचा सके। फिल्म में जॉन अब्राहम और अतिति राव हैदरी मेहमान की भूमिका में हैं। कुल मिलाकर फिल्म में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आ रहा है, जो दर्शक को बांध सके। एक समय बाद यह फिल्म उबाऊं लगने लगती है।


पूरी फिल्म में एक ही किरदार ऐसा है जो दर्शकों को थोड़ा प्रभावित करता है। वह कुमुद मिश्र हैं, जो लाहौर के कलेक्टर की भूमिका में हैं। कहानी का आइडिया इतना सरल गढ़ा गया है, जैसे एक देश दूसरे देश जाने की जगह एक गांव से दूसरे गांव जाना हो। निदेशक काशवी नायर ने अल-जजीरा चैनल की एक डॉक्युमेंट्री 'गोइंग बैक टू पाकिस्तान' से यह आइडिया लिया है। इसमें 90 वर्ष का एक बुजुर्ग भारत विभाजन के 70 साल बाद पाकिस्तान की यात्रा करता है। क्योंकि उस बुजुर्ग का पुश्तैनी घर, दुकान और स्कूल वहां था। वह उन जगहों को एकबार फिर से देखना व महसूस करना चाहता था।

सरदार का ग्रैंडसन में नीना गुप्ता जो 90 पार की सरदार कौर की भूमिका में हैं उनका भी कुछ इसी तरह का ख्वाब है। लेकिन जर्जर होती सेहत की वजह से लाहौर जाकर कबूतर वाली गली में अपना विशाल घर देख पाने में असमर्थ हैं। मगर उनका पोता अर्जुन कपूर जो अमरीक की भूमिका में है, वह वहां जाता है मकान को ट्रॉलर पर लादकर अमृतसर ले आता है। इस साधारण सी कहानी के सिवाय पूरी फिल्म में दूसरी कोई कहानी नहीं है।

फिल्म में अर्जुन कपूर और भारतीय नेता एकदम कॉमिक नजर आते हैं तो वहीं पाकिस्तानियों को गंभीर और यारबाज दिखाया गया है। यही इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी मानी जा रही है। पाकिस्तान में एक चाय वाला अमरीक की हर तरह से मदद करता है और अंत में एक डॉयलाग बोलता है कि आपका देश चाय वालों को बहुत अंडरएस्टिमेट करता है। वहीं अमितोष नागपाल के लिखे संवाद से तथ्य गायब हैं।

फिल्म में अमरीक और राधा (रकुल प्रीत सिंह) की लव स्टोरी भी है लेकिन यह भी एकदम बेदम है। वहीं अर्जुन कपूर 2 स्टेट्स, हाफ गर्लफ्रेंड, की एंड का, नमस्ते इंग्लैंड और मुबारकां में जैसे नजर आए थे, उससे हटकर यहां भी कुछ नहीं कर पाए। अर्जुन कपूर का इंडस्ट्री में कॅरियर न बन पाने के पीछे उनका खराब कहानियों का चयन भी है।

Raghvendra Prasad Mishra

Raghvendra Prasad Mishra

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